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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 639 में से

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पृष्ठ 56

३८ चरकसंहिता [ अ० ३
आरग्वधः सैडगजः करञ्जो वासा गुडूची मदनं हरिद्रे ।
श्याह्वः सुराह्वः खदिरो धवश्च निम्बो विडङ्गं करवीरकत्वक् ॥३॥
ग्रन्थिश्च भौर्जो लशुनः शिरीषः सलोमशो गुग्गुलुकृष्णगन्धे ।
फणिज्जको वत्सकसप्तपर्णौ पीलूनि कुष्ठं सुमनःप्रवालाः ॥४॥
वचा हरेणुस्त्रिवृता निकुम्भो भल्लातकं गैरिकमञ्जनञ्च ।
मनःशिलाले गृहधूम एला काशीसलोध्रार्जुनमुस्तसर्जाः ॥ ५ ॥
इत्यर्धरूपैर्विहिताः षडेते गोपित्तपीताः पुनरेव पिष्टाः ।
सिद्धाः परं सर्षपतैलयुक्ताश्चूर्णप्रदेहा भिषजा प्रयोज्याः ॥ ६ ॥
कुष्ठानि कृच्छ्राणि नवं किलासं सुरेन्द्रलुप्तं किटिभं सदद्रु ।
भगन्दराशांस्यपचीं सपामां हन्युः प्रयुक्तास्त्वचिरान्नराणाम् ॥ ७ ॥
'आरग्वध' से लेकर 'सर्ज' इस शब्द तक तीन श्लोकों में कहे हुए छः
योग हैं, इनको गाय के पित्त में पीस कर काम में लाना चाहिये । यथा—
(१) आरग्वध (अमलतास), ऐडगज (पनवाड़), करञ्ज ( नाटा करंज ), वासा
(वासे के पत्ते), गुडूची (गिलोय), मदन ( मैनफल ), दो हरिद्रा ( हल्दी और
दारु हल्दी ) । ( २ ) श्याह्व ( गन्दा विरांजा ), सुरा ( देवदार ), खदिर
( खैर ), और धव ( धावन ), निम्ब ( नीम के पत्ते ), विडंग ( बायविडंग ),
करवीरत्वक् ( कनेर की छाल ) यह दूसरा । ( ३ ) भोजपत्र की गाठें, लशुन
( लहसन ), शिरीष (सिरस की छाल), लोमशा ( जटामांसी ), गूगल, कृष्ण-
गन्धा ( सहजना ) यह तीसरा । ( ४ ) फणिज्जक ( मरवा ) वत्सक (इन्द्र जौ)
सप्तपर्ण ( सातवन ), पीलू कुष्ठ ( कूठ ), सुमनःप्रवाल (चमेली के कोमल पत्ते)
यह चौथा । ( ५ ) वचा ( वच ), हरेणु ( रेणुका बीज, मँहदी के बीज ),
त्रिवृत् ( निशोथ ), निकुम्भ ( जमाल गोटा ), भल्लातक ( भिलावा ), गैरिक
( गेरू), अंजन (•रसाञ्जन), यह पांचवां, ( ६ ) मनःशिला ( मैनसिल ), आल
( हरिताल ), गृहधूम ( घरका धुंआसा ), एला ( छोटी इलायची ), काशीस
( पुष्प कासीस ), लोध्र ( पठानी लोध ), अर्जुन ( अर्जुन वृक्ष की छाल ),मुस्ता
(नागरमोथा), सर्ज ( राल ) यह छठा योग हुआ ।
इनमें से किसी योग को चूर्ण के रूप में तैयार करके गाय के पित्त के साथ
फिर पीसे । फिर इसको सरसों के तेल में मिला कर द्रव रूप बनाकर लगाने से
कष्टसाध्य कुष्ठरोग, नया किलास इन्द्रलुप्त बालों का गिरना किटिभ ( कुष्ठ भेद )
दद्रु ( दाद ), भगन्दर बवासीर, चर्मकील, अपची ( न पकने वाली गाठें )
और पामा ( खाज ) शीघ्र ही मनुष्यों के नष्ट होते हैं ॥ ३-७ ॥