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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तीसरा सर्ग

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तीसरा सर्ग

लंकापुरीका अवलोकन करके हनुमान्‌जीका विस्मित होना, उसमें प्रवेश करते समय निशाचरी लंकाका उन्हें रोकना और उनकी मारसे विह्वल होकर उन्हें पुरीमें प्रवेश करनेकी अनुमति देना

ऊँचे शिखरवाले लंब (त्रिकूट) पर्वतपर जो महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ता था, बुद्धिमान् महाशक्तिशाली कपिश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान्‌ने सत्त्व-गुणका आश्रय ले रातके समय रावणपालित लंकापुरीमें प्रवेश किया। वह नगरी सुरम्य वन और जलाशयोंसे सुशोभित थी॥ १-२ ॥

शरत्कालके बादलोंकी भाँति श्वेत कान्तिवाले सुन्दर भवन उसकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ समुद्रकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द होता रहता था। सागरकी लहरोंको छूकर बहनेवाली वायु इस पुरीकी सेवा करती थी॥ ३ ॥

वह अलकापुरीके समान शक्तिशालिनी सेनाओंसे सुरक्षित थी। उस पुरीके सुन्दर फाटकोंपर मतवाले हाथी शोभा पाते थे। उस पुरीके अन्तर्द्वार और बहिर्द्वार दोनों ही श्वेत कान्तिसे सुशोभित थे॥ ४ ॥

उस नगरीकी रक्षाके लिये बड़े-बड़े सर्पोंका संचरण (आना-जाना) होता रहता है, इसलिये वह नागोंसे सुरक्षित सुन्दर भोगवतीपुरीके समान जान पड़ती थी। अमरावतीपुरीके समान वहाँ आवश्यकताके अनुसार बिजलियोंसहित मेघ छाये रहते थे। ग्रहों और नक्षत्रोंके सदृश विद्युत्-दीपोंके प्रकाशसे वह पुरी प्रकाशित थी तथा प्रचण्ड वायुकी ध्वनि वहाँ सदा होती रहती थी॥ ५ १/२ ॥

सोनेके बने हुए विशाल परकोटेसे घिरी हुई लंकापुरी क्षुद्र घंटिकाओंकी झनकारसे युक्त पताकाओंद्वारा अलंकृत थी॥ ६ १/२ ॥

उस पुरीके समीप पहुँचकर हर्ष और उत्साहसे भरे हुए हनुमान्‌जी सहसा उछलकर उसके परकोटेपर चढ़ गये। वहाँ सब ओरसे लंकापुरीका अवलोकन करके हनुमान्‌जीका चित्त आश्चर्यसे चकित हो उठा॥ ७ १/२ ॥

सुवर्णके बने हुए द्वारोंसे उस नगरीकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उन सभी द्वारोंपर नीलमके चबूतरे बने हुए थे। वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों और मोतियोंसे जड़े गये थे। मणिमयी फर्शों उनकी

शोभा बढ़ा रही थीं। उनके दोनों ओर तपाये सुवर्णके बने हुए हाथी शोभा पाते थे। उन द्वारोंका ऊपरी भाग चाँदीसे निर्मित होनेके कारण स्वच्छ और श्वेत था। उनकी सीढ़ियाँ नीलमकी बनी हुई थीं। उन द्वारोंके भीतरी भाग स्फटिक मणिके बने हुए और धूलसे रहित थे। वे सभी द्वार रमणीय सभा-भवनोंसे युक्त और सुन्दर थे तथा इतने ऊँचे थे कि आकाशमें उठे हुए-से जान पड़ते थे॥ ८—१० ॥

वहाँ क्रौञ्च और मयूरोंके कलरव गूँजते रहते थे, उन द्वारोंपर राजहंस नामक पक्षी भी निवास करते थे। वहाँ भाँति-भाँतिके वाद्यों और आभूषणोंकी मधुर ध्वनि होती रहती थी, जिससे लंकापुरी सब ओरसे प्रतिध्वनित हो रही थी॥ ११ ॥

कुबेरकी अलकाके समान शोभा पानेवाली लंकानगरी त्रिकूटके शिखरपर प्रतिष्ठित होनेके कारण आकाशमें उठी हुई-सी प्रतीत होती थी। उसे देखकर कपिवर हनुमान्‌को बड़ा हर्ष हुआ॥ १२ ॥

राक्षसराजकी वह सुन्दर पुरी लंका सबसे उत्तम और समृद्धिशालिनी थी। उसे देखकर पराक्रमी हनुमान् इस प्रकार सोचने लगे—॥ १३ ॥

‘रावणके सैनिक हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये इस पुरीकी रक्षा करते हैं, अतः दूसरा कोई बलपूर्वक इसे अपने काबूमें नहीं कर सकता॥ १४ ॥

‘केवल कुमुद, अंगद, महाकपि सुषेण, मैन्द, द्विविद, सूर्यपुत्र सुग्रीव, वानर कुशपर्वा और वानरसेनाके प्रमुख वीर ऋक्षराज जाम्बवान्‌की तथा मेरी भी पहुँच इस पुरीके भीतर हो सकती है’॥ १५-१६ ॥

फिर महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मणके पराक्रमका विचार करके कपिवर हनुमान्‌को बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १७ ॥

महाकपि हनुमान्‌ने देखा, राक्षसराज रावणकी नगरी लंका वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी युवतीके समान जान पड़ती है। रत्नमय परकोटे ही इसके वस्त्र हैं, गोष्ठ (गोशाला) तथा दूसरे-दूसरे भवन आभूषण हैं। परकोटोंपर लगे हुए यन्त्रोंके जो गृह हैं, ये ही मानो इस लंकारूपी युवतीके स्तन हैं। यह सब प्रकारकी समृद्धियोंसे सम्पन्न है। प्रकाशपूर्ण द्वीपों और महान् ग्रहोंने यहाँका अन्धकार नष्ट कर दिया है॥ १८-१९ ॥

