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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय । ४३५

ग्यारहवां अध्याय । ४३५
तीन समय स्नान करे, कृष्णपक्ष में एक एक ग्रास घटावे,
शुक्लपक्ष में एक एक ग्रास बढ़ावे यह चान्द्रायण व्रत कहलाता
है। 'यवमध्यम' व्रत में शुक्लपक्ष से नियमपूर्वक चान्द्रायणव्रत
करता हुआ इन्हीं सब विधियों को करे। 'यतिचान्द्रायण'
करनेवाला, नित्य दोपहर में हविष्यान्न के आठ आठ ग्रास खावे
और नियमसे रहे। चार ग्रास प्रातःकाल और चार ग्रास सूर्यास्त
में खाय, यह 'शिशुचान्द्रायण' व्रत है। एक मास में हविष्यान्न
के दोसौ चालीस २४० ग्रास खाने से चन्द्रलोक प्राप्त होता है।
रुद्र, आदित्य, वसु, मरुत और महर्षियों ने सब पापों के नाशार्थ
इस व्रत को किया था। यह व्रत करनेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वयं
महाव्याहृतियों से हवन करे। और अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध-
त्याग और सरलता का बर्ताव करे। तीन बार दिन में और तीन
बार रात में सवस्त्र स्नान करे। स्त्री, शूद्र और पतितों से कभी
बातचीत न करे ॥ २१७-२२४ ॥
स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा ।
ब्रह्मचारी व्रती च स्याद्गुरुदेव द्विजार्थकः ॥ २२५ ॥
सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः ।
सर्वेष्वेव व्रतेष्वेवं प्रायश्चित्तार्थमाहृतः ॥ २२६ ॥
एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः ।
अनाविष्कृतपापांस्तु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत् ॥ २२७ ॥
ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च ।
पापकृन्मुच्यते पापात् तथा दानेन चापदि ॥ २२८ ॥
यथा यथा नरो धर्मं स्वयं कृतवानुभाषते ।
तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २२६ ॥
यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हति ।

४३६ मनुस्मृति।
तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २३० ॥
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात् प्रमुच्यते ।
नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्या पूयते तु सः ॥ २३१ ॥
एवं संचिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् ।
मनोवाङ्मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ २३२ ॥
आसन पर उठा बैठा करे, अशक्त हो तो भूमि पर सोवे और
ब्रह्मचारी, व्रती, गुरु, देवता और द्विजोंका पूजक होवे । नित्य
यथाशक्ति गायत्री और अघमर्षणादि पवित्र मन्त्रों का जप करे ।
प्रायश्चित्त के सभी व्रतों में यह विधि मान्य है । पापी द्विजों को
इन व्रतों से शुद्ध करे और गुप्त पापियों को ब्राह्मणसभा, मन्त्र
जप और होम कराकर शुद्ध करे। पाप करनेवाला पाप प्रकट
करने, पश्चात्ताप करने और तप स्वाध्याय करने से और आपत्ति
में दानही करने से पाप से छूटता है। मनुष्य जैसे जैसे अपने
अधर्म प्रकट करता है वैसे वैसेही उससे छूटता है जैसे सांप
केंचुल से अलग होजाता है। जैसे जैसे उसका मन दुष्कृत-कर्म
की निंदा करता है वैसे वैसे उसका शरीर अधर्म से छूटता
है। पाप करने के बाद संताप करके उससे छूटता है और फिर
ऐसा न करूंगा-इस संकल्प से पवित्र होता है। परलोक में कर्म-
फल मिलता है, ऐसा मन से विचार कर नित्य मन, वाणी और
शरीर से शुभकर्म किया करे ॥ २२५-२३२ ॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम् ।
तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत् ॥२३३॥
यस्मिन् कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम् ।
तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ॥ २३४ ॥
तपो मूलमिदं सर्वं दैवं मानुषकं सुखम् ।