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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पंद्रहवाँ सर्ग

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पंद्रहवाँ सर्ग

सुग्रीवकी गर्जना सुनकर वालीका युद्धके लिये निकलना और ताराका उसे रोककर सुग्रीव और श्रीरामके साथ मैत्री कर लेनेके लिये समझाना

उस समय अमर्षशील वाली अपने अन्तःपुरमें था। उसने अपने भांऽइ महामना सुग्रीवका वह सिंहनाद वहींसे सुना॥ १ ॥

समस्त प्राणियोंको कम्पित कर देनेवाली उनकी वह गर्जना सुनकर उसका सारा मद सहसा उतर गया और उसे महान् क्रोध उत्पन्न हुआ॥ २ ॥

फिर तो सुवर्णके समान पीले रंगवाले वालीका सारा शरीर क्रोधसे तमतमा उठा। वह राहुग्रस्त सूर्यके समान तत्काल श्रीहीन दिखायी देने लगा॥ ३ ॥

वालीकी दाढ़ें विकराल थीं, नेत्र क्रोधके कारण प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे। वह उस तालाबके समान श्रीहीन दिखायी देता था, जिसमें कमलपुष्पोंकी शोभा तो नष्ट हो गयी हो और केवल मृणाल रह गये हों॥ ४ ॥

वह दुःसह शब्द सुनकर वाली अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको विदीर्ण-सी करता हुआ बड़े वेगसे निकला॥ ५ ॥

उस समय वालीकी पत्नी तारा भयभीत हो घबरा उठी। उसने वालीको अपनी दोनों भुजाओंमें भर लिया और स्नेहसे सौहार्दका परिचय देते हुए परिणाममें हित करनेवाली यह बात कही—॥ ६ ॥

‘वीर! मेरी अच्छी बात सुनिये और सहसा आये हुए नदीके वेगकी भाँति इस बढ़े हुए क्रोधको त्याग दीजिये। जैसे प्रातःकाल शय्यासे उठा हुआ पुरुष रातको उपभोगमें लायी गयी पुष्पमालाका त्याग कर देता है; उसी प्रकार इस क्रोधका परित्याग कीजिये॥ ७ ॥

‘वानरवीर! कल प्रातःकाल सुग्रीवके साथ युद्ध कीजियेगा (इस समय रुक जाइये) यद्यपि युद्धमें कोंऽइ शत्रु आपसे बढ़कर नहीं है और आप किसीसे छोटे नहीं हैं। तथापि इस समय सहसा आपका घरसे बाहर निकलना मुझे अच्छा नहीं लगता है, आपको रोकनेका एक विशेष कारण भी है। उसे बताती हूँ, सुनिये॥ ८-९ ॥

‘सुग्रीव पहले भी यहाँ आये थे और क्रोधपूर्वक उन्होंने आपको युद्धके लिये ललकारा था। उस समय आपने नगरसे निकलकर उन्हें परास्त किया और वे आपकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भागते हुए मातङ्ग वनमें चले गये थे॥ १० ॥

‘इस प्रकार आपके द्वारा पराजित और विशेष पीड़ित होनेपर भी वे पुनः यहाँ आकर आपको युद्धके लिये ललकार रहे हैं। उनका यह पुनरागमन मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रहा है॥ ११ ॥

‘इस समय गर्जते हुए सुग्रीवका दर्प और उद्योग जैसा दिखायी देता है तथा उनकी गर्जनामें जो उत्तेजना जान पड़ती है, इसका कोऽइ छोटा-मोटा कारण नहीं होना चाहिये॥ १२ ॥

‘मैं समझती हूँ सुग्रीव किसी प्रबल सहायकके बिना अबकी बार यहाँ नहीं आये हैं। किसी सबल सहायकको साथ लेकर ही आये हैं, जिसके बलपर ये इस तरह गरज रहे हैं॥ १३ ॥

‘वानर सुग्रीव स्वभावसे ही कार्यकुशल और बुद्धिमान् हैं। वे किसी ऐसे पुरुषके साथ मैत्री नहीं करेंगे, जिसके बल और पराक्रमको अच्छी तरह परख न लिया हो॥ १४ ॥

‘वीर! मैंने पहले ही कुमार अङ्गदके मुँहसे यह बात सुन ली है। इसलिये आज मैं आपके हितकी बात बताती हूँ॥ १५ ॥

