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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५

अ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५
( १४ ) कुश ( दाभ ) की जड़ और आमलक ( आंवले का फल )
इनको एक २ कर्ष लेकर छः गुने जल में कषाय करे इसमें श्यामाक तण्डुल
पाक कर के सिद्ध करनी चाहिये । यह पान करने योग्य यवागू शरीर में रूक्षता
उत्पन्न करती है ॥ २६ ॥
दशमूलोभृता कास-हिक्का-श्वास-कफापहा ।
यमके मदिरासिद्धा पक्वाशयरुजापहा ॥ २७ ॥
( १५ ) दशमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बृहती, गोखरू, बिल्व,
श्योनाक, अरणी, गम्भारी, पाठा ) से सिद्ध की हुई यवागू कास, हिक्का, श्वास
और कफ को नष्ट करती है ।
( १६ ) यमक अर्थात् समान भाग घी और तैल लेकर इन में भूनी हुई
एवं पानी के स्थान पर मदिरा लेकर उनमें सिद्ध की हुई यवागू ( मदिरा
मिलाकर देने से ) पक्वाशय की पीड़ा को मिटाती है १ ॥ २७ ॥
शाकैर्मासैस्तिलैर्माषैः सिद्धा वर्चो निरस्यति ।
जम्बवाम्रास्थि-दधित्थाम्ल-बिल्वैः सांग्राहिकी मता ॥ २८ ॥
( १७ ) 'शाक' ( हरी सब्जियाँ ) मांस, तिल, माष ( उड़द ) इन के
कल्क और कषाय से सिद्ध की हुई यवागू मल को बाहर निकालती है ।
( १८ ) जम्बु-अस्थि ( जामुन की गुठली ) आम्रास्थि ( आम की गुठली
की गिरी ) दधित्थाम्ल ( कैथ कच्चा, खट्टी अवस्था में ), बिल्व ( बेलगिरी
कच्चे हरे ), इनसे सिद्ध की हुई यवागू 'स्तम्भक' है ॥ २८ ॥
क्षार-चित्रक-हिङ्ग्वम्ल-वेतसैर्भेदिनी मता ।
अभया-पिप्पलीमूल-विश्वैर्वातानुलोमनी ॥ २६ ॥
( १६ ) क्षार ( जवाखार २ ), चित्रक ( चीतामूल ), हींग, अम्लवेतस
(अमलवेत), इन से सिद्ध की हुई यवागू मल को भेदन करके बाहर निकालती है ।
( २० ) अभया ( जंगी हरड़ ), पीपल मूल और विश्व ( सोंठ ) इन से
१ 'यमक' एक भाग घी और एक भाग तैल परस्पर समान और एक
भाग मदिरा लेनी चाहिये । अथवा मूंग की दाल और सांठी के चावल परस्पर
समान भाग मिलाकर मदिरा में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । ( जल्प कल्प-तरु )
२. जवाखार बनाने के लिये हरे जवों को आग में स्वच्छ स्थान में जला
लेना चाहिये । फिर इस को पानी में घोलकर वस्त्र में से छान लेना चाहिये ।
छाने हुए पदार्थ को आग पर गरम करके शुष्क कर लेना चाहिये ।

३६ चरकसंहिता [ अ० २
सिद्ध की हुई यवागू वात का अनुलोमन अर्थात् कफ वातादि दोषों का परिपाक
करके मल को अच्छी प्रकार से बाहर करती है ॥ २६ ॥
तक्रसिद्धा यवागूः स्याद् घृतव्यापत्तिनाशिनी।
तैलव्यापदि शस्ता तु तक्रपिण्याकसाधिता ॥ ३० ॥
(२१) छाछ में सिद्ध की हुई यवागू घी के अधिक खाने से उत्पन्न
विकार को नष्ट करती है ।
(२२) छाछ और पिण्याक (खल) से सिद्ध की हुई यवागू तैल के
अधिक खाने से उत्पन्न व्याधि में देने योग्य है ॥ ३० ॥
गव्यमांसरसैः साम्ला विषमज्वरनाशिनी ।
कण्ठ्या यवानां यमके पिप्पल्यामलकैः शृता ॥ ३१ ॥
(२३) गाय के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू को अनार, आंवला
आदि ज्वर नाशक खटाई से खट्टा करके देने पर विषम ज्वर नष्ट होता है ।
(२४) जौ को समान भाग लेकर घी और तैल में भूनकर पिप्पली और
आंवले इनके कषाय या कल्क से सिद्ध की हुई यवागू कण्ठ के रोगों के
लिये हितकर है ॥ ३१ ॥
ताम्रचूड़रसे सिद्धा रेतोमार्गरुजापहा ।
समाषत्रिदला वृष्या घृतक्षीरोपसाधिता ॥ ३२ ॥
(२५) 'ताम्रचूड़' अर्थात् कुक्कुट के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू
शुक्र मार्ग की पीड़ा को मिटाती है।
(२६) जल के स्थान पर दूध और घृत यथापरिमाण में लेकर उनमें
उड़द की दाल या इसकी पिसी हुई पिट्ठी को पहिले घी में भूनकर दूध में
यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह शुक्रवर्धक है ॥ ३२ ॥
उपोदिकादधिभ्यां तु सिद्धा मदविनाशिनी ।
क्षुधं हन्यादपामार्गक्षीरगोधारसै शृता ॥ ३३ ॥
(२७) उपोदिका अर्थात् पोई को कल्क रूप में तथा दही को पानी के
स्थान में लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह यवागू धतूरे आदि के विष को
नष्ट करती है । पोई और दही से सिद्ध की यवागू मद नाशक है ।
(२८) चिरचिटे के चावलों को दूध और गोह के मांस में पकाकर यवागू
सिद्ध करे । इस से भूख का नाश होता है। यहां पर जल वा सादे चावल
नहीं प्रयुक्त होते ॥ ३३ ॥

अ० ३ सूत्रस्थानम् ३७

अ० ३ सूत्रस्थानम् ३७
उपसंहार—
तत्र श्लोकाः ।
अष्टाविंशतिरित्येता यवाग्वः परिकीर्तिताः ।
पञ्चकर्माणि चाश्रित्य प्रोक्ता भैषज्यसंग्रहः ॥ ३४ ।
पूर्वं मूलफलज्ञानहेतोरुक्तं यदौषधम् ।
पञ्चकर्माश्रयज्ञानहेतोस्तत्कीर्तितं पुनः ॥ ३५ ॥
इस अध्याय में अट्ठाईस प्रकार की यवागू कह दी हैं और पंच कर्म (वमन,
विरेचन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन) इन के योग्य ओषधियां भी कह दी
हैं। मूलिनी, फलनी आदि का ज्ञान कराने के लिये जो औषधियां प्रथम
अध्याय में कही हैं, वे औषधियां पंचकर्मों में आद्य व्याधियों में उपयुक्त हैं,
इसलिये यहां पर फिर लिखी हैं ॥ ३४-३५ ॥
स्मृतिमान् युक्तिहेतुज्ञो जितात्मा प्रतिपत्तिमान् ।
भिषगौषधसंयोगैश्चिकित्सां कर्तुमर्हति ॥ ३६ ॥
(स्मृतिमान्) स्मरण शक्ति वाला, (हेतुज्ञ) रोग के कारण का जानने
वाला, (युक्तिज्ञ) योजना, व्याधि के साधन रूप भैषज्य की कल्पना को जानने
वाला, अथवा मात्रा की भांति द्रव्य, व्याधि बल और व्याधि रूप को जानने
वाला, (जितात्मा) भ्रम-प्रमाद रहित, (प्रतिपत्तिमान्) उत्तम सूझ वाला, वैद्य
औषधियों के योग से उपचार करने में समर्थ हो सकता है ॥ ३६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने सभाषाभाष्ये भेषज-
चतुष्केऽपामार्गतण्डुलीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ।
अथात आरग्वधीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
रोगों की हितकामना से यवागू कहकर उसी प्रसंग में प्रदेह चूर्ण आदि
कहते हैं। इसके लिये 'आरग्वधीय' नामक तीसरे अध्याय का व्याख्यान करते
हैं ऐसा भगवान् आत्रेय कहते हैं। इस अध्याय का आरम्भ 'आरग्वध' से हुआ
है, इसलिये इस अध्याय का नाम आरग्वधीय है ॥१-२॥

