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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छियासीवाँ सर्ग

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छियासीवाँ सर्ग

वानरों और राक्षसोंका युद्ध, हनुमान्जीके द्वारा राक्षससेनाका संहार और उनका इन्द्रजित्को द्वन्द्वयुद्धके लिये ललकारना तथा लक्ष्मणका उसे देखना

उस अवस्थामें रावणके छोटे भाई विभीषणने लक्ष्मणसे ऐसी बात कही, जो उनके अभीष्ट अर्थको सिद्ध करनेवाली तथा शत्रुओंके लिये अहितकर थी॥ १ ॥

वे बोले—'लक्ष्मण! यह सामने जो मेघोंकी काली घटाके समान राक्षसोंकी सेना दिखायी देती है, उसके साथ शिलारूपी आयुध धारण करनेवाले वानरवीर शीघ्र ही युद्ध छेड़ दें और आप भी इस विशाल वाहिनीके व्यूहका भेदन करनेका प्रयत्न करें। इसका मोर्चा टूटनेपर राक्षसराजका पुत्र इन्द्रजित् भी हमें यहीं दिखायी देगा॥ २-३ ॥

'अतः आप इस हवन-कर्मकी समाप्तिके पहले ही वज्रतुल्य बाणोंकी वर्षा करते हुए शत्रुओंपर शीघ्र धावा कीजिये॥ ४ ॥

'वीर! वह दुरात्मा रावणकुमार बड़ा ही मायावी, अधर्मी, क्रूर कर्म करनेवाला और सम्पूर्ण लोकोंके लिये भयंकर है; अतः इसका वध कीजिये'॥ ५ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणने राक्षसराजके पुत्रको लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ६ ॥

साथ ही बड़े-बड़े वृक्ष लेकर युद्ध करनेवाले वानर और भालू भी वहाँ खड़ी हुई राक्षस-सेनापर एक साथ ही टूट पड़े॥ ७ ॥

उधरसे राक्षस भी वानरसेनाको नष्ट करनेकी इच्छासे समराङ्गणमें तीखे बाणों, तलवारों, शक्तियों और तोमरोंका प्रहार करते हुए उनका सामना करने लगे॥ ८ ॥

इस प्रकार वानरों और राक्षसोंमें घमासान युद्ध होने लगा। उसके महान् कोलाहलसे समूची लङ्कापुरी सब ओरसे गूँज उठी॥ ९ ॥

नाना प्रकारके शस्त्रों, पैने बाणों, उठे हुए वृक्षों और भयानक पर्वत-शिखरोंसे वहाँका आकाश आच्छादित हो गया॥ १० ॥

विकट मुँह और बाँहोंवाले राक्षसोंने वानरयूथ पतियोंपर (नाना प्रकारके) शस्त्रोंका प्रहार करते हुए उनके लिये महान् भय उपस्थित कर दिया॥ ११ ॥

उसी प्रकार वानर भी समराङ्गणमें सम्पूर्ण वृक्षों और पर्वतशिखरोंद्वारा समस्त राक्षसोंको मारने एवं हताहत करने लगे॥ १२ ॥

मुख्य-मुख्य महाकाय महाबली रीछों और वानरोंसे जूझते हुए राक्षसोंको महान् भय लगने लगा॥ १३ ॥

रावणकुमार इन्द्रजित् बड़ा दुर्धर्ष वीर था। उसने जब सुना कि मेरी सेना शत्रुओंद्वारा पीड़ित होकर बड़े दुःखमें पड़ गयी है, तब अनुष्ठान समाप्त होनेके पहले ही वह युद्धके लिये उठ खड़ा हुआ॥ १४ ॥

उस समय उसके मनमें बड़ा क्रोध उत्पन्न हुआ था। वह वृक्षोंके अन्धकारसे निकलकर एक सुसज्जित रथपर आरूढ़ हुआ, जो पहलेसे ही जोतकर तैयार रखा गया था। वह रथ बहुत ही सुदृढ़ था॥ १५ ॥

इन्द्रजित्के हाथमें भयंकर धनुष और बाण थे। वह काले कोयलेके ढेर-सा जान पड़ता था। उसके मुँह और नेत्र लाल थे। वह भयंकर राक्षस विनाशकारी मृत्युके समान प्रतीत होता था॥ १६ ॥

