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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पांचवां अध्याय। १७७

पांचवां अध्याय। १७७
लोकेशाधिष्ठितो राजा नास्याशौचं विधीयते ।
शौचाशौचं हि मर्त्यानां लोकेशप्रभवोप्ययम् ॥ ६७ ॥
उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्महतस्य च ।
सद्यः सन्तिष्ठते यज्ञस्तथाशौचमिति स्थितिः ॥ ६८ ॥
विप्रः शुध्यत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम् ।
वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रियः ॥६६॥
चन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु, इन्द्र, कुबेर, वरुण और यम इन आठ-
लोकपालों के शरीर को राजा धारण करता है । लोकपालों का
राजा के शरीर में निवास होने से उसको सूतक नहीं लगता । आ-
शौच तो मनुष्यों के लिए है । राजा तो लोकपालों के अंश से
पैदा हुआ है । जो राजा शस्त्रों से धर्मयुद्ध करके मरता है उसको
यज्ञ का फल मिलता है और आशौच तुरंत दूर हो जाता है ।
प्रेतक्रिया के अन्त में ब्राह्मण जल का, क्षत्रिय शस्त्र, वाहन का,
वैश्य हांकने का डण्डा या बागडोर का और शूद्र लकड़ी का स्पर्श
करके शुद्ध होता है। अर्थात् इन पदार्थों को आशौचान्त में जरूर
छूना चाहिए ॥ ६६-६६ ॥
एतद्वोऽभिहितं शौचं सपिण्डेषु द्विजोत्तमाः ।
असपिण्डेषु सर्वेषु प्रेतशुद्धिं निबोधत ॥ १०० ॥
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत् ।
विशुध्यति त्रिरात्रेण मातुराप्तांश्च बान्धवान् ॥१०१॥
यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाहेनैव शुध्यति ।
अनदन्नन्नमह्रैव न चेत्तस्मिन् गृहे वसेत् ॥ १०२ ॥
अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च ।
२३

१७८ मनुस्मृति ।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥१०३॥
न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृते शूद्रेण नाययेत् ।
अस्वर्ग्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता॥१०४॥
हे द्विजो ! यह सपिण्डों की मरणाशौच विधि कही गई है। अब
असपिण्डों की विधि सुनो। असपिण्ड द्विज की मृत्यु होने पर,
उसको बन्धु के तरह उठाना, दाह देना और माता के समीप के
भाई वहन आदि का भी उसी तरह कर्म करना। इसमें तीन दिन
का आशौच होता है। जो दाहादि करनेवाला मृतक के सपिण्डों
का अन्न खाता हो तो दश दिन में, और न खाता हो न उसके
मकानही में रहता हो तो एक दिन में, शुद्ध हो जाता है। अपनी
जाति, या दूसरी जाति के शव का अनुगमन करने से, सचैल
स्नान, अग्निस्पर्श और घृत खाने से शुद्धि होती है। सजातियों
के रहते शूद्रों से, ब्राह्मण शव का वाहन कभी न कराना। क्योंकि
शूद्र स्पर्श से दूषित शव की आहुति, उसको स्वर्गदायक
नहीं होती ॥ १००-१०४ ॥
ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनोवार्युपाञ्जनम् ।
वायुः कर्मार्ककालौ च शुद्धेः कर्तॄणि देहिनाम् ॥१०५॥
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सशुचिर्नमृद्वारिशुचिः शुचिः॥१०६॥
क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः ।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥१०७॥
ज्ञान, तप, अग्नि, भोजन, मिट्टी, मन, जल, लीपना, वायु,
कर्म, सूर्य और काल ये सब प्राणियों की शुद्धि करनेवाले हैं।
सब शुद्धियों में न्याय से मिले धन की शुद्धि श्रेष्ठ कही है। जो