३८ चरकसंहिता [ अ० ३
आरग्वधः सैडगजः करञ्जो वासा गुडूची मदनं हरिद्रे ।
श्याह्वः सुराह्वः खदिरो धवश्च निम्बो विडङ्गं करवीरकत्वक् ॥३॥
ग्रन्थिश्च भौर्जो लशुनः शिरीषः सलोमशो गुग्गुलुकृष्णगन्धे ।
फणिज्जको वत्सकसप्तपर्णौ पीलूनि कुष्ठं सुमनःप्रवालाः ॥४॥
वचा हरेणुस्त्रिवृता निकुम्भो भल्लातकं गैरिकमञ्जनञ्च ।
मनःशिलाले गृहधूम एला काशीसलोध्रार्जुनमुस्तसर्जाः ॥ ५ ॥
इत्यर्धरूपैर्विहिताः षडेते गोपित्तपीताः पुनरेव पिष्टाः ।
सिद्धाः परं सर्षपतैलयुक्ताश्चूर्णप्रदेहा भिषजा प्रयोज्याः ॥ ६ ॥
कुष्ठानि कृच्छ्राणि नवं किलासं सुरेन्द्रलुप्तं किटिभं सदद्रु ।
भगन्दराशांस्यपचीं सपामां हन्युः प्रयुक्तास्त्वचिरान्नराणाम् ॥ ७ ॥
'आरग्वध' से लेकर 'सर्ज' इस शब्द तक तीन श्लोकों में कहे हुए छः
योग हैं, इनको गाय के पित्त में पीस कर काम में लाना चाहिये । यथा—
(१) आरग्वध (अमलतास), ऐडगज (पनवाड़), करञ्ज ( नाटा करंज ), वासा
(वासे के पत्ते), गुडूची (गिलोय), मदन ( मैनफल ), दो हरिद्रा ( हल्दी और
दारु हल्दी ) । ( २ ) श्याह्व ( गन्दा विरांजा ), सुरा ( देवदार ), खदिर
( खैर ), और धव ( धावन ), निम्ब ( नीम के पत्ते ), विडंग ( बायविडंग ),
करवीरत्वक् ( कनेर की छाल ) यह दूसरा । ( ३ ) भोजपत्र की गाठें, लशुन
( लहसन ), शिरीष (सिरस की छाल), लोमशा ( जटामांसी ), गूगल, कृष्ण-
गन्धा ( सहजना ) यह तीसरा । ( ४ ) फणिज्जक ( मरवा ) वत्सक (इन्द्र जौ)
सप्तपर्ण ( सातवन ), पीलू कुष्ठ ( कूठ ), सुमनःप्रवाल (चमेली के कोमल पत्ते)
यह चौथा । ( ५ ) वचा ( वच ), हरेणु ( रेणुका बीज, मँहदी के बीज ),
त्रिवृत् ( निशोथ ), निकुम्भ ( जमाल गोटा ), भल्लातक ( भिलावा ), गैरिक
( गेरू), अंजन (•रसाञ्जन), यह पांचवां, ( ६ ) मनःशिला ( मैनसिल ), आल
( हरिताल ), गृहधूम ( घरका धुंआसा ), एला ( छोटी इलायची ), काशीस
( पुष्प कासीस ), लोध्र ( पठानी लोध ), अर्जुन ( अर्जुन वृक्ष की छाल ),मुस्ता
(नागरमोथा), सर्ज ( राल ) यह छठा योग हुआ ।
इनमें से किसी योग को चूर्ण के रूप में तैयार करके गाय के पित्त के साथ
फिर पीसे । फिर इसको सरसों के तेल में मिला कर द्रव रूप बनाकर लगाने से
कष्टसाध्य कुष्ठरोग, नया किलास इन्द्रलुप्त बालों का गिरना किटिभ ( कुष्ठ भेद )
दद्रु ( दाद ), भगन्दर बवासीर, चर्मकील, अपची ( न पकने वाली गाठें )
और पामा ( खाज ) शीघ्र ही मनुष्यों के नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ३६
अथ सातवां योग कहते हैं—
कुष्ठं हरिद्रे सुरसं पटोलं निम्बाश्वगन्धे सुरदारु शिग्रु ।
ससर्षपं तुम्बुरुधान्यवन्यं चण्डां च चूर्णानि समानि कुर्यात् ॥८॥
तैस्तक्रयुक्तैः प्रथमं शरीरं तैलाक्तमुद्वर्तयितुं यतेत ।
तेनास्य कण्डूः पिडकाः सकोठाः कुष्ठानि शोफाश्च शमं व्रजन्ति ॥६॥
कुष्ठ (कूठ), दोनों हल्दी (दारुहल्दी और हल्दी), सुरसा (तुलसी),
पटोल (परवल), निम्ब (नीम के पत्ते), अश्वगन्धा (असमन्ध), सुरदारु
(देवदार), शिग्रु (सहजना), सर्षप (श्वेत सरसों), तुम्बुरु, धान्य (धनिया)
वन्य (कैवर्त्त मुस्ता), चण्डा (चांरक) इन पन्द्रह औषधियों को परस्पर
समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को छाछ में पीसकर शरीर
पर लगाना चाहिए । शरीर पर लगाने से पूर्व तैल का उबटन लगा लेना
चाहिये । इस लेप के लगाने से कण्डू (खाज़), पिडका (छोटी २ फुन्सियां),
कोठ (न दबने वाली फुन्सियां), कुष्ठ कोढ और शोफ (सूजन) नष्ट होते हैं ॥८-६॥
आठवां योग---
कुष्ठामृतासङ्घटकटङ्कटेरीकाशीसकम्पिल्लकलोध्रमुस्ताः
सौगन्धिकं सर्जरसो विडङ्गं मनःशिलाले करवीरत्वक् ॥ १० ॥
तैलाक्तगात्रस्य कृतानि चूर्णान्येतानि दद्यादवचूर्णनार्थम् ।
दद्रुः सकण्डूः किटिभानि पामा विचर्चिका चैव तथेति शान्तिम्॥११॥
कुष्ठ (कूठ), अमृता (गिलोय), संग (नीला तुत्थ), कटंकटेरी (दारु
हल्दी), काशीस (हीरा कसीस), कम्पिल्लक (कमीला), मुस्त (नागर मोथा),
लोध्र (पठानी लोध), सौगन्धिक (, कह्लार पुष्प, सुगन्धि), सर्जरस (राल),
मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), करवीरत्वक् (कनेर की छाल), इन
चौदह ओषधियों का चूर्ण करके अवचूर्णन (अर्थात् मलने) के लिए देना
चाहिये । प्रथम शरीर पर तैल की मालिश कर लेनी चाहिये । इस से दाद,
कण्डू, खाज़, किटिभ, कुष्ठ, पामा, विसर्प, बिर्चर्चिका स्रावयुक्त फुन्सियां, नष्ट
होती हैं । कोई अमृतासंग एक वस्तु मानकर नीला थोथ अर्थ करते हैं ॥१०-११॥
नवां योग—
मनःशिलाले मरिचानि तैलमार्कं पयः कुष्ठहरः प्रदेहः ।
मनःशिला (मैनसिल), आल (हरताल), मरिच, तैल (सरसों का तेल
कुष्ठहर होने से), 'आर्कंपयस्' (आक का दूध) इनको परस्पर मिला कर लेप
बना कर लगाने से कुष्ठ अच्छा होता है ।

