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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ११३

तीसरा अध्याय। ११३
एतद्वोऽभिहितं सर्वं विधानं पाञ्चयज्ञिकम् ।
द्विजातिमुख्यवृत्तीनां विधानं श्रूयतामिति ॥ २८६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
तृतीयोऽध्यायः ॥
पितृकर्म लौकिक अग्नि में न करना चाहिए। अग्निहोत्री अमा-
वास्या के सिवाय दूसरी तिथियों में श्राद्ध न करे तोभी कोई हानि
नहीं है। द्विज से न कुछ बन पड़े तो जल से पितृतर्पण करा
करे तोभी पितृयज्ञ का फल मिलता है। वेद में पिता को वसु,
पितामह को रुद्र और प्रपितामह को आदित्य कहते हैं। समर्थ
पुरुष, नित्य विघस या अमृत का भोजन किया करे। श्राद्ध में
ब्राह्मणभोजन से बचा अन्न विघस और वैश्वदेव आदि यज्ञशेष
अमृत कहलाता है। यह पञ्चमहायज्ञ की सब विधि तुमसे कही
है, अब द्विजों में मुख्य ब्राह्मण की वृत्ति का विषय सुनो ॥ २८२-२८६॥
तीसरा अध्याय समाप्त ।

अथ चतुर्थोऽध्यायः ।
चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाद्यं गुरौ द्विजः ।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १ ॥
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुनः ।
या वृत्तिस्तां समास्थाय विप्रो जीवेदनापदि ॥ २ ॥
यात्रामानप्रसिद्ध्यर्थं स्वैः कर्मभिरगर्हितैः ।
अक्लेशेन शरीरस्य कुर्वीत धनसञ्चयम् ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय ।
गृहस्थाश्रम-धर्म ।
द्विज अपने जीवन का चतुर्थांश गुरुकुल में, विद्याभ्यास में
बितावे और दूसरे चतुर्थांश में विवाह करके गृहस्थाश्रम में रहे।
आपत्तिकाल में किसीको कुछ दुःख देकर भी और समय में किसी
को कष्ट न देकर जो निर्वाह के लिए जीविका बनपड़े उसको करना
चाहिए। अपने और परिवार के पालन के लिए कोई खराब काम
न करना चाहिए। शरीर को दुःख न देकर धन उपार्जन करना
चाहिए ॥ १-३ ॥
ऋतानृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा ।
सत्यानृताभ्यामपि वा न श्ववृत्त्या कदाचन ॥ ४ ॥
ऋतमुञ्छशिलं ज्ञेयममृतं स्यादयाचितम् ।
मृतं तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम् ॥ ५ ॥
सत्यानृतं तु वाणिज्यं तेन चैवापि जीव्यते ।
सेवा श्ववृत्तिराख्याता तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