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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 475

बोधसागर

(३१)

मोरे प्रान पियारे तुम्ह हौ । केहि कारण अनत लेजे हौ ॥

कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबकी व्याकुलता

यह कहि धर्मदास पल लाऊँ । जिन्दा गुप्त भये तेहि ठाऊँ ॥
धर्मदास पुढुमी परु हारी । सद्गुरु कहैं बहु कीन्ह गोहारी ॥
मोहिं समको जग आहि अभाग । छुटे नदेह ठगौरी लागा ॥
जिमीभुअँग मणि जाइ हेराई । विकल फिरहिं जित तित बिललाई ॥
उहै हाल सद्गुरु विनु मोरा । कत पल दियेउ मन्द मति मोरा ॥
काह करौं कित दर्शन पाऊँ । बिनु दर्शन मैं प्रान गवाऊँ ॥
कीन्ह विवेक मन धीरज दीन्हा । मन महाँ पकर एक पुनिकीन्हा ॥
करौं महोत्सव संत अवराधौ । तब दर्शन देहिं पुरुष अनादी ॥
साहेब सन्त सनेही आहीं । सन्तन तजि वह अंत न जाहीं ॥
असहिय ठानि भवन चलि गयऊ । सन्त प्रसादको चितवन कियऊ ॥
संत धाम जहाँ लगि गम पावा । तहां तहां विनती नेवति पठावा ॥
छन्द-दिन अवधि वाही जुरन लागे बहु भेष पहुँचे आयहो ॥
दीहुँ जुथथि सेज आश्रम कीन्ह विनती जाइ हो ॥
दे भाव भोजन गमनिरश्वहिं सकल भेष अलेखही ॥
सबहिं निरखहिं सुरति परखहिं हृदय समाह विवेकही ॥
दोहा-पान सुपारी हाथलै, करहिं दण्डवत जाय ॥
भेषन सो चित विलखिके, पूछहिं मन परिचाय ॥
सोरठा-तुम्ह हो सन्त सुजान, निजदासन्ह सुख देतुहौ ॥
सत्य पुरुष सहिदान, सत्य लोक महिमा कहो ॥

बेष मता वर्णन

जोपाई

कोई कहै त्रिदेव अवराधौ । कोई कहै व्रत करि तन साधौ ॥
कोई कहै करु प्रतिमा सेवा । कोई तीरथ कोई जपत प भेवा ॥