सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय । ४३३

ग्यारहवां अध्याय । ४३३
अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये।
शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्॥२१०॥
यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति ।
तान्वोऽभ्युपायानूवक्ष्यामिदेवर्षिपितृसेवितान् ॥२११॥
त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥२१२॥
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ २१३ ॥
एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।
त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ॥ ॥ २१४॥
तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् ।
प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥२१५॥
यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ॥ २१६ ॥
ब्राह्मण के ऊपर मारने के लिए लकड़ी उठाकर प्राजापत्य,
मारने पर अतिकृच्छ्र और रुधिर निकलने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत
करे। जिन दोषों का प्रायश्चित्त नहीं कहा है उनका शक्ति और
पाप विचार कर प्रायश्चित्त नियत करे। मनुष्य जिन उपायों से
पाप नष्ट करता है उन देवर्षि और पितरों के सेवित उपायों को
तुम से कहता हूं । प्राजापत्य-व्रत करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातः-
काल और तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगा अन्न
खावे और तीन दिन व्रत करे यों बारह दिनका होता है। एक दिन
गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशका जल मिलाकर खाय और
एक रात्रिका उपवास करे तब 'कृच्छ्र-सान्तपन' होता है। तीन
५५

४३४ मनुस्मृति ।
दिन प्रातःकाल एक एक ग्रास खाय, दूसरे दिन सायंकाल को
एक एक ग्रास खाय, तीसरे दिन बिना मांगा एक एक ग्रास खाय
और अन्त के तीन दिन उपवास करे यह अतिकृच्छ्र कहलाता है।
तप्तकृच्छ्र करनेवाला द्विज एक बार स्नान करे और तीन दिन
गरम जल तीन दिन गरम दूध तीन दिन गरम घी और तीन दिन
वायु का पान करे। जितेन्द्रिय होकर बारह दिन भोजन न करना
'पराक' नामक कृच्छ्र है। यह सब पापों को दूर कर देता है॥२०६-२१६॥
एकैकं ह्रासयेत् पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् ।
उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २१७ ॥
एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे ।
शुक्लपक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम् ॥ २१८ ॥
अष्टावष्टौ समश्नीयात् पिण्डान् मध्यंदिने स्थिते ।
नियतात्मा हविष्याशी यतिश्चान्द्रायणं चरन् ॥ २१९॥
चतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः ।
चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २२०॥
यथाकथंचित् पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः ।
मासेनाश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥ २२१॥
एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्चाचरन् व्रतम् ।
सर्वाकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः ॥ २२२ ॥
महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम् ।
अहिंसा सत्यमक्रोधमार्जवं च समाचरेत् ॥ २२३ ॥
त्रिरहस्त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत् ।
स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित् ॥ २२४ ॥