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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पुरुष, न्याय से मिले धन से शुद्ध हैं वे ही शुद्ध हैं। केवल मिट्टी
जल से शुद्ध होनेवाले पवित्र नहीं माने जाते। विद्वान् क्षमा से,
यज्ञ आदि न करनेवाले दान से, पापी जप से और वेदविशारद
तप से पवित्र होते हैं ॥ १०५-१०७ ॥

मृत्तोयैः शुध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुध्यति ।
रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ १०६॥
एष शौचस्य वः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः ।
नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धेः शृणुत निर्णयम् ॥११०॥

अपवित्र पदार्थ मिट्टी और जल से शुद्ध होते हैं । नदी वेग से
शुद्ध होती है। मन से दूषित स्त्री रजस्वला होने से शुद्ध होती है
और ब्राह्मण त्याग से शुद्ध होता है। जल से शरीर शुद्ध होते हैं ।
मन सत्यभाषण से शुद्ध होता है । इस प्रकार शरीरशुद्धि का
निर्णय कहा है अब द्रव्य शुद्धि का निर्णय कहेंगे ॥ १०८-११० ॥

तैजसानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च ।
भस्मनाद्भिर्मृदाचैव शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः ॥ १११ ॥
निर्लेपं काञ्चनं भाण्डमद्भिरेव विशुध्यति ।
अब्जमश्ममयं चैव रजतं चानुपस्कृतम् ॥ ११२ ॥
अपामग्नेश्च संयोगाद्धैमं रौप्यं च निर्बभौ ।
तस्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ॥ ११३ ॥
ताम्रायः कांस्यरैत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च ।
शौचे यथार्हं कर्तव्यं क्षाराम्लोदकवारिभिः ॥ ११४ ॥

१८० मनुस्मृति ।
द्रव्याणां चैव सर्वेषां शुद्धिराप्लवनं स्मृतम्।
प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ॥११५॥
पदार्थ-शुद्धि।
सुवर्ण आदि तेजस पदार्थ, मणि और सब पत्थर के पदार्थों की
शुद्धि राख, जल और मिट्टी से होती है। जिस में किसी भांति का
लेप न हो ऐसा सोना का पात्र, शंख, पत्थर और चांदी का पात्र जल
से ही शुद्ध होता है। सोना और चांदी अग्नि और जल के संयोग
से उत्पन्नहुए हैं इसलिये उनकी पवित्रता अपनी योनि से ही उत्तम
होती है। तांबा, लोहा, कांस, पीतल, जस्ता और सीसा का पात्र,
खार-खटाई और जल इनमें जिससे होतके उसी से शुद्ध कर लेना
चाहिए। घी, मधु आदि को पिघलाकर छान लेने से, जमे हुए का
प्रोक्षण से और लकड़ी के पात्रको छीलने से, शुद्धिहोती है१११-११५॥
मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि।
चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिःप्रक्षालनेन तु ॥११६॥
चरूणां स्रुक्स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा।
स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ॥११७॥
अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां धान्यवाससाम्।
प्रक्षालनेन त्वल्पानामद्भिः शौचं विधीयते ॥ ११८ ॥
चैलवच्चर्मणां शुद्धिर्वैदलानां तथैव च।
शाकमूलफलानां च धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ॥ ११९॥
कौशेयाविकयो रूषैः कुतपानामरिष्टकैः।
श्रीफलैरंशु पट्टानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ १२०॥
क्षौमवच्छङ्खशृङ्गाणामस्थिदन्तमयस्य च।
शुद्धिविजानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन वा ॥ १२१ ॥