मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवाँ अध्याय । ३०३
आठवाँ अध्याय । ३०३
पिताचार्यः सुहृन्माता भार्यापुत्रः पुरोहितः ।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥३३५॥
कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः ।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा ॥ ३३६॥
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम् ।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥ ३३७ ॥
ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत् ।
द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः॥ ३३८॥
पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित भी
यदि अपने धर्म से न चलें तो राजा इनको भी शिक्षा देवे।
साधारण मनुष्य को जिस अपराध के लिए एक पण दण्ड करे,
उस अपराध में राजा अपने लिए हज़ार पण दण्ड करे, यह
मर्यादा है । चोरी करने में शूद्र को आठगुना, वैश्य को सोलह
गुना और क्षत्रिय को बीसगुना पाप लगता है । ब्राह्मण को
चौंसठगुना वा पूरा सौगुना पाप लगता है । अथवा एकसौ-अट्ठा-
इस गुना पाप लगता है, क्योंकि ब्राह्मण चोरी के दोष गुण को
जानता है ॥ ३३५-३३८ ॥
वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च ।
तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत् ॥ ३३६ ॥
योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम् ।
याजनाध्यापनेनापि यथास्तेनस्तथैव सः ॥ ३४० ॥
द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके ।
आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति ॥ ३४१ ॥
३०४ मनुस्मृति।
असंधितानां संधाता संधितानां च मोक्षकः ।
दासाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ॥ ३४२॥
बिना बांड़ा के खेतों से फल, मूल, अग्निहोत्र के लिए काष्ठ,
गौओं के लिए घास कोई लेवे तो वह चोरी नहीं कहाती—मनुजी
कहते हैं। जो ब्राह्मण परधन हरण करनेवाले को यज्ञ कराकर या
शास्त्र पढ़ाकर उससे धन लेना चाहता है, वह ब्राह्मण भी चोर
के समान ही है। जीविकाहीन द्विज मार्ग में जाता हुआ किसी
के खेत से दो ऊख या दो मूली ले लेय तो दण्ड योग्य नहीं है।
दूसरे के खुले पशुओं को बाँधनेवाला और बंधों को खोलनेवाला,
दास, घोड़ा, और रथ को हरनेवाला चोरी का अपराधी
होता है ॥ ३३६-३४२ ॥
अनेन विधिना राजा कुर्वाणःस्तेननिग्रहम् ।
यशोस्मिन् प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ३४३ ॥
ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् ।
नोपेक्षेत क्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ॥ ३४४ ॥
वाग्दुष्टात्तस्कराच्चैव दण्डेनैव च हिंसतः ।
साहसस्य नरः कर्ता विज्ञेयः पापकृत्तमः ॥ ३४५ ॥
साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः ।
स विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ३४६ ॥
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात् ।
समुत्सृजेत साहसिकान् सर्वभूतभयावहान् ॥ ३४७ ॥
इस प्रकार उक्त विधि से चोरों का निग्रह करने से राजा इस
लोक में सुयश और अन्त में अक्षय सुख पाता है। इन्द्रासन और
सुयश चाहनेवाला राजा लुटेरे मनुष्यों के निग्रह में क्षणमात्र भी