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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २४७

आठवां अध्याय । २४७
(जैसा कार्य हो) करमवालों के कामों को देखे । और वंश, जाति
आदि देशव्यवहार और शास्त्रोक्त साक्षी, शपथ आदि के अनुसार
अठारह प्रकार के विवाद-झगड़ों का अलग अलग विचार-फैसला
करे। उन अठारह विवादों का नाम इस प्रकार है—
(१) ऋण लेकर न देना (२) धरोहर (३) दूसरे की
वस्तु को बेचना (४) साझे का व्यापार (५) दान दिया हुआ
लौटा लेना (६) नौकरी न देना (७) प्रतिज्ञा भंग करना
(८) खरीद-बेंच का झगड़ा (६) पशु स्वामी और चरवाहे
का झगड़ा (१०) सरहद की लड़ाई (११) बड़ी बात कहना
(१२) मार पीट (१३) चोरी (१४) ज़ोर-जुलम (१५) पर
स्त्री का ले लेना (१६) स्त्री और पुरुष के धर्म की व्यवस्था
(१७) जुआखोरी.(१८) जानवरों की लड़ाई में हार जीत का
दाँव करना। इस संसार में ये १८ दावा होने के कारण हैं॥१–७॥
एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम् ।
धर्मं शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ॥ ८ ॥
यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् ।
तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ ६ ॥
सोऽस्य कार्याणि संपश्येत् सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः ।
सभामेव प्रविश्याग्र्यामासीनः स्थित एव वा ॥ १० ॥
यस्मिन् देशे निषीदन्ति विप्रावेदविदस्त्रयः ।
राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥ ११ ॥
धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते ।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ १२॥
सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ १३ ॥

२४८ मनुस्मृति ।
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च ।
हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥
इन विषयों में झगड़ा करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन-
धर्म के अनुसार करना चाहिए। जब आप कारणवश न काम देख
सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे। वह ब्राह्मण तीन सभासदों
के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को
देखे। जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्ण-
यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान्
ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है। जिस सभा
में धर्म, अधर्म से चौंका जाता है और उस चुभे काँटे को सभा-
सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते
हैं। या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना। और
जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता
है। जिस सभा में अधर्म से धर्म की और असत्य से सत्य की
हत्या होती है उस सभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥
वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥
एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥
धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और
धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का
नाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे।
भगवान् धर्म को 'वृष' कहते हैं और जो उसका नाश करता
है उसको देवता 'वृषल' कहते हैं। इस कारण मनुष्य को धर्म