सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद पूछना

अनुरागसागर

( १०१ )

ज्ञानी वचन

सुनहु धर्म तुम कस छल करहु । प्रगट सुदास गुप्त छल धरहु ॥
गुप्त भेद नहिं देहौं तोहीं । पुरुष अवाज कही नहिं मोहीं ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीं । कबीर कहत यम निकट न जाहीं

धर्मराय वचन

कहे धर्म तुम मोहिं डुरै हो । खेल एक पुन हमहु खेलै हो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेव संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब

ज्ञानी वचन

अरे काल तू प्ररुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होई है शब्द सनेही । छल तुम्हार नहिं लागै तेही ॥
जौहरी हंस लेहिं पहिचानी । परखि हैं ज्ञान ग्रंथ मम वानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

यहि सुनत धर्मराय गहु मौना । है अन्तर्धान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति नन्दा । छल बुध कै जीवन कहैं फन्द्रा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगल चरित्र कहि समझाओ ॥

जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त

कबीर वचन धर्मदासप्रति

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ेसेको महिपाला ॥

सदगुरु वचन

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडप काज युगति सो कहई ॥
कृष्ण देह छांड़ी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥
स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥
मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपह मैं आयउ यहि काजा ॥

( १०२ )

अनुरागसागर

राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥
मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥
पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥
हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥
मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥
हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥
आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥
पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥
इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥
मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥
राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥
सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥
उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥
उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥
दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥

छन्द

रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥
चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥

उदधि वचन

जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥
अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥

अनुरागसागर

( १०३ )

सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये।
वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥
कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥
जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥
मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥

कबीर वचन

ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥
यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥
उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥
मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥
तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥
आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥
दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥
पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥
पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥
हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥
तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥
मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥
जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥
हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥
अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥
देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥

पण्डा वचन

हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥
क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