श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अस्सीवाँ सर्ग
अस्सीवाँ सर्ग
राजा दण्डका भार्गव-कन्याके साथ बलात्कार
महर्षि कुम्भज श्रीरामसे इतनी कथा कहकर फिर इसीका अवशिष्ट अंश इस तरह कहने लगे— ॥ १ ॥
‘काकुत्स्थ! तदनन्तर राजा दण्डने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर बहुत वर्षोंतक वहाँ अकण्टक राज्य किया॥ २ ॥
‘तत्पश्चात् किसी समय राजा मनोरम चैत्रमासमें शुक्राचार्यके रमणीय आश्रमपर आया॥ ३ ॥
‘वहाँ शुक्राचार्यकी सर्वोत्तम सुन्दरी कन्या, जिसके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी, वनप्रान्तमें विचर रही थी। दण्डने उसे देखा॥ ४ ॥
‘उसे देखते ही वह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हो पास जाकर उस डरी हुई कन्यासे बोला— ॥ ५ ॥
‘“सुश्रोणि! तुम कहाँसे आयी हो अथवा शुभे! तुम किसकी पुत्री हो? शुभानने! मैं कामदेवसे पीड़ित हूँ; इसलिये तुम्हारा परिचय पूछता हूँ” ॥ ६ ॥
‘मोहसे उन्मत्त होकर वह कामी राजा जब इस प्रकार पूछने लगा, तब भृगुकन्याने विनयपूर्वक उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ७ ॥
‘“राजेन्द्र! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं पुण्यकर्मा शुक्रदेवताकी ज्येष्ठ पुत्री हूँ। मेरा नाम अरजा है। मैं इसी आश्रममें निवास करती हूँ॥ ८ ॥
‘“राजन्! बलपूर्वक मेरा स्पर्श न करो। मैं पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ। राजेन्द्र! मेरे पिता तुम्हारे गुरु हैं और तुम उन महात्माके शिष्य हो॥ ९ ॥
‘“नरश्रेष्ठ! वे महातपस्वी हैं। यदि कुपित हो जायँ तो तुम्हें बड़ी भारी विपत्तिमें डाल सकते हैं। यदि मुझसे तुम्हें दूसरा ही काम लेना हो (अर्थात् यदि तुम मुझे अपनी भार्या बनाना चाहते हो) तो धर्मशास्त्रोक्त सन्मार्गसे चलकर मेरे महातेजस्वी पितासे मुझको माँग लो। अन्यथा तुम्हें अपने स्वेच्छाचारका बड़ा भयानक फल भोगना पड़ेगा॥ १०-११ ॥
“मेरे पिता अपनी क्रोधाग्निसे सारी त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं; अतः सुन्दर अङ्गोंवाले नरेश! तुम बलात्कार न करो। तुम्हारे याचना करनेपर पिताजी मुझे अवश्य तुम्हारे हाथमें सौंप देंगे”॥ १२ ॥
‘जब अरजा ऐसी बातें कह रही थीं, उस समय कामके अधीन हुए दण्डने मदोन्मत्त होकर दोनों हाथ सिरपर जोड़ लिये और इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ ॥
“सुन्दरी! कृपा करो। समय न बिताओ। वरानने! तुम्हारे लिये मेरे प्राण निकले जा रहे हैं॥ १४ ॥
“तुम्हें प्राप्त कर लेनेपर मेरा वध हो जाय अथवा मुझे अत्यन्त दारुण दुःख प्राप्त हो तो भी को◌्ऽइ चिन्ता नहीं है। भीरु! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। अत्यन्त व्याकुल हुए मुझ अपने सेवकको स्वीकार करो”॥ १५ ॥
‘ऐसा कहकर उस बलवान् नरेशने उस भार्गव-कन्याको बलपूर्वक दोनों भुजाओंमें भर लिया। वह उसकी पकड़से छूटनेके लिये छटपटाने लगी तो भी उसने अपनी इच्छाके अनुसार उसके साथ समागम किया॥ १६ ॥
‘वह अत्यन्त दारुण एवं महाभयंकर अनर्थ करके दण्ड तुरंत ही अपने उत्तम नगर मधुमन्तको चला गया॥ १७ ॥
‘अरजा भी भयभीत हो रोती हु◌्ऽइ आश्रमके पास ही अपने देवतुल्य पिताके आनेकी राह देखने लगी’॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८० ॥