श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अट्ठासीवाँ सर्ग
अट्ठासीवाँ सर्ग
इला और बुधका एक-दूसरेको देखना तथा बुधका उन सब स्त्रियोंको किंपुरुषी नाम देकर पर्वतपर रहनेके लिये आदेश देना
श्रीरामकी कही हुँइ इलके चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको सुनकर लक्ष्मण और भरत दोनों ही बड़े विस्मित हुए॥ १ ॥
उन दोनों भाइयोंने हाथ जोड़कर श्रीरामसे महामना राजा इलके स्त्री-पुरुषभावके विस्तृत वृत्तान्तके विषयमें पुनः पूछा— ॥ २ ॥
‘प्रभो! राजा इल स्त्री होकर तो बड़ी दुर्गतिमें पड़ गये होंगे। उन्होंने वह समय कैसे बिताया? और जब वे पुरुषरूपमें रहते थे, तब किस वृत्तिका आश्रय लेते थे?’॥ ३ ॥
लक्ष्मण और भरतका वह कौतूहलपूर्ण वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने राजा इलके वृत्तान्तको, जैसा वह उपलब्ध था, उसी रूपमें पुनः सुनाना आरम्भ किया— ॥ ४ ॥
‘तदनन्तर उस प्रथम मासमें ही इला त्रिभुवनसुन्दरी नारी होकर वनमें विचरने लगी। जो पहले उसके चरणसेवक थे, वे भी स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे; उन्हीं स्त्रियोंसे घिरी हुँइ लोकसुन्दरी कमललोचना इला वृक्षों, झाड़ियों और लताओंसे भरे हुए एक वनमें शीघ्र प्रवेश करके पैदल ही सब ओर घूमने लगी॥ ५-६ ॥
‘उस समय सारे वाहनोंको सब ओर छोड़कर इला विस्तृत पर्वतमालाओंके मध्यभागमें भ्रमण करने लगी॥ ७ ॥
‘उस वनप्रान्तमें पर्वतके पास ही एक सुन्दर सरोवर था, जिसमें नाना प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे॥ ८ ॥
‘उस सरोवरमें सोमपुत्र बुध तपस्या करते थे, जो अपने तेजस्वी शरीरसे उदित हुए पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे थे। इलाने उन्हें देखा* ॥ ९ ॥
‘वे जलके भीतर तीव्र तपस्यामें संलग्न थे। उन्हें पराभूत करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वे यशस्वी, पूर्णकाम और तरुण-अवस्थामें स्थित थे॥ १० ॥
‘रघुनन्दन! उन्हें देखकर इला चकित हो उठी और जो पहले पुरुष थीं, उन स्त्रियोंके साथ जलमें उतरकर उसने सारे जलाशयको क्षुब्ध कर दिया॥ ११ ॥
‘इलापर दृष्टि पड़ते ही बुध कामदेवके बाणोंका निशाना बन गये। उन्हें अपने तन-मनकी सुध न रही और वे उस समय जलमें विचलित हो उठे॥ १२ ॥
‘इला त्रिलोकीमें सबसे अधिक सुन्दरी थी। उसे देखते हुए बुधका मन उसीमें आसक्त हो गया और वे सोचने लगे, ‘यह कौन-सी स्त्री है, जो देवाङ्गनाओंसे भी बढ़कर रूपवती है॥ १३ ॥
‘“न देववनिताओंमें, न नागवधुओंमें, न असुरोंकी स्त्रियोंमें और न अप्सराओंमें ही मैंने पहले कभी कोऽइ ऐसे मनोहर रूपसे सुशोभित होनेवाली स्त्री देखी है॥
‘“यदि यह दूसरेको ब्याही न गयी हो तो सर्वथा मेरी पत्नी बननेयोग्य है।’ ऐसा विचार वे जलसे निकलकर किनारे आये॥ १५ ॥
‘फिर आश्रममें पहुँचकर उन धर्मात्माने पूर्वोक्त सभी सुन्दरियोंको आवाज देकर बुलाया और उन सबने आकर उन्हें प्रणाम किया॥ १६ ॥
‘तब धर्मात्मा बुधने उन सब स्त्रियोंसे पूछा— ‘यह लोकसुन्दरी नारी किसकी पत्नी है और किसलिये यहाँ आयी है? ये सब बातें तुम शीघ्र मुझे बताओ’ ॥ १७ ॥
‘बुधके मुखसे निकला हुआ वह शुभवचन मधुर पदावलीसे युक्त तथा मीठा था। उसे सुनकर उन सब स्त्रियोंने मधुर वाणीमें कहा— ॥ १८ ॥
‘“ब्रह्मन्! यह सुन्दरी हमारी सदाकी स्वामिनी है। इसका कोऽइ पति नहीं है। यह हमलोगोंके साथ अपनी इच्छाके अनुसार वनप्रान्तमें विचरती रहती है’॥ १९ ॥
‘उन स्त्रियोंका वचन सब प्रकारसे सुस्पष्ट था। उसे सुनकर ब्राह्मण बुधने पुण्यमयी आवर्तनी विद्याका आवर्तन (स्मरण) किया॥ २० ॥
‘उस राजाके विषयकी सारी बातें यथार्थरूपसे जानकर मुनिवर बुधने उन सभी स्त्रियोंसे कहा— ॥
‘“तुम सब लोग किंपुरुषी (किन्नरी) होकर पर्वतके किनारे रहोगी। इस पर्वतपर शीघ्र ही अपने लिये निवासस्थान बना लो॥ २२ ॥
‘“पत्र और फल-मूलसे ही तुम सबको सदा जीवन-निर्वाह करना होगा। आगे चलकर तुम सभी स्त्रियाँ किंपुरुष नामक पतियोंको प्राप्त कर लोगी’॥ २३ ॥
‘किंपुरुषी नामसे प्रसिद्ध हुर्इ वे स्त्रियाँ सोमपुत्र बुधकी उपर्युक्त बात सुनकर उस पर्वतपर रहने लगीं। उन स्त्रियोंकी संख्या बहुत अधिक थी॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८८ ॥
* यह सरोवर उस सीमासे बाहर था, जहाँतकके प्राणी भगवान् शिवके आदेशसे स्त्रीरूप हो गये थे। इसीलिये बुधको स्त्रीत्वकी प्राप्ति नहीं हुई थी।