४० चरकसंहिता [ अ० ३
इस योग में पानी को मिलाना नहीं चाहिये, अपितु आक के दूध में ही
सब बनाना चाहिये ।
दसवां योग—
तुत्थं विडङ्गं मरिचानि कुष्ठं लोध्रं च तद्वन् समनःशिलं स्यात् ॥ १२ ॥
तुत्थ ( नीला थोथा ), विडंग (वायविडंग), मरिच (काली मरिच), कुष्ठ
( कूट ), लोध्र (पटानी लोध्र ), मनःशिला (मनसिल) इनके चूर्ण को पूर्व की
भांति आक के दूध में मिलाकर लगाना चाहिये ॥१२॥
ग्यारहवां लेप—
रसाञ्जनं सप्रपुनाडबीजं युक्तः कपित्थस्य रसेन लेपः ।
रसाञ्जन ( रसौंत ), प्रपुनाडबीज ( पनवाड़ के बीज ), इन को कैथ के
पत्तों के रस में मिलाकर लगाने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है । पानी का उपयोग
नहीं करना चाहिये ।
बारहवां योग—
करञ्जबीजैडगजं सकुष्ठं गोमूत्रपिष्टं च परः प्रदेहः ॥ १३ ॥
करंज ( नाटा करंज बीज ), ऐडगज ( चक्रमर्द ) और कुष्ठ ( कूट ),
इनको गोमूत्र में पीस कर लेप करने से कुष्ठ नष्ट होता है ॥ १३ ॥
तेरहवां योग—
उभे हरिद्रे कुटजस्य बीजं करञ्जबीजं सुमनःप्रवालान् ।
त्वचं समध्यां हयमारकस्य लेपं तिलक्षारयुतं विदध्यात् ॥ १४ ॥
दोनों प्रकार की हल्दी ( साधारण हल्दी और दारू हल्दी ), कुटज बीज
(इन्द्रजौ), करंज बीज ( करंजुए का बीज ), सुमनःप्रवाल ( चमेली के कोमल
नये पत्ते ), हयमारक ( कनेर ) की अन्दर की त्वचा, और तिल क्षार (तिलकी
नाल का क्षार भस्म) इनका लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ रोग मिटता है ॥१४॥
चौदहवां योग—
मनःशिला त्वक्कुटजात्सकुष्ठात् सलोमशः सैडगजः करञ्जः ।
ग्रन्थिश्च भौर्जः करवीरमूलं चूर्णानि साध्यानि तुषोदकेन ॥१५॥
पलाशक्षारोदकरसेन चापि सर्पोद्धृतान्याढकसंमितेन ।
दर्वीप्रलेपं प्रवदन्ति लेपमेतत्परं कुष्ठनिषूदनाय ॥ १६ ॥
मनःसिल, कुटजत्वक् ( कूड़े की छाल ), कुष्ठ ( कूट ) लोमश, ( जटा-
मांसी ), ऐडगज ( चक्रमर्द ), करंज, ( करंजुआ ), भौर्ज ( भोजपत्र की
गांठें ), करवीर (कनेर की जड़), ये आठो द्रव्य प्रत्येक एक एक कर्ष ( दो २

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४१

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४१
तोला) लेकर तुषोदक (यव-काञ्जिक) एक आढक तथा 'पलाश-निर्दाह रस'
अर्थात् ढाक के वृक्ष को जलाने से उत्पन्न रस¹ एक आढक परिमाण (८ सेर)
लेकर पाक करना चाहिये । पाक इतना करना चाहिये कि वह कड़छी पर चिप-
टने लगे। यह प्रलेप कुष्ट रोग को नष्ट करने के लिये श्रेष्ठ है ॥१५-१६॥
पन्द्रहवां योग—
पर्णानि पिष्ट्वा चतुरङ्गुलस्य तक्रेण पर्णान्यथ काकमाच्याः ।
तैलाक्तगात्रस्य नरस्य कुष्ठान्युद्वर्तयेदश्वहनच्छदैश्च ॥ १७ ॥
अमलतास के पत्तों, मकोय के पत्तों का और अश्वहनच्छद (कनेर) के
पत्तों को छाछ के साथ पीसकर शरीर पर तैल का मालिश करके कुष्टरोग में मले ।
कई विद्वान् 'काकमाच्याः पर्णानि' शब्द से एक अन्य योग की कल्पना
करते हैं । इसी प्रकार 'अश्वहनच्छदैश्च' इन से तीसरा योग मानते हैं ॥ १७ ॥
सोलहवां योग—
कोलं कुलत्थाः सुरदारु रास्ना माषातसीतैलफलानि कुष्ठम् ।
वचा शताह्वा यवचूर्णमम्लमुष्णानि वातामयिनां प्रदेहः ॥ १८ ॥
कोल (झाड़ी के बेर), कुलत्थ (कुलथी), सुरदारु (देवदारु), रास्ना
उड़द, अतसी (अलसी), तैलफल (एरण्ड के बीज), कुष्ठ (कूट), वचा
(वच) शताह्वा (सौंफ), और यवचूर्ण (यवक्षार) इनको 'अम्ल' (कांजी)
के साथ पीसकर प्रलेप बनाकर गरम करके वातरोगी के लिये प्रयुक्त करे । इससे
वातरोग नष्ट होते हैं ॥१८॥
सत्रहवां योग—
आनूपमत्स्यामिषवेसवारैरुष्णैः प्रदेहः पवनापहः स्यात् ।
स्नेहैश्चतुर्भिर्दशमूलमिश्रैर्गन्धौषधैश्चानिलजित्प्रदेहः ॥ १६ ॥
आनूपामिष (जलप्राय देश में चरने वाले पशुओं का मांस) मत्स्यामिष
(मछलियों का मांस) इनसे बनाये हुए बेसवार (अस्थि रहित मांस को भाप
से स्विन्न करके शिला पर पीस लेना चाहिये, फिर इसमें गुड़, घी, पिप्पली,
मरिच मिलाने से बेसवार बनता है) । इस को गरम करके लेप करने से वायु
का नाश होता है ।
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१—ढाक के वृक्ष की प्रधान मुख्यजड़ को काट कर इस के नीचे एक
मिट्टी का घड़ा रख देना चाहिये । और ऊपर के भाग को जलाना चाहिये ।
जलाने पर जो रस निकलता है, उस रस को लेना चाहिये । आज कल खैर या
शीशम का तैल पाताल यन्त्र से निकालते हैं ।

४२ चरकसंहिता [ अ० ३
अठारहवां योग—
घी, तैल, वसा और मज्जा इन चार स्नेहों को दशमूल के साथ मिला कर
अथवा चारों स्नेहों को ज्वर अधिकार में कही चन्दन आदि सुगन्धित औषधियों
के साथ मिलाकर लेप करने से वातविकार नष्ट होते हैं । यहां पर न कहने पर
भी पानी मिलाना चाहिये ॥ १६ ॥
उन्नीसवां योग—
तक्रेण युक्तं यवचूर्णमुष्णं सक्षारमार्तिं जठरे निहन्यात् ।
जौ के आटे को यवक्षार के साथ छाछ में पीसकर पेट पर लगाने से पीड़ा
को नष्ट करता है ।
बीसवां योग—
कुष्ठं शताह्वां सवचां यवानां चूर्णं सतैलाम्लमुशन्ति वाते ॥ २० ॥
कुष्ठ (कूट), शताह्वा (सौंफ), वचा (वच), जौ के आटे को तिल के
तैल और अम्ल (कांजी) में मिलाकर लगाने से वातविकार नष्ट होते हैं ॥२०॥
इक्कीसवां योग—
उभे शताह्वे मधुकं मधूकं बलां प्रियालं च कसेरुकं च ।
घृतं विदारीं च सितोपलां च कुर्यात्प्रदेहं पवने सरक्ते ॥२१॥
सौंफ और सोया, मधुक (मुलैहठी), मधूक (महुवा) बला (खरैंटी),
प्रियाल (प्याल, पकने पर यह काला फल होता है, जिसमें से चिरौंजी निकलती
है), कशेरू, घृत (गाय का) विदारी कन्द, सितोपला (मिश्री, खड़ी शकर),
इनका पानी के साथ लेप वातरक्त रोग में लाभदायक है ॥ २१ ॥
बाईसवां योग—
रास्नां गुडूचीं मधुकं बले द्वे सजीवकं सर्षभकं पयश्च ।
घृतं च सिद्धं मधुशेषयुक्तं रक्तानिलात्तिं प्रणुदेत्प्रदेहः ॥२२॥
रास्ना, गुडूची (गिलोय), मधुक (मुलहठी), दोनों प्रकार की बलाएं
(खरैंटी और अतिबला—सफेद और पीले फूल की खरैंटी), जीवक, ऋषभक,
गाय का दूध; गाय का घी, मधुशेष (मोम) इनसे सिद्ध घी रूप लेप वातरक्त
रोग को नष्ट करता है । इस योग से घृत सिद्ध किया जाता है १ ॥ २२ ॥
१. रास्ना से लेकर ऋषभक तक सब ओषधियों का कल्क बनाना चाहिये ।
यह कल्क घी, स्नेह से चतुर्थांश होना चाहिये । और दूध घो स्नेह से दूना
होना चाहिये । इससे घी सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध होने पर वस्त्र में से छान
कर उष्णावस्था में ही इसमें मोम मिला देनी चाहिये । मोम की मात्रा स्नेह से
चतुर्थांश अर्थात् कल्क के बराबर होनी चाहिये ।

