मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ३७
दूसरा अध्याय । ३७
निकाला है* और तीनों वेदों से, गायत्रीऋचा के एक एक पाद
को दुहा है ॥ ७६ ७७ ॥
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् ।
सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ ७८ ॥
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः ।
महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिविमुच्यते ॥ ७९ ॥
एतयर्चाविसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया ।
ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां याति साधुषु ॥ ८० ॥
वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रातः और सायंकाल समय, ॐकार, और भूः,
भुवः, स्वः, इन व्याहृतियों को पूर्व लगाकर गायत्री जपने से,
वेद पढ़ने का फल पाता है । जो द्विज, ग्राम वा नगर के बाहर
एकान्त में, ॐकार, तीन व्याहृति और गायत्री इन तीनों का एक
हजार जप करता है, वह केंचुल से सांप की भांति, महापापों से
छूट जाता है । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य गायत्री न जपता हो
और समय पर अपनी अग्निहोत्रादि क्रिया न करता हो तो वह
सत्पुरुषों में निन्दा पाता है ॥ ७८-८० ॥
ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ।
त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ८१ ॥
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ ८२ ॥
- शतपथ ब्राह्मण ( ११ । ५ । = ) में लिखा है। प्रजापति ने सृष्टि की
इच्छा की तो पहले पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश उत्पन्न हुआ । उसके बाद,
तीनों लोकों से, क्रम से, अग्नि, वायु और सूर्य ये प्रकाशमान तीन पदार्थ प्रकट
हुए। फिर इन तीनों से क्रम से ऋक्, साम और यजुर्वेद को उत्पन्न किया।
अनन्तर, तीनों वेदों का बीजस्वरूप, भूः, भुवः, स्वः, का प्रादुर्भाव हुआ। प्रथमा-
ध्याय के ( २३ ) श्लोक की टिप्पणी में, वेदोत्पत्ति विषय देखो।
३८ मनुस्मृति ।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परंतपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ ८३ ॥
क्षरन्ति सर्वा वैदिक्यो जुहोति यजति क्रियाः ।
अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ ८४ ॥
ॐकार, तीनों व्याहृति और तीन चरण की गायत्री इनको वेद
का मुख जानना चाहिए । जो पुरुष, निरालस तीन वर्ष तक
गायत्री जप करता है, वह अन्त में वायु तुल्य व्यापक होकर,
परब्रह्म को पहुँचता है। 'ॐ' यह परब्रह्म का वाचक है, प्राणायाम
बड़ा तप है, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं है और मौन रहने
से सत्य बोलना उत्तम होता है। वेदोक्त होम, यज्ञ, क्रिया सब
नाशवान् हैं-या उनका स्वर्गादि फलभी नाशवान् है। केवल ॐकार
परब्रह्म-प्रजापतिका रूपही अविनाशी जानना चाहिए ॥८१-८४॥
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशु स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ॥ ८५ ॥
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ८६ ॥
जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ८७ ॥
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु ।
संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥ ८८ ॥
विधियज्ञ-दर्शपौर्णमास से जपयज्ञ दशगुना श्रेष्ठ है । जिसमें
पास में बैठा भी न सुने ऐसा उपांशुजप सौगुना श्रेष्ठ है और जिस
में ओठ भी न हिलै, ऐसा मानसिक जप हज़ारगुना अच्छा कहा
है। विधियज्ञ और चारों पाकयज्ञ-वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्यश्राद्ध
और अतिथिपूजन, जपयज्ञ के सोलहवें भाग के समान भी नहीं