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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय । १०६

तीसरा अध्याय । १०६
उन निमन्त्रित ब्राह्मणों को विदा करके, सावधानी से स्नान
करे और दक्षिण दिशा को खड़ा होकर, पितरों से इन वरों को
मांगेः-हमारे कुल में दाता हों, वेदाभ्यास और सन्तान की वृद्धि
हो, वैदिक कर्म से श्रद्धा दूर न हो और सुपात्रों को देने के लिए
हमें बहुतसा धन मिले-इस प्रकार, श्राद्ध कर्म पूरा होने पर वह
पिण्ड गौ, ब्राह्मण या बकरा को खिलादे, अथवा अग्नि या जल में
डाल देवे ॥ २५८-२६० ॥
पिण्डनिर्वपणं केचित्पुरस्तादेव कुर्वते ।
वयोभिः खादयन्त्यन्ये प्रक्षिपन्त्यनलेऽप्सु वा ॥ २६१ ॥
पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा ।
मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक् सुतार्थिनी ॥ २६२ ॥
आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् ।
धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ॥ २६३ ॥
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातिप्रायं प्रकल्पयेत् ।
ज्ञातिभ्यः सत्कृतं दत्त्वा बान्धवानपि भोजयेत् ॥ २६४ ॥
कोई आचार्य ब्राह्मण भोजन के पहलेही पिण्डनिर्वपण कराते
हैं, कोई पिण्ड पक्षियों को खिलाते हैं, कोई जल वा अग्नि में छोड़
देते हैं। पतिव्रता स्त्री पुत्र की इच्छा से उन पिण्डों में से पितामह
के मध्यम पिण्ड को खा लेय । वह स्त्री आयुष्मान्, यशस्वी, बुद्धि-
मान्, धनवान्, सन्तानवान्, सत्यगुणी और धार्मिक पुत्र को पैदा
करती है। फिर दोनों हाथ धोकर, बचा हुआ अन्न अपने जाति
वालों को और दूसरे सम्बन्धियों को भी खिलावे ॥ २६१-२६४ ॥
उच्छेषणं तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः ।
ततो गृहबलिं कुर्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ २६५ ॥
हविर्यच्चिररात्राय यच्चानन्त्याय कल्प्यते ।
पितृभ्यो विधिवद्दत्तं तत्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २६६ ॥

११० मनुस्मृति ।
तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा ।
दत्तेन मासं तृप्यन्ति विधिवत् पितरो नृणाम् ॥ २६७॥
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै ॥ २६८ ॥
षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै ।
अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ २६६ ॥
दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।
शशकूर्म्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ २७० ॥
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च ।
वार्घ्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २७१ ॥
ब्राह्मणों को विदा करके उस स्थान से जूठ उठाकर, फिर
वैश्वदेव और भूतबलि आदि करे-यह धर्मव्यवस्था है। पितरों को
विधि से हवि देने से जो चिरकालतक अक्षय तृप्ति होती है वह इस
प्रकार है-तिल, धान्य, यव, उड़द, जल, मूल और फल विधिपूर्वक
पितरों को देने से, एक मास तक तृप्ति होती है। मछली और मांस
से दो मास, हरिण के मांस से तीन मास, मेंढा के मांस से चार
और भक्ष्य पक्षियों के मांस से पांच मास तक तृप्ति होती है।
बकरा के मांस से छः मास, चित्रमृग के मांस से सात मास, मृग
से आठ मास और रुरु मृग से नव मास तक तृप्ति होती है।
शूकर और महिष के मांस से दश मास, खरगोश और कछुआ
से ग्यारह मास तक तृप्ति होती है। गौके दूध वा उसकी खीर
से साल भर और लम्बे कान और नाकवाले बूढ़े बकरे के मांस
से बारह वर्ष तक तृप्ति होती है ॥ २६५-२७१ ॥
कालशाकं महाशल्काः खड्गलोहामिषं मधु ।
आनन्त्यायैव कल्प्यन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥२७२॥