मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय। २११
सातवां अध्याय। २११
भी दण्डही से दबकर अपने भोग को भोग सकते हैं॥ २१-२३॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात् ॥ २४ ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥ २५ ॥
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ २६ ॥
तं राजा प्रणयन्सम्पक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ २७ ॥
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।
धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥ २८ ॥
दण्ड के बिना सब वर्ण विरुद्धाचरण में प्रवृत्त हो जावें और
चतुर्वर्गरूप पुल टूटजावे । और सबलोगों में उपद्रव हो जावे ।
जिस देश में श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, पापनाशक दण्ड बिचरता है और
राजा सब तरफ न्यायदृष्टि से देखता है, वहां प्रजा को दुःख
नहीं होता । जो राजा उस दण्ड का उचित प्रयोग करता है वह
अर्थ, धर्म और काम से वृद्धि पाता है। परन्तु कामी, क्षुद्रवृत्ति
हो तो उस दण्ड से स्वयं नष्ट हो जाता है। वास्तव में दण्ड में
बड़ा तेज है, उसका धारण साधारण राजा नहीं कर सकते हैं। धर्म
से चलित राजा को यह कुटुम्ब सहित नष्ट कर देता है ॥ २४-२८ ॥
ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् ।
अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन् देवांश्च पीडयेत् ॥ २९ ॥
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना ।
२१२ मनुस्मृति ।
न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३० ॥
शुचिना सत्यसंधेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१ ॥
उसके बाद क़िला, देश और चराचर जगत् का नाश करता
है। अन्तरिक्षवासी देवता और मुनियों को भी पीड़ा पहुँचाता
है। मन्त्री या सेना की सहायता से रहित, लोभी, मूर्ख, निर्बुद्धि,
विषयासक्त राजा से वह दण्ड अर्थात् राजधर्म नहीं चल सकता।
न्यायपूर्वक मिले धन से शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार बर्ताव
करनेवाला बुद्धिमान् राजा, मन्त्री आदि की सहायता से दण्ड-
विधान कर सकता है अर्थात् ऐसा राजा शिक्षा करने लायक़
होता है ॥ २६-३१ ॥
स्वराष्ट्रे न्यायवृत्तः स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु ।
सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः॥ ३२ ॥
एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोञ्छेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३ ॥
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥
स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५ ॥
राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा
दण्ड देनेवाला, हितैषियों से कुटिलता रहित और ब्राह्मणों पर
क्षमावान् होना चाहिए। ऐसा बर्ताव करनेवाले, शिलोञ्छवृत्ति
से भी जीते हुए राजा का यश लोक में जल में तेल की बूंद के
समान फैलता है । विषयासक्त और उक्तरीति से विपरीत
आचरण करनेवाले का यश पानी में घी के बूंद की भांति संकोच