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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

युद्धकाण्ड

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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

युद्धकाण्ड

पहला सर्ग

हनुमान्‌जीकी प्रशंसा करके श्रीरामका उन्हें हृदयसे लगाना और समुद्रको पार करनेके लिये चिन्तित होना

हनुमान्‌जीके द्वारा यथावत्रूपसे कहे हुए इन वचनोंको सुनकर भगवान् श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार उत्तम वचन बोले—॥ १ ॥

‘हनुमान्‌ने बड़ा भारी कार्य किया है। भूतलपर ऐसा कार्य होना कठिन है। इस भूमण्डलमें दूसरा कोई तो ऐसा कार्य करनेकी बात मनके द्वारा सोच भी नहीं सकता॥ २ ॥

‘गरुड़, वायु और हनुमान्‌को छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो महासागरको लाँघ सके॥ ३ ॥

‘देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग और राक्षस— इनमेंसे किसीके लिये भी जिसपर आक्रमण करना असम्भव है तथा जो रावणके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित है, उस लङ्कापुरीमें अपने बलके भरोसे प्रवेश करके कौन वहाँसे जीवित निकल सकता है?॥ ४ १/२ ॥

‘जो हनुमान्‌के समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न न हो, ऐसा कौन पुरुष राक्षसोंद्वारा सुरक्षित अत्यन्त दुर्जय लङ्कामें प्रवेश कर सकता है॥ ५ १/२ ॥

‘हनुमान्‌ने समुद्र-लङ्घन आदि कार्योंके द्वारा अपने पराक्रमके अनुरूप बल प्रकट करके एक सच्चे सेवकके योग्य सुग्रीवका बहुत बड़ा कार्य सम्पन्न किया है॥ ६ ॥

‘जो सेवक स्वामीके द्वारा किसी दुष्कर कार्यमें नियुक्त होनेपर उसे पूरा करके तदनुरूप दूसरे कार्यको भी (यदि वह मुख्य कार्यका विरोधी न हो) सम्पन्न करता है, वह सेवकोंमें उत्तम कहा गया है॥ ७ ॥

‘जो एक कार्यमें नियुक्त होकर योग्यता और सामर्थ्य होनेपर भी स्वामीके दूसरे प्रिय कार्यको नहीं करता (स्वामीने जितना कहा है, उतना ही करके लौट आता है) वह मध्यम श्रेणीका सेवक बताया गया है॥

‘जो सेवक मालिकके किसी कार्यमें नियुक्त होकर अपनेमें योग्यता और सामर्थ्यके होते हुए भी उसे सावधानीसे पूरा नहीं करता, वह अधम कोटिका कहा गया है॥ ९ ॥

‘हनुमान्ने स्वामीके एक कार्यमें नियुक्त होकर उसके साथ ही दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्योंको भी पूरा किया, अपने गौरवमें भी कमी नहीं आने दी—अपने-आपको दूसरोंकी दृष्टिमें छोटा नहीं बनने दिया और सुग्रीवको भी पूर्णतः संतुष्ट कर दिया॥ १० ॥

‘आज हनुमान्ने विदेहनन्दिनी सीताका पता लगाकर—उन्हें अपनी आँखों देखकर धर्मके अनुसार मेरी, समस्त रघुवंशकी और महाबली लक्ष्मणकी भी रक्षा की है॥ ११ ॥

‘आज मेरे पास पुरस्कार देने योग्य वस्तुका अभाव है, यह बात मेरे मनमें बड़ी कसक पैदा कर रही है कि यहाँ जिसने मुझे ऐसा प्रिय संवाद सुनाया, उसका मैं कोई वैसा ही प्रिय कार्य नहीं कर पा रहा हूँ॥ १२ ॥

‘इस समय इन महात्मा हनुमान्को मैं केवल अपना प्रगाढ़ आलिङ्गन प्रदान करता हूँ, क्योंकि यही मेरा सर्वस्व है’॥ १३ ॥

ऐसा कहते-कहते रघुनाथजीके अङ्ग-प्रत्यङ्ग प्रेमसे पुलकित हो गये और उन्होंने अपनी आज्ञाके पालनमें सफलता पाकर लौटे हुए पवित्रात्मा हनुमान्जीको हृदयसे लगा लिया॥ १४ ॥

फिर थोड़ी देरतक विचार करके रघुवंशशिरोमणि श्रीरामने वानरराज सुग्रीवको सुनाकर यह बात कही—॥

‘बन्धुओ! सीताकी खोजका काम तो सुचारुरूपसे सम्पन्न हो गया; किंतु समुद्रतककी दुस्तरताका विचार करके मेरे मनका उत्साह फिर नष्ट हो गया॥ १६ ॥

‘महान् जलराशिसे परिपूर्ण समुद्रको पार करना तो बड़ा ही कठिन काम है। यहाँ एकत्र हुए ये वानर समुद्रके दक्षिण तटपर कैसे पहुँचेंगे॥ १७ ॥

‘मेरी सीताने भी यही संदेह उठाया था, जिसका वृत्तान्त अभी-अभी मुझसे कहा गया है। इन वानरोंके समुद्रके पार जानेके विषयमें जो प्रश्न खड़ा हुआ है, उसका वास्तविक उत्तर क्या है?’॥ १८ ॥

हनुमान्‌जीसे ऐसा कहकर शत्रुसूदन महाबाहु श्रीराम शोकाकुल होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥ १ ॥