मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय। २७७
आठवां अध्याय। २७७
कुलजे वृत्तसंपन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि ।
महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ १७६ ॥
यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः ।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ॥ १८० ॥
यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेतुर्न प्रयच्छति ।
स याच्यः प्राङ्विवाकेन तन्निक्षेपुरसन्निधौ ॥ १८१ ॥
साक्ष्यरूपे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः ।
अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ १८२ ॥
स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम् ।
न तत्र विद्यते किंचिद्यत्परैरभियुज्यते ॥ १८३ ॥
निक्षेप-धरोहर-अमानत रखना ।
कुलीन, सदाचार, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कुटुम्बी, धनी और प्रति-
ष्ठित पुरुष के पास निक्षेप-धरोहर रखना चाहिए। जो मनुष्य
जिसके यहां जो द्रव्य जिसप्रकार रक्खे, उसको उसीप्रकार
लेना उचित है। क्योंकि-जैसा देना, वैसा लेना। जो धरोहर
रखनेवाले की वस्तु मांगने पर नहीं देता, उससे न्यायकर्त्ता राज-
पुरुष रखनेवाले के पीछे मांगे। धरोहर के समय साक्षी न हो,
तो राजा किसी वृद्ध-प्रामाणिक कर्मचारी से कुछ वस्तु किसी
बहाने से उसके यहां रखवावे और थोड़ेही दिनों में मँगवाले।
यदि वह राजकर्मचारी अपनी रक्खी वस्तु ठीक ठीक मांगने
पर पा जावे तो जो धरोहर न पाने की नालिश करे उसको
झूठा समझे ॥ १७६-१८३ ॥
तेषां न दद्याद्यदि तु तद्धिरण्यं यथाविधि ।
उभौ निगृह्य दाप्यःस्यादिति धर्मस्य धारणा ॥ १८४ ॥
२७८ मनुस्मृति।
निक्षेपोपनिधी नित्यं न देयौ प्रत्यनन्तरे ।
नश्यन्ते विनिपाते तावनिपाते त्वनाशिनौ ॥ १८५ ॥
स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे ।
न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेतुश्च बन्धुभिः ॥१८६॥
अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम् ।
विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ १८७ ॥
निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्परिसाधने ।
समुद्रे नाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ १८८ ॥
चौरैर्हृतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा ।
न दद्याद्यदि तस्मात्स न संहरति किंचन ॥ १८६ ॥
निक्षेपस्यापहर्त्तारमनिक्षेप्तारमेव च ।
सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ॥ १६० ॥
यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते ।
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ वा तत्समं दमम् ॥ १६१ ॥
और यदि वह ठीक ठीक न देवे तो राजा पकड़कर दोनों की
धरोहर दिलवावे। खुली या मुहर लगी धरोहर या मांगी वस्तु
रखनेवाले की वस्तु उसके वारिसों को न देवे, क्योंकि रखनेवाले
की मृत्यु होजाने से धरोहर नष्ट हो जाती है। जीता हो तो मिल
सकती है। परन्तु धरोहर रखनेवाले की मृत्यु होजाने पर, यदि
साहूकार खुशी से उसके वारिसों को दे देय, तो कम देने का
दावा वारिस या राजा न चलावे। उस धन को प्रसन्नता से कम
ज्यादा का कपट छोड़कर, स्वीकार करले। यही सब धरोहरों का
नियम है जोकि बिना मुहर रक्खी गई है और मुहरवाली में कोई
शक नहीं होती। अमानत की वस्तु को चोर ले जाय, जल में