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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय। ३०७

आठवां अध्याय। ३०७
चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमाः सदा ॥ ३५६ ॥
भिक्षुका वन्दिनश्चैव दीक्षिताः कारवस्तथा ।
संभाषणं सह स्त्रीभिः कुर्युंरप्रतिवारिताः ॥ ३६० ॥
न संभाशां परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत् ।
निषिद्धो भाषमाणस्तु सुवर्णदण्डमर्हति ॥ ३६१ ॥
नैष चारणदारेषु विधिर्नात्मोपजीविषु ।
सज्जायन्ति हि ते नारीर्निगूढाश्चारयन्ति च ॥ ३६२ ॥
किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्संभाषां ताभिराचरन् ।
प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ॥ ३६३ ॥
शूद्र ब्राह्मणी के साथ व्यभिचार करे तो मार डालने लायक
होता है। चारों वर्णवालों को सदा अपनी स्त्रियों की रक्षा करनी
चाहिए। भिक्षुक, भाट, यज्ञ में दीक्षित, रसोइँया और कारीगर
स्त्रियों के साथ बातें बिना रोक कर सकते हैं । जिसको निषेध
है वह परस्त्री के साथ बातें न करे। करनेवाला एक सुवर्ण दण्ड के
योग्य होता है। यह निषेध-मनादी नट, गवैय्या आदि की स्त्रियों
के लिए नहीं है, क्योंकि वे आपही अपनी स्त्रियों को सजाकर
परपुरुषों से मिलाते हैं । परन्तु उनके साथ भी निर्जन में बातें
करना दण्डकारक है और एकभक्ता या विरक्ता स्त्री के साथ भी
बोलचाल करने से कुछ दण्ड करे ॥ ३५६-३६३ ॥
योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति ।
सकामां दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३६४ ॥
कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किञ्चिदपि दापयेत् ।
जघन्यं सेवमानां तु संयतां वासयेद् गृहे ॥ ३६५ ॥
उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।

३०८ । मनुस्मृति ।
शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत् पिता यदि ॥३६६॥
जो इच्छा न करनेवाली कन्या से गमन करे, वह उसी समय
वध के योग्य है। पर चाहनेवाली के साथ गमन करे और वह
पुरुष सजातीय हो तो वध योग्य नहीं होता। उत्तम जाति के पुरुष
को सेवन करनेवाली कन्या पर कुछ भी दण्ड न करे। परन्तु नीच
जाति के साथ गमन करती हो तो उसको घर में बंद रक्खे। नीच
जाति का पुरुष उत्तम जाति की कन्या से भोग करे तो वध के
योग्य है और समान जाति की कन्या को भोगता हो तो वह पुरुष
कन्या के पिता की आज्ञा से मूल्य देकर विवाह भी कर
सकता है ॥ ३६४-३६६ ॥
अभिषह्य तु यः कन्यां कुर्याद्दर्पेण मानवः ।
तस्याशुकर्त्ये अङ्गुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ ३६७॥
सकामां दूषयंस्तुल्यो नाङ्गुलिच्छेदमाप्नुयात् ।
द्विशतं तु दमो दाप्यः प्रसङ्गविनिवृत्तये ॥ ३६८ ॥
कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद् द्विशतो दमः ।
शुल्कं च द्विगुणं दद्याच्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ॥ ३६६ ।
या तु कन्यां प्रकुर्यात्स्त्री सा सद्यो मौण्ड्यमर्हति ।
अङ्गुल्योरेव वा छेदं खरेणोद्वहनं तथा ॥ ३७० ॥
भर्तारं लङ्घयेद् या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता ।
तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥३७१।
पुमांसं दाहयेत्पापं शयने तप्त आयसे ।
अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ३७२ ।
जो मनुष्य अभिमान और बलात्कार से कन्या को अङ्गुलियों से
बिगाड़े उसकी दोनों अङ्गुलियां कटवा दें और छः सौ पण दण्ड

