मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय । ३३६
नवां अध्याय । ३३६
उपसर्जनं प्रधानस्य धर्मतो नोपपद्यते ।
पिताप्रधानं प्रजने तस्माद्धर्मेण तं भजेत् ॥ १२१ ॥
पुत्रः कनिष्ठो ज्येष्ठायां कनिष्ठायां च पूर्वजः ।
कथं तत्र विभागः स्यादिति चेत्संशयो भवेत्॥१२२॥
एकं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः ।
ततोऽपरे ज्येष्ठवृषास्तदूनानां स्वमातृतः ॥ १२३ ॥
ज्येष्ठस्तु जातो ज्येष्ठायां हरेद्वृषभ षोडशाः ।
ततः स्वमातृतः शेषा भजेरन्निति धारणा ॥ १२४ ॥
सदृशस्त्रीषु जातानां पुत्राणामविशेषतः ।
न मातृतो ज्यैष्ठ्यमस्ति जन्मतौ ज्यैष्ठ्यमुच्यते ॥ १२५॥
प्रत्येक भाई अपने भाग में से चौथा भाग अपनी कुमारी बहिन
को दे। जो न देवें पतित होते हैं। वकरी, भेंड़, घोड़ा आदि एक
खुरवाले पशुओं का समान भाग करे और कम हों तो न बांटे,
क्योंकि वे बड़े भाई के ही होते हैं। छोटा भाई बड़े की स्त्री में
नियोग विधि से पुत्र पैदा करे तो उस पुत्र और चचा का समान
भाग करे—यह धर्म है। क्षेत्रज पुत्र गौण होता है, इसलिए वह
पिता का सब भाग धर्मानुसार नहीं ले सकता। पुत्र पैदा करने में
पिता मुख्य है, इस कारण क्षेत्रज पुत्र का भाग पूर्वरीति से करे।
प्रथम स्त्री में पुत्र पीछे और द्वितीय स्त्री में प्रथम हो तो, उनका
भाग कैसे होना चाहिए? प्रथम स्त्री का पुत्र एक बैल अधिक ले
और उसी माता से पैदा हुए छोटे भाई मामूली बैल लेवें। यदि
ज्येष्ठ पुत्र दूसरी स्त्री का हो तो एक बैल और पन्द्रह गौ ले और
दूसरे भाई अपनी माता के अधिकारानुसार बाँट लें परन्तु
एक जाति की स्त्रियों में पुत्र पैदा हों तो उनको समान गिने,
माता के बड़ी होने से पुत्र बड़े नहीं होते, किन्तु जन्म से बड़ाई
होती है ॥ ११८-१२५ ॥
३४० मनुस्मृति ।
जन्मज्येष्ठेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वपि स्मृतम् ।
यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतॊ ज्येष्ठता स्मृता ॥ १२६॥
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।
यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ १२७॥
अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।
विवृद्ध्यर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ॥ १२८ ॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम्॥१२६॥
जिसका जन्म पहले हुआ हो उस पुत्र का नाम लेकर, 'अमुक
का पिता यजन करता है'—ऐसा ज्योतिष्टोम में 'सुब्रह्मण्य' मन्त्र
बोलकर इन्द्र का आवाहन होता है। और दो साथ ही पैदा हुए
हों, तो भी पहला ज्येष्ठ कहलाता है। जिसके पुत्र न हो, वह कन्या-
दान के समय जामाता से नियम करे—इस कन्या से जो पुत्र
होगा वह मेरा श्राद्ध आदि करेगा। पहले दक्षप्रजापति ने अपने
वंश की वृद्धि के लिए इसी विधि से कन्या को पुत्रिका की थी।
दक्ष ने प्रसन्न होकर धर्म को दश, कश्यप को तेरह और राजा
सोम को सत्ताईस पुत्री दी थीं ॥ १२६-१२९॥
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥१३०॥
मातुस्तु यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः ।
दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ॥ १३१ ॥
दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।
स एव दद्याद्द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ॥१३२॥