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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 701

बोधसागर

( १२१ )

मुनीन्द्र वचन चौपाई

बड हनुमान पौरुष तुव आही । आदि पुरुष तुम जानत नाहीं ॥
समरथ रूप नहीं कोइ जाने । उरली बात सब कोइ बखाने ॥
समरथ गति कोइ नहि जाने । बिनु देखी सो कही को माने ॥
बल पौरुष हम सब विधि जाना । तीन लोकमें सो करत पयाना ॥
तीन लोकमें अमल तुम्हारा । चौथा लोक सतगुरुका न्यारा ॥
तुमतो निरञ्जन निजकर जानी । ताका हुकुम लीन्ह शिर मानी ॥
पुरुष निरञ्जन ते है पारी । समरथ लगी है बास हमारी ॥
तहाँ काहु को बास न होई । वहाँ पहुँचि सकै नहि कोई ॥
यहाँ तुम कार्य करत हो भाई । तुम्हरे इष्ट अहैं रघुराई ॥
सोऊ कला निरञ्जन केरी । सत्य पुरुष गति तुम नहि हेरी ॥
साखी-तीन लोकमें नाम निरञ्जन, जाकी तुम सिफत करी ।
वह कोइ समरथ और है, जिन यह सब मांड धरी ॥

हनुमान वचन चौपाई

सुनो सुनीन्दर दृढ करि ज्ञाना । तब तो भेद भया निरबाना ॥
समरथ को अब भेद बताओ । हम सों नहीं कछु भेद दुराओ ॥

मुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमत कहों निज ज्ञाना । तोसों भाषों भेद विधाना ॥
समरथ को अब भेद बताऊँ । तुम सों भेद अब नाहि दुराऊँ ॥
आदि अनादि पार के पारा । ताको अगम्य अब सुनो विचारा ॥
जो प्रतीति होय जिव माहीं । सत्य शब्द समरथ की छाहीं ॥
समरथ शरण बडा है भाई । बल पौरुष सुखसागर पाई ॥
तादिन की यह कथा सुनाऊँ । जो मानो तो कहि समझाऊँ ॥
समुझि करो अपने मन माहीं । वह तो अकथ कहनकी नाहीं ॥
जो कहैं तो कौन पतियायी । देखी सुनि नहि वेदन गार्ई ॥