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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

सातवां अध्याय । २३७

सातवां अध्याय । २३७
सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः ।
यथास्याभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥१७७॥
आयतिं सर्वकार्याणां तदात्वं न विचारयेत् ।
आयतीनां च सर्वेषां गुणदोषौ च तत्त्वतः ॥ १७८॥
आयत्यां गुणदोषज्ञस्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः ।
अतीते कार्यशेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ॥ १७६ ॥
और जब कि शत्रु के आधीन अपने को होता देखे तब झट-
पट धार्मिक और बलवान् राजा की शरण लेवे । जो दुष्ट मन्त्रि-
मण्डल आदि और शत्रुसेना को दबा सकता हो उस राजा की,
गुरु के समान, नित्य सेवा करे । और यदि उस आश्रयवाले राजा
से धोखा जाने तो निडर होकर युद्ध ही करे । नीतिवेत्ता राजा
को सब भांति से ऐसा बर्त्ताव करना चाहिए जिससे उसके मित्र,
उदासीन और शत्रु राजा बलवान् न हो जावें । सम्पूर्ण कार्यों
की वर्तमान, भूत और भविष्य स्थिति और उनके गुण-दोषों का
विचार किया करे । जो राजा कार्यों के भविष्य शुभाशुभ परिणाम
को जानता है, वर्तमान कार्य का शीघ्र निश्चय कर लेता है और बाक़ी
कामों को जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं कर सकते ॥१७४-१७६॥
यथैनं नाभिसंदध्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ।
तथा सर्वं संविदध्यादेष सामासिको नयः ॥ १८० ॥
यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्रं प्रति प्रभुः ।
तदानेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८१ ॥
जिस प्रकार मित्र, उदासीन और बैरी राजा अपने को पीड़ा
न दे सकें वैसे उपायों को करता रहे, यह नीति है। और जब
किसी बैरी के देश पर चढ़ाई करनी हो तो नीचे लिखी विधि
से धीरे धीरे यात्रा करे ॥ १८०-१८१ ॥

२३८ : मनुस्मृति।
मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः ।
फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥
अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् ।
तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥
कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि ।
उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यग् विधाय च ॥१८४॥
संशोध्यं विविधं मार्गं षड्विधं च बलं स्वकम् ।
सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥
शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत् ।
गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥
राजा अपनी सेना के वलावल का विचार करके, शुभ अगहन
या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे।
इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तब, अथवा
जब शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे। अपने नगर
की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा
और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना * को
ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु
के नगर को जावे। जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले
छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये
दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥
दण्डव्यूहेन तन्मार्गं यायात्तु शकटेन वा ।

  • छः प्रकार के बलः- हाथीसवार, घोड़ासवार, रथसवार, पैदल, खज़ाना
    और नौकर चाकर।