‘एक दिन कुमार अङ्गद वनमें गये थे। वहाँ गुप्तचरोंने उन्हें एक समाचार बताया, जो उन्होंने यहाँ आकर मुझसे भी कहा था॥ १६ ॥

‘वह समाचार इस प्रकार है—अयोध्यानरेशके दो शूर-वीर पुत्र, जिन्हें युद्धमें जीतना अत्यन्त कठिन है, जिनका जन्म इक्ष्वाकुकुलमें हुआ है तथा जो श्रीराम और लक्ष्मणके नामसे प्रसिद्ध हैं, यहाँ वनमें आये हुए हैं॥ १७ ॥

‘वे दोनों दुर्जय वीर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये उनके पास पहुँच गये हैं। उन दोनोंमेंसे जो आपके भाऽइके युद्ध-कर्ममें सहायक बताये गये हैं, वे श्रीराम शत्रुसेनाका संहार करनेवाले तथा प्रलयकालमें प्रज्वलित हुऽइ अग्निके समान तेजस्वी हैं। वे साधु पुरुषोंके आश्रयदाता कल्पवृक्ष हैं और संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके लिये सबसे बड़ा सहारा हैं॥ १८-१९ ॥

‘आर्त पुरुषोंके आश्रय, यशके एकमात्र भाजन, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा पिताकी आज्ञामें स्थित रहनेवाले हैं॥ २० ॥

‘जैसे गिरिराज हिमालय नाना धातुओंकी खान है, उसी प्रकार श्रीराम उत्तम गुणोंके बहुत बड़े भंडार हैं। अतः उन महात्मा रामके साथ आपका विरोध करना कदापि उचित नहीं है। क्योंकि वे युद्धकी कलामें अपना सानी नहीं रखते हैं। उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥ २१ १/२ ॥

‘शूरवीर! मैं आपके गुणोंमें दोष देखना नहीं चाहती। अतः आपसे कुछ कहती हूँ। आपके लिये जो हितकर है, वही बता रही हूँ। आप उसे सुनिये और वैसा ही कीजिये॥ २२ १/२ ॥

‘अच्छा यही होगा कि आप सुग्रीवका शीघ्र ही युवराजके पदपर अभिषेक कर दीजिये। वीर वानरराज! सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं, उनके साथ युद्ध न कीजिये॥

‘मैं आपके लिये यही उचित समझती हूँ कि आप वैरभावको दूर हटाकर श्रीरामके साथ सौहार्द और सुग्रीवके साथ प्रेमका सम्बन्ध स्थापित कीजिये॥ २४ १/२ ॥

‘वानर सुग्रीव आपके छोटे भाई हैं। अतः आपका लाड़-प्यार पानेके योग्य हैं। वे ऋष्यमूकपर रहें या किष्किन्धामें—सर्वथा आपके बन्धु ही हैं। मैं इस भूतलपर उनके समान बन्धु और किसीको नहीं देखती हूँ॥ २५-२६ ॥

‘आप दान-मान आदि सत्कारोंके द्वारा उन्हें अपना अत्यन्त अन्तरङ्ग बना लीजिये, जिससे वे इस वैरभावको छोड़कर आपके पास रह सकें॥ २७ ॥

‘पुष्ट ग्रीवावाले सुग्रीव आपके अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं, ऐसा मेरा मत है। इस समय भ्रातृप्रेमका सहारा लेनेके सिवा आपके लिये यहाँ दूसरी कोई गति नहीं है॥ २८ ॥

‘यदि आपको मेरा प्रिय करना हो तथा आप मुझे अपनी हितकारिणी समझते हों तो मैं प्रेमपूर्वक याचना करती हूँ, आप मेरी यह नेक सलाह मान लीजिये॥ २९ ॥

‘स्वामिन्! आप प्रसन्न होइये। मैं आपके हितकी बात कहती हूँ। आप इसे ध्यान देकर सुनिये। केवल रोषका ही अनुसरण न कीजिये। कोसलराजकुमार श्रीराम इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। उनके साथ वैर बाँधना या युद्ध छेड़ना आपके लिये कदापि उचित नहीं है’॥

उस समय ताराने वालीसे उसके हितकी ही बात कही थी और यह लाभदायक भी थी। किंतु उसकी बात उसे नहीं रुची। क्योंकि उसके विनाशका समय निकट था और वह कालके पाशमें बँध चुका था॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १५॥