श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ बाईसवाँ सर्ग
एक सौ बाईसवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे विभीषणद्वारा वानरोंका विशेष सत्कार तथा सुग्रीव और विभीषणसहित वानरोंको साथ लेकर श्रीरामका पुष्पकविमानद्वारा अयोध्याको प्रस्थान करना
फूलोंसे सजे हुए पुष्पकविमानको वहाँ उपस्थित करके पास ही खड़े हुए विभीषणने श्रीरामसे कुछ कहनेका विचार किया॥ १ ॥
राक्षसराज विभीषणने दोनों हाथ जोड़कर बड़ी विनय और उतावलीके साथ श्रीरघुनाथजीसे पूछा— ‘प्रभो! अब मैं क्या सेवा करूँ?’॥ २ ॥
तब महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने कुछ सोचकर लक्ष्मणके सुनते हुए यह स्नेहयुक्त वचन कहा— ॥ ३ ॥
‘विभीषण! इन सारे वानरोंने युद्धमें बड़ा यन्त एवं परिश्रम किया है; अतः तुम नाना प्रकारके रत्न और धन आदिके द्वारा इन सबका सत्कार करो॥ ४ ॥
‘राक्षसेश्वर! ये वीर वानर संग्रामसे कभी पीछे नहीं हटते हैं और सदा हर्ष एवं उत्साहसे भरे रहते हैं। प्राणोंका भय छोड़कर लड़नेवाले इन वानरोंके सहयोगसे तुमने लङ्कापर विजय पायी है॥ ५ ॥
‘ये सभी वानर इस समय अपना काम पूरा कर चुके हैं, अतः इन्हें रत्न और धन आदि देकर तुम इनके इस कर्मको सफल करो॥ ६ ॥
‘तुम कृतज्ञ होकर जब इनका इस प्रकार सम्मान और अभिनन्दन करोगे, तब ये वानरयूथपति बहुत संतुष्ट होंगे॥ ७ ॥
‘ऐसा करनेसे सब लोग यह जानेंगे कि विभीषण उचित अवसरपर धनका त्याग एवं दान करते हैं, यथासमय न्यायोचित रीतिसे धन और रत्न आदिका संग्रह करते रहते हैं, दयालु हैं और जितेन्द्रिय हैं; इसलिये तुम्हें ऐसा करनेके लिये समझा रहा हूँ॥ ८ ॥
‘नरेश्वर! जो राजा सेवकोंमें प्रेम उत्पन्न करनेवाले दान-मान आदि सब गुणोंसे रहित होता है, उसे युद्धके अवसरपर उद्विग्न हुई सेना छोड़कर चल देती है, वह समझती है कि यह व्यर्थ ही हमारा वध करा रहा है— हमारे भरण-पोषणका या योग-क्षेमकी चिन्ता इसे बिलकुल नहीं है’॥ ९ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर विभीषणने उन सब वानरोंको रत्न और धन देकर सभीका पूजन (सत्कार) किया॥ १० ॥
उन वानरयूथपतियोंको रत्न और धनसे पूजित हुआ देख उस समय भगवान् श्रीराम लजाती हुई मनस्विनी विदेहकुमारीको अङ्कमें लेकर पराक्रमी धनुर्धर बन्धु लक्ष्मणके साथ उस उत्तम विमानपर आरूढ हुए॥
विमानपर बैठकर समस्त वानरोंका समादर करते हुए उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामने विभीषणसहित महापराक्रमी सुग्रीवसे कहा—॥ १३ ॥
‘वानरश्रेष्ठ वीरो! आपलोगोंने अपने इस मित्रका कार्य मित्रोचित रीतिसे ही भलीभाँति सम्पन्न किया। अब आप सब अपने-अपने अभीष्ट स्थानोंको चले जायँ॥
‘सखे सुग्रीव! एक हितैषी एवं प्रेमी मित्रको जो काम करना चाहिये, वह सब तुमने पूरा-पूरा कर दिखाया; क्योंकि तुम अधर्मसे डरनेवाले हो॥ १५ ॥
‘वानरराज! अब तुम अपनी सेनाके साथ शीघ्र ही किष्किन्धापुरीको चले जाओ। विभीषण! तुम भी लङ्कामें मेरे दिये हुए अपने राज्यपर स्थिर रहो; अब इन्द्र आदि देवता भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं॥ १६ ॥
‘अब इस समय मैं अपने पिताकी राजधानी अयोध्याको जाऊँगा। इसके लिये आप सब लोगोंसे पूछता हूँ और सबकी अनुमति चाहता हूँ’॥ १७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी वानर-सेनापति तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर कहने लगे—॥
‘भगवन्! हम भी अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, आप हमें भी अपने साथ ले चलिये। वहाँ हम प्रसन्नतापूर्वक वनों और उपवनोंमें विचरेंगे॥ १९ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! राज्याभिषेकके समय मन्त्रपूत जलसे भीगे हुए आपके श्रीविग्रहकी झाँकी करके माता कौसल्याके चरणोंमें मस्तक झुकाकर हम शीघ्र अपने घर लौट आयेंगे’॥ २० ॥
विभीषणसहित वानरोंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर श्रीरामने सुग्रीव तथा विभीषणसहित उन वानरोंसे कहा—॥ २१ ॥
‘मित्रो! यह तो मेरे लिये प्रियसे भी प्रिय बात होगी—परम प्रिय वस्तुका लाभ होगा, यदि मैं आप सभी सुहृदोंके साथ अयोध्यापुरीको चल सकूँ। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी॥
२२ ॥
‘सुग्रीव! तुम सब वानरोंके साथ शीघ्र ही इस विमानपर चढ़ जाओ। राक्षसराज विभीषण! तुम भी मन्त्रियोंके साथ विमानपर आरूढ़ हो जाओ’॥ २३ ॥
तब वानरोंसहित सुग्रीव और मन्त्रियोंसहित विभीषण बड़ी प्रसन्नताके साथ उस दिव्य पुष्पकविमानपर चढ़ गये॥ २४ ॥
उन सबके चढ़ जानेपर कुबेरका वह उत्तम आसन पुष्पकविमान श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर आकाशको उड़ चला॥ २५ ॥
आकाशमें पहुँचे हुए उस हंसयुक्त तेजस्वी विमानसे यात्रा करते हुए पुलकित एवं प्रसन्नचित्त श्रीराम साक्षात् कुबेरके समान शोभा पा रहे थे॥ २६ ॥
वे सब वानर, भालू और महाबली राक्षस उस दिव्य विमानमें बड़े सुखसे फैलकर बैठे हुए थे। किसीको किसीसे धक्का नहीं खाना पड़ता था॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२२ ॥