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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ दसवाँ सर्ग

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एक सौ दसवाँ सर्ग

वसिष्ठजीका सृष्टिपरम्पराके साथ इक्ष्वाकुकुलकी परम्परा बताकर ज्येष्ठके ही राज्याभिषेकका औचित्य सिद्ध करना और श्रीरामसे राज्य ग्रहण करनेके लिये कहना

श्रीरामचन्द्रजीको रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजीने उनसे कहा—'रघुनन्दन! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोकके प्राणियोंका परलोकमें जाना और आना होता रहता है (अतः ये नास्तिक नहीं हैं)॥ १ ॥

'जगदीश्वर! इस समय तुम्हें लौटानेकी इच्छासे ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी। तुम मुझसे इस लोककी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो॥ २ ॥

'सृष्टिके प्रारम्भकालमें सब कुछ जलमय ही था। उस जलके भीतर ही पृथ्वीका निर्माण हुआ। तदनन्तर देवताओंके साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए॥ ३ ॥

'इसके बाद उन भगवान् विष्णुस्वरूप ब्रह्माने ही वराहरूपसे प्रकट होकर जलके भीतरसे इस पृथ्वीको निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रोंके साथ इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की॥ ४ ॥

'आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं। उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए॥

'कश्यपसे विवस्वान्‌का जन्म हुआ। विवस्वान्के पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे। मनुके पुत्र इक्ष्वाकु हुए॥ ६ ॥

'जिन्हें मनुने सबसे पहले इस पृथ्वीका समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकुको तुम अयोध्याका प्रथम राजा समझो॥ ७ ॥

'इक्ष्वाकुके पुत्र श्रीमान् कुक्षिके नामसे विख्यात हुए। कुक्षिके वीर पुत्र विकुक्षि हुए॥ ८ ॥

'विकुक्षिके महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए। बाणके महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे॥

'सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज अनरण्यके राज्यमें कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ॥ १० ॥

‘महाराज! अनरण्यसे राजा पृथु हुए। उन पृथुसे महातेजस्वी त्रिशंकुकी उत्पत्ति हुई॥ ११ ॥

‘वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्रके सत्य वचनके प्रभावसे सदेह स्वर्गलोकको चले गये थे। त्रिशंकुके महायशस्वी धुन्धुमार हुए॥ १२ ॥

‘धुन्धुमारसे महातेजस्वी युवनाश्वका जन्म हुआ। युवनाश्वके पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए॥ १३ ॥

मान्धाताके महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए। सुसंधिके दो पुत्र हुए—ध्रुवसंधि और प्रसेनजित्॥ १४ ॥

‘ध्रुवसंधिके यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे। महाबाहु भरतसे असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ १५ ॥

‘जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे॥ १६ ॥

‘उन सबका सामना करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाकर युद्धके लिये डटे रहनेपर भी शत्रुओंकी संख्या अधिक होनेके कारण राजा असितको हारकर परदेशकी शरण लेनी पड़ी। वे रमणीय शैल-शिखरपर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभावसे परमात्माका मनन-चिन्तन करने लगे॥

‘सुना जाता है कि असितकी दो पत्नियाँ गर्भवती थीं। उनमेंसे एक महाभागा कमललोचना राजपत्नीने उत्तम पुत्र पानेकी अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशी च्यवन मुनिके चरणोंमें वन्दना की और दूसरी रानीने अपनी सौतके गर्भका विनाश करनेके लिये उसे जहर दे दिया॥

‘उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालयपर रहते थे। राजा असितकी कालिन्दी नामवाली पत्नीने ऋषिके चरणोंमें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया॥ २० ॥

‘मुनिने प्रसन्न होकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये वरदान चाहनेवाली रानीसे इस प्रकार कहा—‘देवि! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंशको चलानेवाला और शत्रुओंका संहारक होगा’॥ २१ ½ ॥

‘यह सुनकर रानीने मुनिकी परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँसे अपने घर आनेपर उस रानीने एक पुत्रको जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर थी और

नेत्र कमलदलके समान मनोहर थे॥ २२-२३ ॥

‘सौतने उसके गर्भको नष्ट करनेके लिये जो गर (विष) दिया था, उस गरके साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ २४ ॥

‘राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्वके दिन यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके खुदाऽके वेगसे इन समस्त प्रजाओंको भयभीत करते हुए अपने पुत्रोंद्वारा समुद्रको खुदवाया था॥

‘हमारे सुननेमें आया है कि सगरके पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्ममें प्रवृत्त होनेके कारण पिताने जीते-जी ही राज्यसे निकाल दिया था॥ २६ ॥

‘असमञ्जके पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे। अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए॥ २७ ॥

‘भगीरथसे ककुत्स्थका जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ‘काकुत्स्थ’ कहलाते हैं। ककुत्स्थके पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंशके लोग ‘राघव’ कहलाये॥ २८ ॥

‘रघुके तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होनेपर शापवश कुछ वर्षोंके लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे। वे इस पृथ्वीपर सौदास नामसे विख्यात थे॥

‘कल्माषपादके पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुननेमें आया है, जो युद्धमें सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे॥ ३० ॥

‘शङ्खणके शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए। सुदर्शनके पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्णके पुत्र शीघ्रग थे॥

‘शीघ्रगके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रशुश्रुव तथा प्रशुश्रुवके महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए॥ ३२ ॥

‘अम्बरीषके पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे। नहुषके पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे॥ ३३ ॥

‘नाभागके दो पुत्र हुए—अज और सुव्रत। अजके धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे॥ ३४ ॥

‘दशरथके ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ‘श्रीराम’ के नामसे प्रसिद्धि है। नरेश्वर! यह अयोध्याका राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देखभाल करते रहो॥ ३५ ॥

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके यहाँ ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता आया है। ज्येष्ठके होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है। ज्येष्ठ पुत्रका ही राजाके पदपर अभिषेक होता है॥ ३६ ॥

‘महायशस्वी श्रीराम! रघुवंशियोंका जो अपना सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो। बहुत-से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रन्तराशिसे सम्पन्न इस वसुधाका पिताकी भाँति पालन करो’॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११०॥