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४३

अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४३
तेईसवां योग—
वाते सरक्ते सघृतः प्रदेहो गोधूमचूर्णं छागलीपयश्च ।
गोधूम ( गेहूँ ) के चूर्ण को बकरी के दूध और घी के साथ मिलाकर
लगाने से वातरक्त रोग मिटता है । यहां भी दूध में गेहूँ के चूर्ण के साथ घी
सिद्ध कर लेना चाहिये ।
चौबीसवां योग—
नतोत्पलं चन्दनकुष्ठयुक्तं शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहः ॥ २३ ॥
'नत' ( तगर ), उत्पल ( नीला कमल ), चन्दन, कुष्ठ (कूट) इनके चूर्ण
को घी में मिलाकर शिर पर लगाने से शिर की पीड़ा मिटती है ॥ २३ ॥
पच्चीसवां योग—
प्रपौण्डरीकं सुरदारु कुष्ठं यष्ट्याह्वमेला कमलोत्पले च ।
शिरोरुजायां सघृतः प्रदेहो, लोहैरकापद्मकचोरकैश्च ॥ २४ ॥
प्रपौण्डरीक ( पुण्डरीक काष्ठ ), सुरदारु ( देवदारु ), कुष्ठ ( कूट )
यष्ट्याह्न ( मुलेहठी ), एला ( इलायचो ), कमल ( श्वेत कमल, कमल गट्टा),
उत्पल ( नीला कमल ), लोह ( अगर ), ऐरक (रोहिष घास), पद्मक (पद्माख)
और चोरक ( चोरपुष्पी, सुगन्धित द्रव्य है, पर्वतीय लोग दाल आदि में गेरते
हैं ), इनको घो में मिलाकर शिर दुखने पर माथे में लगाने से आराम मिलता है।
यहां पर पीसने के लिये पानी मिला लेना चाहिये ॥ २४ ॥
छब्बीसवां योग—
रास्ना हरिद्रे नलदं शताह्वे द्वे देवदारूणि सितोपला च ।
जीवन्तिमूलं सघृतं सतैलमालेपनं पार्श्वरुजासु कोष्णम् ॥२५॥
रास्ना, दोनों हरिद्रा ( हल्दी और दारु हल्दी ), नलद ( जटामांसी ),
दोनों शताह्वा ( सौंफ और सोया ), देवदारु, सितोपला ( मिश्री ), जीवन्ती का
मूल, इनके चूर्ण को घृत और तैल (तिल का तैल) में (ये घी तैल दोनों परस्पर
समान भाग हों ) मिलाकर गरम करके पार्श्व शूल में लेप करना चाहिये ॥२५॥
सत्ताईसवां योग—
शैवालपद्मोत्पलवेत्रतुङ्गं प्रपौण्डरीकाण्यमृणाललोध्रम् ।
प्रियङ्गुकालीय कचन्दनानि निर्वापणः स्यात्सघृतः प्रदेहः ॥२६॥
शैवाल ( सरवाल ), पद्म ( पद्माख ), उत्पल ( नील कमल ), वेत्र ( श्रेष्ठ
वेत, लोटी बेत ), तुंग ( कमल का केशर ), प्रपौण्डरोक ( पुण्डरीक ),
अमृणाल (खस), लोध्र (पठानी) प्रियंगू (फूल प्रियंगु), काळीयक (चन्दन भेद,

४४ चरकसंहिता [ अ० ३
हरि चन्दन), और चन्दन इनको (पानी में पीस कर) सब द्रव्यों के समान घी
मिलाकर लेप करने से त्वचा का दाह, आग से जले की जलन शान्त होती है ॥२६॥
अट्ठाईसवां योग—
सितालतावेतसपद्मकानि यष्ट्याह्वमैन्द्री नलिनानि दूर्वा ।
यवासमूलं कुशकाशयोश्च निर्वापणः स्याज्जलमेरका च ॥२७॥
सिता (श्वेत दूब), लता (प्रियंगू या सारिवा), वेतस (जल वेतस),
यष्टि (मुल्हट्टी), ऐन्द्री, 'नलिन' (नीला कमल), दूर्वा (दूब), यवासमूल
(धमासे की जड़), कुश (दाभ), काश की जड़, जल (बालक), ऐरक
(होगला) इनको जल के साथ पीसकर लेप करने से त्वचा की जलन शान्त
होती है। कोई सिता से मिश्री और लता से मजीठ का ग्रहण करते हैं ॥२७॥
उनतीसवां तथा तीसवां योग—
शैलेयमेलाऽगुरु चाथ कुष्ठं चण्डा नतं त्वक्सुरदारु रास्ना ।
शीतं निहन्यादचिरात् प्रदेहो, विषं शिरीषस्तु ससिन्धुवारः ॥ २८ ॥
शैलेय (छड़ीला), इला (इलायची) अगर, कुष्ठ (कूठ), चण्डा
(चोर पुष्पी), नत (तगर), त्वक् (दालचीनी), सुरदारु (देवदार),
रासना, इनको पानी में पीस कर लेप करने से शीत, ठण्डक नष्ट होती है।
तीसवां योग—'शिरीष' (सिरस) को सिन्धुवार (सम्भालु के पत्ते) के साथ
पीसकर मलने से विष दोष नष्ट होता है ॥ २८ ॥
इकतीसवां योग—
शिरीषलामज्जकहेमलोध्रैस्त्वग्दोषसंस्वेदहरः प्रघर्षः ।
शिरीष (सिरस), लामज्जक (उशीर, खस), हेम (नागकेसर), लोध्र
(पठानी लोध), इनको चूर्ण बनाकर शरीर पर रगड़ने से त्वचा के रंग एवं
पसीने का अधिक आना नष्ट होता है।
बत्तीसवां योग—
पत्राम्बुलोध्राभयचन्दनानि शरीरदौर्गन्ध्यहरः प्रदेहः ॥२६॥
पत्र (तेजपात), अम्बु (नेत्रवाला), लोध्र (पठानी लोध), अभय
(उशीर, खस), और श्वेत चन्दन इनको पानी में पीसकर लेप करने से
शरीर की दुर्गन्ध मिटती है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः ।
इहात्रिजः सिद्धतमानुवाच द्वात्रिंशतं सिद्धमहर्षिपूज्यः ।
चूर्णप्रदेहान्विविधामयघ्नानारग्वधीये जगतो हितार्थम् ॥३०॥

