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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 386

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विवेकसागर

दोहा-निर्विकल्प व्यापक सकल, साखी सर्व असंग ॥
सर्वरूप सबते परे, सबविधि जान अभंग ॥
आदि पुरुष सर्वज्ञ अज, पूरण रूप अनन्त ॥
यही भांति हरि नित्त हैं, नेति वेद गावन्त ॥
त्रिगुण नियन्ता ईश जो, सत चित सदा निवृत्त ॥
ताकी इच्छा मात्रही, बल पायो प्राकृत ॥
प्रकृति पुरुष संयोगते, प्रगट भयो मन भूप ॥
संकल्प विकल्प दोष उठे तेमन शक्ति अत्रूप ॥
मन माया विस्मृति कियो, नाम विचित्रा तासु ॥
आच्छादन कर पुरुषको, विलसे देह विलासु ॥
मन माया बहु छल कियो, कीन्हो बहु विस्तार ॥
सुगति गयी निजरूपकी, प्रगटचो तन हंकार ॥

इस प्रकारसे इस मनकी उत्पत्ति हुई ।

सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! शरी को इस भयानक राजा मनकी दो स्त्रियाँ हैं तिनमेंसे एक प्रवृत्ति है । जिसमें यह मन बहुत ही राग को प्राप्त हुआ है, अर्थात् उसके साथ अत्यन्त स्नेह करता है ।

प्रवृत्तिवंशवर्णन

महामोह तेहि सम्भव सुत अति लायका ॥
गर्व अति बलवान विजय रण शायका ॥
महाकोध अनुजै तेहि निकट अघोरता ॥
लोभ संगेतहि ठाढ आशा अधिक कठोरता ॥
तृष्णा वीर महाबलि अखिल संचारई ॥
को बांचे मेरी घात सो ऐसो विचारई ॥