मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवाँ अध्याय । ३४६
नवाँ अध्याय । ३४६
औरस पुत्र के प्रसङ्ग से जो दूसरे के वीर्य्य से पुत्र गिनाये, वे जिन
के वीर्य्य से पैदा हैं उन्हींके हैं—दूसरे के नहीं हैं ॥ १८०-१८१ ॥
भ्रातॄणामेकजातानामेकश्चेत्पुत्रवान् भवेत् ।
सर्वांस्तांस्तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरब्रवीत् ॥ १८२ ॥
सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत्पुत्रिणी भवेत् ।
सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः ॥ १८३ ॥
श्रेयसः श्रेयसोऽलाभे पापीयान् रिक्थमर्हति ।
बहवश्चेत्तु सदृशाः सर्वे रिक्थस्य भागिनः ॥ १८४ ॥
न भ्रातरो न पितरः पुत्रा रिक्थहराः पितुः ।
पिता हरेदपुत्रस्य रिक्थं भ्रातर एव च ॥ १८५ ॥
सहोदर भाइयों में यदि एक भी पुत्रवान् हो तो उस पुत्र से सब
भाई पुत्रवान् हैं—ऐसा मनुजी कहते हैं । एक पुरुष की कई स्त्रियों
में जो एक भी पुत्रवाली हो तो उससे सब पुत्रवाली हैं । औरस
आदि पहले पहले पुत्र न हों तो अगले अगले पुत्र, पिताके धन के
अधिकारी हैं और यदि बहुतसे पुत्र समानही हों तो, सब धन
के भागी हैं । पिता के धनको लेने वाले पुत्रही हैं, न भाई हैं न
चचा आदि हैं । परन्तु पुत्रहीन का धन उसका पिता वा भाई ले
सकता है ॥ १८२-१८५ ॥
त्रयाणामुदकं कार्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्त्तते ।
चतुर्थः संप्रदातैषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १८६ ॥
अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् ।
अत ऊर्ध्वंस कुल्यः स्यादाचार्यः शिष्य एव वा ॥ १८७ ॥
सर्वेषामप्यभावे तु ब्राह्मणा रिक्थभागिनः ।
त्रैविद्याः शुचयो दान्तास्तथा धर्मोन हीयते ॥ १८८ ॥
३५० मनुस्मृति ।
अहार्यं ब्राह्मणद्रव्यं राज्ञा नित्यमिति स्थितिः ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वाभावे हरेन्नृपः ॥ १८६ ॥
बाप, दादा और परदादा इन तीन को जल और पिण्डदान
होता है। देनेवाला चौथा होता है-पाँचवें का सम्बन्ध नहीं है।
जो सपिण्डों में अधिक समीप हो, उसका धन होता है । वह न
हो तो कुलपुरुष वह भी न हो तो आचार्य, वह भी न हो तो
शिष्य अधिकारी होता है । ये सब भी न हों तो धन ब्राह्मण
पाते हैं। पर वे तीनों वेद के ज्ञाता, भीतर-बाहर से पवित्र जिते-
न्द्रिय हों, जिससे श्राद्धादि कर्मों में हानि न पहुँचे । कोई भी लेने
वाला न हो, तो भी ब्राह्मण का धन राजा को न लेना चाहिए-
धर्ममर्यादा है। परन्तु दूसरे वर्णों का धन, कोई लेनेवाला न हो
तो राजा ले सकता है ॥ १८६-१८६ ॥
संस्थितस्यानपत्यस्य सगोत्रात्पुत्रमाहरेत् ।
तत्र तद्रिक्थजातं स्यात्तत्तस्मिन्प्रतिपादयेत् ॥ १६०॥
द्वौ तु यौ विवदेयातां द्वाभ्यां जातौ स्त्रिया धने ।
तयोर्यद्यस्य पित्र्यं स्यात्तत्स गृहीत नेतरः ॥ १६१ ॥
जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः ।
भजेरन् मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः ॥ १६२॥
यास्तासां स्युर्दुहितरस्तासामपि यथार्हतः ।
मातामह्या धनात्किञ्चित्प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् ॥ १६३ ॥
कोई पुत्रहीन मरजाय तो उसके सगोत्र में से पुत्र ले और उस
पुरुष का जो धन हो, उसे सौंप दे। एक स्त्री में दो पुरुषों से पैदा
दो पुत्र, औरस-पौनर्भव धन के लिए विवाद करें तो, जिसके
पिता का जो धन हो वही उसको ले, दूसरा न लेय । माताके म-
रने पर सब सहोदर भाई और कुमारी बहनें माता के धन को