इन्द्रजित् रथपर बैठ गया, यह देखते ही लक्ष्मणके साथ युद्धकी इच्छा रखनेवाले भयंकर वेगशाली राक्षसोंकी वह सेना उसके आसपास सब ओर खड़ी हो गयी॥ १७ ॥

उस समय शत्रुओंका दमन करनेवाले पर्वतके समान विशालकाय हनुमान्जीने एक बहुत बड़े वृक्षको, जिसे तोड़ना या उखाड़ना कठिन था, उखाड़ लिया॥ १८ ॥

फिर तो वे वानरवीर प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे और युद्धस्थलमें राक्षसोंकी उस सेनाको दग्ध करते हुए बहुसंख्यक वृक्षोंकी मारसे अचेत करने लगे॥

पवनकुमार हनुमान्जी बड़े वेगसे राक्षस-सेनाका विध्वंस कर रहे हैं, यह देखते ही सहस्रों राक्षस उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे॥ २० ॥

चमकीले शूल धारण करनेवाले राक्षस शूलोंसे, जिनके हाथोंमें तलवारें थीं वे तलवारोंसे, शक्तिधारी शक्तियोंसे और पट्टिशधारी राक्षस पट्टिशोंसे उनपर प्रहार करने लगे॥ २१ ॥

बहुत-से परिघों, गदाओं, सुन्दर भालों, सैकड़ों शतघ्नियों, लोहेके बने हुए मुद्गरों, भयानक फरसों, भिन्दिपालों, वज्रके समान मुक्कों और अशनितुल्य थप्पड़ोंसे वे समस्त राक्षस पास

आकर सब ओरसे पर्वताकार हनुमान्‌जीपर प्रहार करने लगे। हनुमान्‌जीने कुपित होकर उनका भी महान् संहार किया॥ २२—२४ ॥

इन्द्रजित्ने देखा, कपिवर पवनकुमार हनुमान् पर्वतके समान अचल हो निःशङ्कभावसे अपने शत्रुओंका संहार कर रहे हैं॥ २५ ॥

यह देखकर उसने अपने सारथिसे कहा— ‘जहाँ यह वानर युद्ध करता है, वहीं चलो। यदि उसकी उपेक्षा की गयी तो यह हम सब राक्षसोंका विनाश ही कर डालेगा’॥ २६ ॥

उसके ऐसा कहनेपर सारथि रथपर बैठे हुए अत्यन्त दुर्जय वीर इन्द्रजित्को ढोता हुआ उस स्थानपर गया, जहाँ पवनपुत्र हनुमान्‌जी विराजमान थे॥ २७ ॥

वहाँ पहुँचकर उस दुर्जय राक्षसने हनुमान्‌जीके मस्तकपर बाणों, तलवारों, पट्टिशों और फरसोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ २८ ॥

उन भयानक शस्त्रोंको अपने शरीरपर झेलकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी महान् रोषसे भर गये और इस प्रकार बोले— ॥ २९ ॥

‘दुर्बुद्धि रावणकुमार! यदि बड़े शूरवीर हो तो आओ, मेरे साथ मल्लयुद्ध करो। इस वायुपुत्रसे भिड़कर जीवित नहीं लौट सकोगे॥ ३० ॥

‘दुर्मते! अपनी भुजाओंद्वारा मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध करो। इस बाहुयुद्धमें यदि मेरा वेग सह लो तो तुम राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर समझे जाओगे’॥ ३१ ॥

रावणकुमार इन्द्रजित् धनुष उठाकर हनुमान्‌जीका वध करना चाहता था। इसी अवस्थामें विभीषणने लक्ष्मणको उसका परिचय दिया— ॥ ३२ ॥

‘सुमित्रानन्दन! रावणका जो पुत्र इन्द्रको भी जीत चुका है, वही यह रथपर बैठकर हनुमान्‌जीका वध करना चाहता है। अतः आप शत्रुओंका विदारण करनेवाले, अनुपम आकार-प्रकारसे युक्त एवं प्राणान्तकारी भयंकर बाणोंद्वारा उस रावणकुमारको मार डालिये’॥ ३३-३४ ॥

शत्रुओंको भयभीत करनेवाले विभीषणके ऐसा कहनेपर उस समय महात्मा लक्ष्मणने रथपर बैठे हुए उस भयंकर बलशाली पर्वताकार दुर्जय राक्षसको देखा॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८६ ॥