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४५

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४५
सिद्ध एवं ऋषियों से पूजित कृष्णात्रेय पुनर्वसु ने रोगों को नष्ट करने वाले
बत्तीस सिद्ध योग जगत् के लाभ के लिये कहे हैं ॥ ३० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के
आरग्वधीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः
अथातः षड्विरेचनशताश्रितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'षड्विरेचन' से आरम्भ किये जाने वाले अध्याय का अवतरण
करते हैं । भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥
शरीर के लिये अन्तः परिमार्जन और बहिःपरिमार्जन की ओषधियों को
पूर्व अध्यायों में कहकर अवशिष्ट परिमार्जन की ओषधियों को कहते हैं—
इह खलु षड्विरेचनशतानि भवन्ति, षड् विरेचनाश्रयाः,
पञ्च कषाययोनयः, पञ्चविधं कषायकल्पनं,
पञ्चाशन्महाकषाया पञ्च कषायशतानि इति संग्रहः ॥३॥
इस तंत्र में छः सौ विरेचन योग हैं, न अधिक और न कम ।
'विरेचन' शब्द उभयार्थ वाचक है । अर्थात् शरीर के अधोभाग से मल
निःसारण का नाम भी विरेचन है और शरीर के ऊर्ध्व भाग से वमन के रूप में
किये जाने वाले संशोधन रूप कर्म का भी 'विरेचन' कहते हैं । विरेचन द्रव्यों
के छः आश्रय हैं, यथा—दूध, मूल, त्वचा, पत्र, पुष्प और फल ।
कषायों के पांच जातियां हैं ( इनमें लवण रस को छोड़ कर ) कषायों की
कल्पना पांच प्रकार की है । पचास महाकषाय हैं, पांच सौ कषाय हैं । यह
संक्षेप में कह दिया है ॥ ३ ॥
षड्विरेचनशतानीति यदुक्तं तदिह संग्रहेणोदाहृत्य
विस्तरेण कल्पोपनिषद्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ४ ॥
'छः सौ विरेचन योग हैं' यह जो कहा है उसे यहां पर संक्षेप में कहेंगे ।
विस्तार से कल्प-उपनिषद् अर्थात् 'कल्प-स्थान' में व्याख्या करेंगे ॥ ४ ॥
त्र्यस्त्रिंशद्योगशतं प्रणीतं फलेषु, एकोनचत्वारिंशज्जीमूतकेषु योगाः,
पञ्चचत्वारिंशदिक्ष्वाकुषु, धामार्गवः षष्ठिधा भवति योगयुक्तः, कुटज-
स्त्वष्टादशधा योगमेति, कृतवेधनं षष्ठिधा भवति योगयुक्तं, श्यामात्र्रि-

मदन फल के कल्प में १३३ विरेचन योग, 'जीमूतक' (वन्दाल) फल के

४६ चरकसंहिता [ अ० ४
वृद्धोमशतं प्रणीतं दशापरे चात्र भवन्ति योगाः, चतुरङ्गुलो द्वादशधा
योगमेति, लोध्रं विधौ षोडशयोगयुक्तं, महावृक्षो भवति विंशतियोग-
युक्तः, एकोनचत्वारिंशत्सप्तलाशङ्खिन्योर्योगाः, अष्टचत्वारिंशद्दन्तीद्रव-
न्त्योरिति षड्विरेचनशतानि ॥ ५ ॥
मदन फल के कल्प में १३३ विरेचन योग, 'जीमूतक' (वन्दाल) फल के
कल्प में ३६, ईक्ष्वाकु (कडवी तुम्बी) कल्प में ४५, धामार्गव (बड़ी तुरई
पीले फूल की, राज कोषातकी) कल्प में ६०, कुटज (कूड़े) के फल कल्प में
१८ प्रकार के, कृतवेधन (कडुवी तोरी) के उपयोग में विरेचन योग ६०, इस
प्रकार से ये वमन रूप विरेचन योग हैं। अब अधोगामी विरेचन योग कहते हैं-
श्यामा (अरुणमूल) की निशोथ और त्रिवृत् (सफेद निशोथ) कल्प के
११० योग, चतुरङ्गुल (अमलतास) कल्प के १२ प्रकार के योग, लोध्र विधि
(लोध्र कल्पों में विरेचन विधि) के अन्दर १६ योग, महावृक्ष (स्नुही, सुधा
वृक्ष) कल्प में २०, सप्तला और शंखिनी (शिकाकाई) के कल्प में ३६ और
दन्ती (जमालघोटा), द्रवन्ती के ४८ प्रकार के योग हैं। इस प्रकार से ६००
विरेचन योग बन जाते हैं ॥ ५ ॥
षड्विरेचनाश्रया इति क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलानीति ॥६॥
विरेचन क्रिया ओषधियों के छः (अंगों में) आश्रय है। यथा-क्षीर
(दूध), मूल, त्वक्-त्वचा, पत्र, पुष्प और फल ॥ ६ ॥
पञ्च कषाययोनय इति मधुरकषायोऽम्लकषायः। कटुकषायस्तिक्त-
कषायः कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा ॥ ७ ॥
'कषाय' की पांच योनि (जातियां) हैं। यथा-मधुरकषाय
(मधुर रस वाले पदार्थों से बना हुआ कषाय), अम्लकपाय (खट्टे रस वाले
पदार्थों से बनाया हुआ कषाय), कटुकषाय (कडुवे रसवाले पदार्थों से तय्यार
किया कषाय), तिक्तकषाय (तीखे पदार्थों से तय्यार किया हुआ कषाय),
कषायकषाय (कसैले पदार्थों से तय्यार किया हुआ कषाय) इन पांचो को इस
शास्त्र में 'कषाय' संज्ञा है, 'लवण' कषाय नहीं है लवण रस से कषाय तैयार
नहीं होता है ॥ ७ ॥
पञ्चविधं कषायकल्पनमिति, तद्यथा स्वरसः कल्कः शृतः शीतः
फाण्टः कषाय इति ॥ ८ ॥
कषायकल्पन अर्थात् कषाय तैयार करने की विधि पांच प्रकार से है। यथा-
स्वरस, कल्क शृत, शीत और फाण्ट। कषाय शब्द सबके साथ संयुक्त है ॥८॥

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४७

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४७
कषायों के लक्षण—
( यन्त्रप्रपीडनाद् द्रव्याद्रसः स्वरस उच्यते ।
यत्पिण्डं रसपिष्टानां तत्कल्कं परिकीर्तितम् ॥ ९ ॥
वह्नौ तु कथितं द्रव्यं शृतमाहुश्चिकित्सकाः ।
द्रव्यादपोथितात्तोये प्रतप्ते निशि संस्थितात् ॥ १० ॥
कषायो योऽभिनिर्याति स शीतः समुदाहृतः ।
क्षिप्तोष्णतोये मृदितं तत्फाण्टं परिकीर्तितम् ॥ ११ ॥ )
तेषां यथापूर्वं बलाधिक्यम् , अतः कषायकल्पना व्याध्यातुर्बला-
पेक्षिणी । नत्वेवं खलु सर्वाणि सर्वत्रोपयोगीनि भवन्ति ॥ १२ ॥
स्वरस कषाय —द्रव्य को कूट कर यंत्र प्रपीड़न अर्थात् यंत्र से वा
हाथ आदि से दबा कर जो रस निकलता है उसे 'स्वरस' कहते हैं
कल्क कषाय—रस सहित द्रव्य को शिला आदि पर पीस कर जो गोला बना
लिया जाता है उसे 'कल्क' कहते हैं । शृत कषाय अग्नि में उबाले हुए
द्रव्य को वैद्य 'शृत' कहते हैं । बहुत गरम जल में रात भर रक्खे हुए कूटे हुए
द्रव्य से जो कषाय निकलता है उसे 'शीत' कहा जाता है। फाण्ट कषाय—द्रव्य
को कूटकर गरम पानी में रखकर कुछ काल पीछे मलकर जो किट्ट रहित सार-
भाग निकलता है, उसे 'फाण्ट' कहते हैं ।
इन में स्वरस में कल्क की अपेक्षा, कल्क में शृत की अपेक्षा से, शृत में
शीत की अपेक्षा से, और शीत में फाण्ट की अपेक्षा से अधिक बल, सामर्थ्य
और शक्ति है । इसलिये 'कषाय कल्पना' अर्थात् रोगी के लिये कषाय का
विचार व्याधिबल, आतुरबल अर्थात् रोगी के सामर्थ्य को देखकर करना चाहिये।
ये सब कषाय सब अवस्थाओं में उपयोगी नहीं होते अर्थात् बलवान् व्याधि
या बलवान् रोगी में अल्प बल वाले या मध्यम बल वाले कषाय कार्य करने में
समर्थ नहीं होते । इसी प्रकार अल्प बल की अवस्था में अधिक बल वाले कषाय
कार्य करने में असमर्थ होते हैं । ॥ ९–१२ ॥
पञ्चाशन्महाकषाया इति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा—
पहिले जो यह कहा है कि पचास महाकषाय हैं, उनकी अब व्याख्या
करते हैं । जैसे—
जीवनीयो बृंहणीयो लेखनीयो भेदनीयः संधानीयो दीपनीय इति
षट्कः कषायवर्गः ।
( जीवनीय ) जीवन के लिये हितकारी आयुवर्धक, (बृंहणीय) शरीर के