तदनन्तर वानरश्रेष्ठ महाकपि पवनकुमार हनुमान् उस पुरीमें प्रवेश करने लगे। इतनेमें ही उस नगरीकी अधिष्ठात्री देवी लंकाने अपने स्वाभाविक रूपमें प्रकट होकर उन्हें देखा॥ २० ॥

वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌को देखते ही रावणपालित लंका स्वयं ही उठ खड़ी हुई। उसका मुँह देखनेमें बड़ा विकट था॥ २१ ॥

वह उन वीर पवनकुमारके सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोरसे गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली—॥ २२ ॥

‘वनचारी वानर! तू कौन है और किस कार्यसे यहाँ आया है ? तुम्हारे प्राण जबतक बने हुए हैं, तबतक ही यहाँ आनेका जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक-ठीक बता दो॥ २३ ॥

‘वानर! रावणकी सेना सब ओरसे इस पुरीकी रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लंकामें प्रवेश नहीं कर सकता’॥ २४ ॥

तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लंकासे बोले—‘क्रूर स्वभाववाली नारी! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक-ठीक बता दूँगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं। तू इस नगरके द्वारपर खड़ी है। क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है’॥ २५-२६ ॥

हनुमान्‌जीकी यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लंका कुपित हो उन पवनकुमारसे कठोर वाणीमें बोली—॥ २७ ॥

‘मैं महामना राक्षसराज रावणकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेवाली उनकी सेविका हूँ। मुझपर आक्रमण करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। मैं इस नगरीकी रक्षा करती हूँ॥ २८ ॥

‘मेरी अवहेलना करके इस पुरीमें प्रवेश करना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है। आज मेरे हाथसे मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वीपर शयन करेगा॥ २९ ॥

‘वानर! मैं स्वयं ही लंका नगरी हूँ, अतः सब ओरसे इसकी रक्षा करती हूँ। यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणीका प्रयोग किया है’॥ ३० ॥

लंकाकी यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतनेके लिये यत्नशील हो दूसरे पर्वतके समान वहाँ खड़े हो गये॥ ३१ ॥

लंकाको विकराल राक्षसीके रूपमें देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने उससे इस प्रकार कहा—॥ ३२ ॥

‘मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगरद्वारोंसहित इस लंका नगरीको देखूँगा। इसी प्रयोजनसे यहाँ आया हूँ। इसे देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है॥

‘इस लंकाके जो वन, उपवन, कानन और मुख्य-मुख्य भवन हैं, उन्हें देखनेके लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है’॥ ३४ ॥

हनुमान्‌जीका यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लंका पुनः कठोर वाणीमें बोली— ॥

‘खोटी बुद्धिवाले नीच वानर! राक्षसेश्वर रावणके द्वारा मेरी रक्षा हो रही है। तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरीको नहीं देख सकता’॥ ३६ ॥

तब उन वानरशिरोमणिने उस निशाचरीसे कहा— ‘भद्रे! इस पुरीको देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा’॥ ३७ ॥

यह सुनकर लंकाने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌को बड़े जोरसे एक थप्पड़ मारा॥ ३८ ॥

लंकाद्वारा इस प्रकार जोरसे पीटे जानेपर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने बड़े जोरसे सिंहनाद किया॥ ३९ ॥

फिर उन्होंने अपने बायें हाथकी अंगुलियोंको मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लंकाको एक मुक्का जमा दिया॥ ४० ॥

उसे स्त्री समझकर हनुमान्‌जीने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया। किंतु उस लघु प्रहारसे ही उस निशाचरीके सारे अंग व्याकुल हो गये। वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी। उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था॥ ४१ ॥

अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लंकाकी ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमान्‌को उसपर दया आ गयी। उन्होंने उसपर बड़ी कृपा की॥

उधर अत्यन्त उद्विग्नरू हुई लंका उन वानरवीर हनुमान्‌से अभिमानशून्य गद्गदवाणीमें इस प्रकार बोली— ॥ ४३ ॥

‘महाबाहो! प्रसन्न होइये। कपिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये। सौम्य! महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्रकी मर्यादापर स्थिर रहते हैं (शास्त्रमें स्त्रीको अवध्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये)॥

‘महाबली वीर वानर! मैं स्वयं लंकापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर दिया है॥ ४५ ॥

‘वानरेश्वर! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ। आप इसे सुनिये। साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीने मुझे जैसा वरदान दिया था, वह बता रही हूँ॥ ४६॥

‘उन्होंने कहा था— ‘जब कोर्इ वानर तुझे अपने पराक्रमसे वशमें कर ले, तब तुझे यह समझ लेना चाहिये कि अब राक्षसोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है॥ ४७॥

‘सौम्य! आपका दर्शन पाकर आज मेरे सामने वही घड़ी आ गयी है। ब्रह्माजीने जिस सत्यका निश्चय कर दिया है, उसमें कोर्इ उलट-फेर नहीं हो सकता॥ ४८॥

‘अब सीताके कारण दुरात्मा राजा रावण तथा समस्त राक्षसोंके विनाशका समय आ पहुँचा है॥ ४९॥

‘कपिश्रेष्ठ! अतः आप इस रावणपालित पुरीमें प्रवेश कीजिये और यहाँ जो-जो कार्य करना चाहते हों, उन सबको पूर्ण कर लीजिये॥ ५०॥

‘वानरेश्वर! राक्षसराज रावणके द्वारा पालित यह सुन्दर पुरी अभिशापसे नष्टप्राय हो चुकी है। अतः इसमें प्रवेश करके आप स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक सर्वत्र सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये’॥ ५१॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥

३॥