मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
बारहवां अध्याय। ४५३
बारहवां अध्याय। ४५३
एक दूसरे को खानेवाले प्राणी होते हैं। चाण्डाली से संयोग
करनेवाले प्रेत होते हैं। पतितों से संसर्गी, परस्त्री और ब्राह्मण
धन हरनेवाला, ब्रह्मराक्षस होता है। मणि, मोती, मूँगा और
विचित्र रत्नों को चुराकर, हेमकार पक्षियों में जन्मता है। अन्न
चुराकर चूहा कांस की चोरी से हंस, जल चुराने से मेंढ़क,
मधु चुराने से मक्खी, दूध की चोरी से कौआ, रस चुराने से
कुत्ता और घी चुराने से नौला होता है ॥ ५५-६२ ॥
मांसं गृध्रो वसां मद्गुस्तैलं तैलपकः खगः ।
चीरीवाकस्तु लवणं बलाका शकुनिर्दधि ॥ ६३ ॥
कौशेयं तित्तिरिर्हित्वा क्षौमं हृत्वा तु दर्दुरः ।
कार्पासतान्तवं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुडम् ॥ ६४॥
छुच्छन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकं तु बर्हिणः ।
श्वावित्कृतान्नं विविधमकृतान्नं तु शल्यकः ॥ ६५ ॥
वको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्युपस्करम् ।
रक्तानि हृत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः ॥ ६६ ॥
वृको मृगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूलं तु मर्कटः ।
स्त्रीमृक्षः स्तोकको वारि यानान्युष्ट्रः पशूनजः ॥ ६७ ॥
यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः ।
अवश्यं याति तिर्यक्त्वं जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ॥ ६८॥
स्त्रियोऽप्येतेन कल्पेन हृत्वा दोषमवाप्नुयुः ।
एतेषामेव जन्तूनां भार्यात्वमुपयान्ति ताः ॥ ६६ ॥
स्वेभ्यः स्वेभ्यस्तु कर्मभ्यश्च्युता वर्णा ह्यनापदि।
पापान् संसृत्य संसारान् प्रेष्यतां यान्ति शत्रुषु ॥ ७०॥
४५४ मनुस्मृति ।
: मांस चुराने से गीध, चरबी चुराने से जलकाक, तेल की
चोरी से तैलपक पक्षी, लोन चुराने से झींगुर और दही की
चोरी से बलाका पक्षी होता है। रेशम चुराने से तीतर, अलसी
के कपड़ों की चोरी से मेंढक, कपास वस्त्र चुराने से सारस,
गौ चुराने से गोधा और गुड़ चुराने से वाग्गुद पक्षी होता है।
उत्तम सुगन्ध की चीज़ चुराने से छुछुन्दरि, पत्ते-शाक चुराने से
मोर, पक्वान्न चुराने पर भेड़िया और कच्चा अन्न चुराने से
शल्यक होता है। आग चुराने से बक, सूप-मूसल चुराने पर
मकड़ी और लाल वस्त्र चुराने से चकोर पक्षी होता है। मृगया,
हाथा चुराने से नाहर, घोड़ा चुराने से व्याघ्र, फल-मूल की
चोरी से वानर, स्त्री चुराने से रीछ, पीनेका जल चुराने से
चातक, सवारी की चोरी से ऊँट और पशु की चोरी से बकरा
होता है। मनुष्य दूसरे की कोई भी वस्तु चुराकर और बिना
होम हवि भोजन से अवश्य पक्षी होता है। स्त्रियां भी चोरी
करने पर इन्हीं दोषों को पाती हैं और उन्हीं जन्तुओं की स्त्री
बनती हैं। बिना आपत्ति के अपने अपने नित्य कर्मों से पतित
पुरुष पाप-योनियों में पैदा होकर, शत्रुओं के यहां दासपना को
पाते हैं ॥ ६३-७० ॥
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ।
अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ॥ ७१ ॥
मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥ ७२ ॥
यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयीत्मकाः ।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥ ७३ ॥
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।
संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