कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 555, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(१११)
संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥
चौपाई
सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥
राजा बीरसिंह वचन
चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥
कबीर वचन
सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥
दूत वचन
साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥
कबीर वचन
तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