करे। समान जाति और सकामा कन्या को दूषित करनेवाले की
अङ्गुलियां न कटावे, सिर्फ दो सौ पण दण्ड करे। कन्या ही कन्या को
अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे और उस
कन्या के पिता से कहकर दूना मूल्य दिलवाये और दस कोड़े लग-
वावे । यदि कोई स्त्री कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उसका
शिर मुड़वा कर वा दो अङ्गुलियां काटकर, गधेपर चढ़ाकर घु-
मावे। जो स्त्री अपने रूप, गुण के घमंड से पति का तिरस्कार
करके व्यभिचार करे, उसको राजा सब के सामने कुत्तों से नोच-
वावे और जो व्यभिचारी पापी हो उसको तपाये लोह के पलंग
पर सुलाकर ऊपर से काठ रखकर जलवादे ॥ ३६७-३७२ ॥
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः ।
व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ ३७३॥
शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् ।
अगुप्तमङ्गसर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ ३७४ ॥
एक वर्ष तक व्यभिचार करता रहे तो उस दुष्ट को उक्त दण्ड
दूना होना चाहिए । हीन जाति या चाण्डाली के साथ व्यभिचार
करे तो भी वही दण्ड करे । शूद्र, ब्राह्मणस्त्री से गुप्त या प्रकट व्यभि-
चार करे तो उसका अंग काटडाले, सर्वस्वहरण करे ॥ ३७३-३७४॥
वैश्यः सर्वस्वदण्डः स्यात्संवत्सरनिरोधतः ।
सहस्त्रं क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ॥ ३७५॥
ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ ।
वैश्यं पञ्चशतं कुर्यात्क्षत्रियं तु सहस्रिणम् ॥ ३७६ ॥
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह ।
विप्लुतौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ ३७७॥
सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्यो गुप्तां विप्रां बलाद्व्रजन् ।

३१० मनुस्मृति।
शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह संगतः॥३७८॥
वैश्य रक्षित ब्राह्मणी से गमन करे तो एक वर्ष क़ैद करके उसका
सर्वस्वहरण करे। क्षत्रिय करे तो एक हज़ार पण दण्ड करे और
उसका शिर गधे के मूत से मुड़वा देयं । वैश्य और क्षत्रिय, यदि
अरक्षित ब्राह्मणी से गमन करें तो वैश्य पर पांच सौ और क्षत्रिय
पर हज़ार पण दण्ड करे। वोही दोनों यदि रक्षित ब्राह्मणी से गमन
करें, शूद्र की भांति दण्ड पावें अथवा चटाई में लपेट कर जलवा
दें। रक्षित ब्राह्मणी से ज़बरदस्ती व्यभिचार करनेवाले ब्राह्मण
पर हज़ार पण दण्ड करे और इच्छावाली से गमन करे तो पाँच
सौ पण दण्ड करे ॥ ३७५-३७८ ॥
मौण्ड्यं प्राणान्तिको दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते ।
इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ ३७६ ॥
न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम् ।
राष्ट्रादेनं वहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ॥ ३८० ॥
न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि ।
तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३८१ ॥
वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत् ।
यो ब्राह्मण्यामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ॥ ३८२ ॥
ब्राह्मण का शिर मुड़ा देनाही प्राणान्त दण्ड देना है दूसरों को
प्राणान्त दण्ड का विधान है। कैसा भी अपराध ब्राह्मण ने किया
हो पर उसको प्राणान्त दण्ड कभी न देवे। किन्तु उसको धन स-
हित देश से निकाल देवे। ब्राह्मण वध से अधिक कोई अधर्म नहीं
है। राजा, ब्राह्मण वध का कभी मन में भी विचार न करे। वैश्य
क्षत्रिया से और क्षत्रिय रक्षित वैश्या से व्यभिचार करे तो इन
दोनों को अरक्षित ब्राह्मणी से व्यभिचारवाला दण्ड देना
चाहिए ॥ ३७६-३८२ ॥