कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥
मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥
पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥
हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥
मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥
हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥
आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥
पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥
इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥
मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥
राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥
सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥
उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥
उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥
दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥
छन्द
रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥
चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥
उदधि वचन
जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥
अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