दीपनीय अग्नि को बढ़ाने वाला यह छः कषायों का एक वर्ग हुआ ।

४८ चरकसंहिता [ अ० ४
बृंहण के लिये हितकारी, ( लेखनीय ) देह के घर्षण के लिये, भेदनीय, संधानीय,
दीपनीय अग्नि को बढ़ाने वाला यह छः कषायों का एक वर्ग हुआ ।
बल्यो वर्ण्यः कण्ठ्यो हृद्य इति चतुष्कः कषायवर्गः, ।
'बल्य' ( बल कारक ), वर्ण्य ( शरीर की कान्ति बढ़ाने वाला ) 'कण्ठ्य'
( कण्ठ या गले के स्वर के लिये हितकारी ) 'हृद्य' ( हृदय—मन के लिये
हितकारी ), यह दूसरा चार से बना हुआ कषाय वर्ग है ।
तृप्तिघ्नोऽर्शोघ्नः कुष्ठघ्नः कण्डूघ्नः कृमिघ्नो विषघ्न इति षट्कः
कषायवर्गः, ।
'तृप्तिघ्न' ( जब रोगी बिना खाये अपने को भरा पेट अनुभव करता है,
उसके शिकायत को दूर करने वाला) 'अर्शोघ्न' (अर्श रोग में हितकारी), 'कुष्ठघ्न'
(कुष्ठ रोगनाशक), 'कण्डूघ्न' (खाज नाशक ), 'कृमिघ्न' विषघ्न (क्रिमि तथा विष
विनाशक ) यह तीसरा छः से बना कषाय वर्ग हुआ ।
स्तन्यजननः स्तन्यशोधनः शुक्रजननः शुक्रशोधन इति चतुष्कः
कषायवर्गः ।
स्तन्य जनन ( दूध बढ़ाने वाला ), ( स्तन्यशोधन दूध का शोधन करने-
वाला ), शुक्र जनन ( धातुवर्धक ), शुक्रशोधन ( धातु शोधक ), यह चौथा
चार से बना कषाय वर्ग हुआ ।
स्नेहोपगः स्वेदोपगो वमनोपगो विरेचनोपग आस्थापनोपगोऽनु-
वासनोपगः शिरोविरेचनोपग इति सप्तकः कषायवर्गः ।
स्नेहोपग १ ( मार्दव कर ), स्वेदोपग ( पसीना लाने वाला ), वमनोपग
( वान्तिकारक ), विरेचनोपग ( मलनिःसारक ), आस्थापनोपग ( रूक्ष बस्ति
के लिये उपयोगी ), अनुवासनोपग ( स्नेह-बस्ति के लिये उपयोगी ), शिरो-
विरेचनोपग ( नस्य के लिये उपयोगी ), यह सात कषायों से बना वर्ग ।
छर्दिनिग्रहणस्तृष्णानिग्रहणो हिक्कानिग्रहण इति त्रिकः कषायवर्गः।
छर्दि-निग्रहण ( वमननाशक ), तृष्णानिग्रहण (प्यास को नष्ट करने वाला),
हिक्कानिग्रहण ( हिचकी नाशक ), यह तीन से बना कषाय वर्ग हुआ।
पुरीषसंग्रहणीयः पुरीषविरजनीयो मूत्रसंग्रहणीयो मूत्रविरजनीयो
मूत्रविरेचनीय इति पञ्चकः कषायवर्गः ।
पुरीषसंग्रहणीय (मल को बांधने के लिये हितकारी), पुरीषविरजनीय
(दोष के कारण जब मल में उचित रंग नहीं आता इसके लिये हितकारी जैसे—
१'उपग'-का अर्थ सहायक जैसे-वमनोपग वमन कार्य में मदद देने वाला ।

अ० ४ ] ४ सूत्रस्थानम् ४६

अ० ४ ] ४ सूत्रस्थानम् ४६
कामला रंग में मल श्वेत रंग का आता है, पीलापन नहीं आता ), 'मूत्र-संग्रह-
णीय' ( मूत्र को कम करने वाला ), 'मूत्रविरजनीय' ( मूत्र के रंग को ठीक
करने वाला ), मूत्रविरेचनीय ( मूत्रवर्धक ), यह पांच से बना कषाय वर्ग है॥
कासहरः श्वासहरः शोथहरो ज्वरहरः श्रमहर इति पञ्चकः
कषायवर्गः ।
कासहर ( खांसी के लिये हितकारी ), श्वासहर ( दमे के लिये हितकारी ),
शोथहर ( सूजन के लिये हितकारी ), ज्वरहर ( ज्वरनाशक ), श्रमहर ( थका-
वट को मिटाने वाला ), यह पांच से बना कषाय वर्ग है ॥
दाहप्रशमनः शीतप्रशमन उददर्दप्रशमनोऽङ्गमर्दप्रशमनः शूलप्रशमन
इति पञ्चकः कषायवर्गः ।
'दाहप्रशमन' ( जलन को शान्त करने वाला ), 'शीतप्रशमन' ( ठंडक
को दूर करनेवाला ), 'उदर्द प्रशमन' ( कोठ, छपाकी, त्वचा पर उठने वाले
मोटे २ चकत्तों को शान्त करने वाला ), 'अंगमर्द प्रशमन' ( अंगों को ऐंठन
को दूर करने वाला ), यह पाँच से बना कषाय वर्ग है ॥
शोणितस्थापनो वेदनास्थापनः संज्ञास्थापनः प्रजास्थापनो वयः-
स्थापन इति पञ्चकः कषायवर्गः ।
'शोणित-स्थापन' ( रक्त रोधक ), 'वेदनास्थापन'* ( पीड़ा नाशक ),
'संज्ञास्थापन' ( चेतन करने वाला ), 'प्रजास्थापन' ( संतानजनक ), वयः-
स्थापन' ( आयु को टिकाने वाला ), यह पांच से बना कषायवर्ग है ।
इति पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं
व्याख्याता भवन्ति । तेषामेककस्मिन्महाकषाये दशदशावयविकान्कषा-
याननुव्याख्यास्यामः । तान्येव पञ्च कषायशतानि भवन्ति ॥ १३ ॥
इस प्रकार से पचास महाकषाय बनते हैं । महाकषाय के लक्षण और
उदाहरण संक्षेप में कह दिये गये हैं । इन एक-एक महाकषायों में दस-दस अव-
यवों वाले कषायों की व्याख्या आगे कहेंगे । इस प्रकार से पांच सौ कषाय बनते
हैं । अर्थात् 'जीवनीय' आदि संज्ञा वाले पचास महाकषायों में से प्रत्येक 'जीव-
नीय' आदि संज्ञा वाले कषाय में दस-दस अवयव हैं ॥ १३ ॥
तद्यथा - जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा काकोली क्षीरकाकोली
मुद्गमाषपर्ण्यौ जीवन्ती मधुकमिति दशेमानि जीवनीयानि भवन्ति (१)
*वेदना-स्थापन—शरीर की वेदना को मिटाकर शरीर को स्वस्थ रूप में
करने वाला ।

