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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथकी बात पूछना

बोधसागर

( १२१ )

मुनीन्द्र वचन चौपाई

बड हनुमान पौरुष तुव आही । आदि पुरुष तुम जानत नाहीं ॥
समरथ रूप नहीं कोइ जाने । उरली बात सब कोइ बखाने ॥
समरथ गति कोइ नहि जाने । बिनु देखी सो कही को माने ॥
बल पौरुष हम सब विधि जाना । तीन लोकमें सो करत पयाना ॥
तीन लोकमें अमल तुम्हारा । चौथा लोक सतगुरुका न्यारा ॥
तुमतो निरञ्जन निजकर जानी । ताका हुकुम लीन्ह शिर मानी ॥
पुरुष निरञ्जन ते है पारी । समरथ लगी है बास हमारी ॥
तहाँ काहु को बास न होई । वहाँ पहुँचि सकै नहि कोई ॥
यहाँ तुम कार्य करत हो भाई । तुम्हरे इष्ट अहैं रघुराई ॥
सोऊ कला निरञ्जन केरी । सत्य पुरुष गति तुम नहि हेरी ॥
साखी-तीन लोकमें नाम निरञ्जन, जाकी तुम सिफत करी ।
वह कोइ समरथ और है, जिन यह सब मांड धरी ॥

हनुमान वचन चौपाई

सुनो सुनीन्दर दृढ करि ज्ञाना । तब तो भेद भया निरबाना ॥
समरथ को अब भेद बताओ । हम सों नहीं कछु भेद दुराओ ॥

मुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमत कहों निज ज्ञाना । तोसों भाषों भेद विधाना ॥
समरथ को अब भेद बताऊँ । तुम सों भेद अब नाहि दुराऊँ ॥
आदि अनादि पार के पारा । ताको अगम्य अब सुनो विचारा ॥
जो प्रतीति होय जिव माहीं । सत्य शब्द समरथ की छाहीं ॥
समरथ शरण बडा है भाई । बल पौरुष सुखसागर पाई ॥
तादिन की यह कथा सुनाऊँ । जो मानो तो कहि समझाऊँ ॥
समुझि करो अपने मन माहीं । वह तो अकथ कहनकी नाहीं ॥
जो कहैं तो कौन पतियायी । देखी सुनि नहि वेदन गार्ई ॥

( १२२ )

हनुमानबोध

हंस गति पाये नहिं कोई । मोर सँदेश माने नहिं सोई ॥
ताते गये विगोइ विगोई । नहिं माने दुख पायो सोई ॥
सत्य शब्द मैं कहौं बखाना । बूझ होय तो बूझो ज्ञाना ॥
सारखी-बूझ करो हनुमत तुम, हौ तुम हंस स्वरूप ।
राम राम कह करत हौ, परै तिमिर के कूप ॥
राम राम तुम कहत हौ, नहिं सो अकथ सरूप ।
वह तो आये जगतमें, भये दशरथ घर भूप ॥
अगम अथाह तुमसों कहौं, सुनि लो अगम विचार ।
उत्पति परलय तहैं नहीं, साहब सिरजन हार ॥

चौपाई

सुनो हनुमत यह कथा नियारी । तब नहिं हती सो आदि कुमारी ॥
जाते भयी सकल विस्तारी । सो नहिं होती रचने हारी ॥
आदि भवानी सो महमाया । ताकी रचना हती न काया ॥
नहीं निरञ्जन की उत्पति कीन्हा । समरथ का घर काहु न चीन्हा ॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । अगम ठौर समरथ को देशा ॥
तब नहिं चन्द्र सूर्य औ तारा । तब नहिं अंध कूप उजियारा ॥
तब नहिं सात सुमेरु औ पानी । समरथ की गति काहु न जानी ॥
तब नहिं धरणि पवन आकाशा । तब नहिं सात समुद्र प्रकाशा ॥
पांच तत्त्व तीन गुण नाहीं । नाहीं तहाँ और कछु माहीं ॥
दश दिगपाल लखै नहिं लेखा । गम्य अगम्य काहु नहिं देखा ॥
दशों दिशा इन रचना रंची । वेद पुराण गीता इन बांची ॥
मूल डाल वृक्ष नहिं छाया । उत्पति परलय हती नहिं माया ॥
तब समरथ हते आपु अकेला । धरम माया नहिं मनको मेला ॥
विन सतगुरु को ठौर लखावे । भूली राह कौन समुझावे ॥
सारखी-हनुमत यह सब बूझिकै, करो आपनो काज ।
निर्भय पद को पाइके, होय अभय सो राज ॥