५० चरकसंहिता [ अ० ४
जैसे—जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी
( मूंगपर्णी ) माषपर्णी, जीवन्ती, और मधुक ( मुलैहटी ) ये दस जीवनीय
( जीवनवर्धक ) हैं ॥
क्षीरिणी राजक्षवकं बला काकोली क्षीरकाकोली वाट्यायनी
भद्रौदनी भारद्वाजी पयस्यर्ष्यगन्धा इति दशेमानि बृंहणीयानि
भवन्ति ॥ ( २ ) ॥
क्षीरिणी ( क्षीरविदारी ), राजक्षवक ( दूधी ), बला ( खरैंटी ), काकोली,
क्षीरकाकोली, वाट्यायनी ( कंघी ), भद्रौदनी ( खिरैंटी ), भारद्वाजी ( उलट-
कम्बल ), पयस्या ( विदारी कन्द ), ऋष्यगन्धा ( वृद्धदारक बिधारा ), ये
दस बृंहणीय अर्थात् शरीर में ( वीर्य ) वृद्धि करने वाले हैं ॥
मुस्त-कुष्ठ-हरिद्रा-दारुहरिद्रा-वचातिविषा-कटुरोहिणी-चित्रक-चिर-
बिल्व-हैमवत्य इति दशेमानि लेखनीयानि भवन्ति ॥ ( ३ ) ॥
मुस्त ( नागर मोथा ), कुष्ठ ( कूट ), हरिद्रा ( हल्दी ), वच ( घंड़ा-
वच ), अतिविषा ( अतीस ), कटुरोहिणी ( कुटकी ), चित्रक ( चीता मूल ),
चिरबिल्व ( करंज ), हैमवती ( श्वेत वच ), ये दस लेखनीय हैं ॥
सुवहाऽर्कोरूबूकाग्निसुखी-चित्रा-चित्रक-चिरबिल्व-शंखिनी-शकुलाद-
नी-स्वर्णक्षीरिण्य इति दशेमानि भेदनीयानि भवन्ति ॥(४)॥
सुवहा (निशोथ), अर्क (आक दो प्रकार का है श्वेत और अरुण), उरुबूक
( एरण्ड ), अग्निसुखी ( कलिदारि ), चित्रा ( जमाल गोटे की जड़ ), चित्रक
( चीता मूल ), चिरबिल्व ( करंज ), शंखिनी, शकुलादनी ( कटुकी ), और
स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ), ये दस भेदनीय हैं ॥
मधुक-मधुपर्णी-पृश्निपर्ण्याम्बष्ठा-समङ्गा-मोचरस-धातकी-लोध्र-
प्रियङ्गु-कट्फलानीति दशेमानि संधानीयानि भवन्ति ॥ ( ५ ) ॥
मधुक ( मुलैहटी ), मधुपर्णी ( गिलोय ), पृश्निपर्णी ( पिठवन ), अम्बष्ठकी
( पाठा ), समंगा ( मजीठ ), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), धातकी ( धाय के
फूल ), लोध्र ( पठानी लोध ), प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), और कट्फल ( काय-
फल ), ये दस ‘संधानीय’ हैं ॥
पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेराम्लवेतस-मरिचाजमो-
दा-भल्लातकास्थि-हिङ्गुनिर्यासा इति दशेमानि दीपनीयानि भवन्ति (६)
इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ १ ] ॥
पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य ( चविका ), चीतामूल, शृंगबेर ( सोंठ या

कषायवर्ग है ।

अदरक ), अम्लवेतस, मरिच ( काली मिरच ), अजमोदा ( अजवायन ),
भल्लातकास्थि ( भिलावे के बीज ), हिंगु-निर्यास ( हींग ), ये दस ‘दीपनीय’
अर्थात् भूख लगाने वाले अग्नि संदीपक हैं ॥ यह छः का बना हुआ
कषायवर्ग है ।
ऐन्द्रयृषभ्यतिरसर्ष्यप्रोक्ता-पयस्याश्वगन्धा-स्थिरा-रोहिणी-बलाति-
बला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ॥ (७)॥
ऐन्द्री, ऋषभी ( कौंच ), अतिरसा ( शतावरी ), ऋष्यप्रोक्ता ( माषपर्णी ),
पयस्या ( विदारी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), स्थिरा ( शालपर्णी ), रोहिणी
(कटुकी), बला ( खरैंटी ), अतिबला ( पीतबला ), ये दस 'बल्य' अर्थात् बल
कारक हैं ॥
चन्दन-तुङ्ग-पद्मकोशीर-मधुक-मञ्जिष्ठा-सारिवा-पयस्या-सिता-
लता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ॥ (८) ॥
चन्दन ( लाल चन्दन ), तुंग ( लाल नाग केशर ), पद्मक ( पद्माख ),
उशीर ( खस ), मधुक ( मुलहठी ), मञ्जिष्ठा ( मजीठ ), सारिवा (अनन्तमूल),
पयस्या (विदारी कन्द), सिता (सफेद दूब), और लता १ (लाल दूब या प्रियंगु),
ये दस ‘वर्ण्य’ अर्थात् वर्णकारक, वर्ण बढ़ाने वाले हैं ॥
सारिवेक्षुमूल-मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपदी-बृहती-
कण्टकारिका इति दशेमानि कण्ठ्यानि भवन्ति ॥ ( ९ ) ॥
सारिवा ( अनन्तमूल ), इक्षुमूल ( ईख की जड़ ), मधुक ( मुलहठी ),
पिप्पली, द्राक्षा ( किशमश ), विदारी कन्द, कैडर्य ( नीम ), हंसपदी ( मण्डू-
कर्णी या ब्राह्मी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), ये
दस औषधियां 'कण्ठ्य' स्वर के लिये हितकारी हैं ॥
आम्राम्रातक-निकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल-बदर-दाडिम-
मातुलुङ्गानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ॥ (१०) ॥
इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [२] ॥
आम्र ( आम ), आम्रातक ( अम्बाड़ा ), निकुच ( बडु बड़इल ), करमर्द
( करञ्ज ), वृक्षाम्ल ( इमली ); अम्लवेतस, कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( झाड़ी
का बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), ये दस ‘हृद्य’ अर्थात्
हृदय के लिये हितकारी हैं ॥ यह चार से बना हुआ कषायवर्ग है ।
१. जल्पकल्पतरु में 'लता' का अर्थ मंजीठ किया है, परन्तु मंजीठ का
कथन भी इसमें है, अतः दूब अर्थ ही उचित है ।

५२ चरकसंहिता [ अ० ४

नागर-चित्रक-चव्य-विडङ्ग-मूर्वा-गुडूची-वचा-मुस्त-पिप्पली-पटोला-
नीति दशेमानि तृप्तिघ्नानि भवन्ति ॥ ( ११ ) ॥
नागर (सोंठ), चित्रक (चीतामूल), चव्य (चविका), विडंग
(वायविडंग), मूर्वा (मोरवेल), गुडूची (गिलोय), वचा (वच), मुस्त
(नागर मोथा), पिप्पली, पटोल (परवल) ये दस 'तृप्तिघ्न' अर्थात् श्लेष्मा
जनित तृप्ति को नाश करने वाली हैं ॥
कुटज-बिल्व-चित्रक-नागरातिविषाभया-धन्वयासक-दारुहरिद्रा-वचा-
चव्यानीति दशेमान्यर्शोघ्नानि भवन्ति ॥ ( १२ ) ॥
कुटज (कुड़ा), बिल्व (बेलगिरी), चित्रक (चीतामूल), नागर (सोंठ),
अतिविषा (अतीस), अभया (बड़ी हरड़), धन्वयासक (धमासा), दारु-
हरिद्रा (दारुहल्दी), वच और चव्य (चविका) ये दस औषधियां 'अर्शोघ्न'
अर्थात् बवासीर रोग के नाशक हैं ॥
खदिराभयामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णारग्वध-करवीर-विडङ्ग-जा-
तिप्रवाला इति दशेमानि कुष्ठघ्नानि भवन्ति ॥ ( १३ ) ॥
खदिर (खैर), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), हरिद्रा-
(हल्दी), अरुष्कर (भिलावा), सप्तपर्ण (सातवन), आरग्वध (अमलतास),
करवीर (कनेर), विडंग (वायविडंग), और जातिप्रवाल (चमेली के
नवीन कोमल पत्ते) ये दस कुष्ठघ्न अर्थात् कोढ़ रोग के नाशक हैं ॥
चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-कुटज-सर्षप-मधुक-दारुहरि-
द्रा-मुस्तानीति दशेमानि कण्डूघ्नानि भवन्ति ॥ ( १४ ) ॥
चन्दन (लाल चन्दन), नलद (जटामांसी), कृतमाल (अमलतास) नक्त-
माल (करंज), निम्ब (नीम के पत्ते), कुटज (कूड़े की छाल), सर्षप (सरसों),
मधुक (मुलैहटी), दारु हरिद्रा (दारु हल्दी), और मुस्त (नागर मोथा),
ये दस औषधियां 'कण्डूघ्न' अर्थात् खाज नाशक हैं ॥
अक्षीव-मरिच-गण्डीर-केबुक-विडङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही-श्वदंष्ट्रा-वृष-
पर्णिकाखुपर्णिका इति दशेमानि क्रिमिघ्नानि भवन्ति ॥ ( १५ ) ॥
अक्षीव (सहजन), काली मरिच, गण्डीर (जिमीकन्द), केबुक, विडंग
(वायविडंग), निर्गुण्डी (सम्भालु), किणिही (अपामार्ग), श्वदंष्ट्रा (गोखरू),
वृषपर्णी, आखुपर्णिका (मूसाकानी), ये दस कृमिघ्न अर्थात् कृमिनाशक हैं ॥

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३

अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३
हरिद्रा-मञ्जिष्ठा-सुवहा-सूक्ष्मैला-पालिन्दी-चन्दन-कतक-शिरीष-
सिन्धुवार-श्लेष्मातका इति दशेमानि विषघ्नानि भवन्ति ॥ ( १६ ) ॥
इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ ३ ] ॥
हरिद्रा ( हल्दी ), मञ्जिष्ठा ( मंजोट ) सुवहा (निशोथ), सूक्ष्मैला ( छोटी
इलायची ), पालिन्दी (काली निशोथ), चन्दन (लाल चन्दन), कतक ( निर्मली
का जल को शोधन करने वाला फल ), शिरीष ( सिरस ), सिन्धुवार
(सम्भालु, निर्गुण्डी ), श्लेष्मातक ( लिसाड़ा ), ये दस 'विषघ्न' अर्थात्
विषनाशक हैं ॥ यह छः से बना हुआ कषायवर्ग है ।
वीरण-शालि-षष्टिकेशुवालिका-दर्भ-कुश-काश-गुन्द्रेत्कट-कत्तृण-मूला-
नीति दशेमानि स्तन्यजननानि भवन्ति ॥ ( १७ ) ॥
वीरण ( खस ), शालि ( हेमन्त ऋतु में पकने वाले धान्य का चावल ),
षष्टिक (साटी चावल), ईक्षुवालिका ( ईख ), दर्भ ( दाभ ), कुश ( कुशा ),
काश ( सरकण्डा ), गुन्द्रा ( होंगला ) इत्कट, ( तृण विशेष ) कत्तृण ( रोहिष
तृण ) ये दस 'स्तन्य-जनन' अर्थात् दूध बढ़ाने वाले हैं। इन में गिलोय को
छोड़कर सब के मूल काम में लाने चाहिये ॥
पाठा-महौषध-सुरदारु-मुस्त-मूर्वा-गुडूची-वत्सक-फल-किराततिक्त-
क-कटुरोहिणी-सारिवा इति दशेमानि स्तन्यशोधनानि भवन्ति ॥(१८)॥
पाठा ( पाढ़ल ), महौषध ( सोंठ ), सुरदारु ( देवदारु ), मुस्त ( नागर-
मोथा ), मूर्वा ( मोर बेल ), गुडूची ( गिलोय ), वत्सक फल ( इन्द्र जौ ),
किराततिक्तक ( चिरायता ), कटुरोहिणी ( कटुकी ), सारिवा ( अनन्त मूल )
ये दस 'स्तन्यशोधन' दूध को शुद्ध करने वाले हैं ॥
जीवकर्षभक-काकोली-क्षीरकाकोली-मुद्गपर्णी-माषपर्णी-मेदा-वृद्ध-
रुहा-जटिला-कुलिङ्गा इति दशेमानि शुक्रजननानि भवन्ति ॥( १९ )॥
जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीर काकोली, मुद्गपर्णी ( मूंगपर्णी ) माष-
पर्णी ( उड़दपर्णी ); मेदा, वृद्धरुहा ( शतावरी ), जटिला ( जटामांसी ), कुलिंग
( उतंगण ) ये दस 'शुक्रजनन' अर्थात् वीर्य-धातु के वर्धक होते हैं १ ॥
१. ( क ) जीवक ऋषभक, मेदा महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि
वृद्धि इन के स्थान पर परिभाषा आदेश से, शतावरी, विदारीकन्द
अश्वगन्धा और वाराही कन्द प्रयोग करने चाहियें । ( ख ) कुलिंगशब्द धन्व-
न्तरि निघण्टु में, 'विष्किर'पक्षियो के लिये और समार्थकों में दूर्वा के लिये आया है ।

इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [ ४ ] ॥

५४ चरकसंहिता [ अ० ४
कुष्ठैलवालुक-कट्फल-समुद्रफेन-कदम्ब-निर्यासेक्षु-काण्डेक्ष्विक्षुरक-
वसुकोशीराणीति दशेमानि शुक्रशोधनानि भवन्ति ॥ ( २० ) ॥
इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [ ४ ] ॥
कुष्ठ ( कूठ ), एलवालुक, कट्फल ( कायफल ), समुद्रफेन, कदम्ब निर्यास,
इक्षु ( गन्ना ), काण्डेक्षु ( मोटा गन्ना ), इक्षुरक ( तालमखाना ); बसुक ( बक-
पुष्प ), और उशीर ( खस की जड़ ) ये दस ‘शुक्रशोधन’ अर्थात् वीर्य-धातु
को शुद्ध करने वाले हैं॥ यह चार का बना हुआ कषाय वर्ग है ।
मृद्वीका-मधुक-मधुपर्णी-मेदा-विदारी-काकोली-क्षीरकाकोली-जीवक-
जीवन्ती-शालपर्ण्य इति दशेमानि स्नेहोपगानि भवन्ति ॥ ( २१ ) ॥
मृद्वीका ( बड़ी दाख ), मधुक ( मुलहटी ), मधुपर्णी ( गिलोय ), मेदा,
विदारी ( विदारी कन्द ), काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, जीवन्ती, शालपर्णी ये
दस 'स्नेहोपग' अर्थात् शरीर में कोमलता और चिकनाई उत्पन्न करनेमें सहायक हैं॥
शोभाञ्जनकैरण्डार्क-वृश्चीर-पुनर्नवा-यव-तिल-कुलत्थ-माष-बदरा-
णीति दशेमानि स्वेदोपगानि भवन्ति ॥ ( २२ ) ॥
शोभांजन ( सहजन ), एरण्ड, अर्क ( आक ), वृश्चीर ( श्वेत पुनर्नवा ),
पुनर्नवा ( रक्त पुनर्नवा ), यव ( जौ ), तिल, कुलत्थ ( कुलथी ), माष
( उड़द ), बदर ( झाड़ी के बेर ) ये दस ओषधियां 'स्वेदोपग' अर्थात् शरीर
में पसीना लाने में सहायक हैं॥
मधु-मधुक-कोविदार-कर्बुदार-नीप-विदुल - बिम्बी-शणपुष्पी-सदा-
पुष्पी-प्रत्यक्पुष्प्य इति दशेमानि वमनोपगानि भवन्ति ॥ (२३) ॥
मधु ( शहद ), मधुक ( मुलहटी ), कोविदार ( लाल कचनार ), कर्बुदार
( श्वेत कचनार ), नीप ( कदम्ब ); बिदुल ( जल वेतस ), बिम्बी ( कन्दरी),
शणपुष्पी ( झनझनिया ), सदापुष्पी ( आक ), प्रत्यक्पुष्पी ( अपामार्ग, चिर-
चटा ) ये दस ‘वमनोपग’ अर्थात् वमन में मदद देती हैं॥
द्राक्षा-काश्मर्य-परूषकभयामलक-बिभीतक-कुवल-बदर-कर्कन्धू-पी-
लूनीति दशेमानि विरेचनोपगानि भवन्ति ॥ ( २४ ) ॥
द्राक्षा ( किशमिश ), काश्मर्य ( गम्भारी ), परूषक ( फालसा ), अभया
( जंगी हरड़ ), आमलक ( आंवला ), बिभीतक ( बहेड़ा ), कुवल (बड़ा बेर),
बदर ( वृक्ष का बेर ), कर्कन्धू ( झाड़ी का बेर ), पीलू ये दस 'विरेचनोपग'
अर्थात् विरेचन में सहायक हैं॥