चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] सूत्रस्थानम् ३५
( १४ ) कुश ( दाभ ) की जड़ और आमलक ( आंवले का फल )
इनको एक २ कर्ष लेकर छः गुने जल में कषाय करे इसमें श्यामाक तण्डुल
पाक कर के सिद्ध करनी चाहिये । यह पान करने योग्य यवागू शरीर में रूक्षता
उत्पन्न करती है ॥ २६ ॥
दशमूलोभृता कास-हिक्का-श्वास-कफापहा ।
यमके मदिरासिद्धा पक्वाशयरुजापहा ॥ २७ ॥
( १५ ) दशमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बृहती, गोखरू, बिल्व,
श्योनाक, अरणी, गम्भारी, पाठा ) से सिद्ध की हुई यवागू कास, हिक्का, श्वास
और कफ को नष्ट करती है ।
( १६ ) यमक अर्थात् समान भाग घी और तैल लेकर इन में भूनी हुई
एवं पानी के स्थान पर मदिरा लेकर उनमें सिद्ध की हुई यवागू ( मदिरा
मिलाकर देने से ) पक्वाशय की पीड़ा को मिटाती है १ ॥ २७ ॥
शाकैर्मासैस्तिलैर्माषैः सिद्धा वर्चो निरस्यति ।
जम्बवाम्रास्थि-दधित्थाम्ल-बिल्वैः सांग्राहिकी मता ॥ २८ ॥
( १७ ) 'शाक' ( हरी सब्जियाँ ) मांस, तिल, माष ( उड़द ) इन के
कल्क और कषाय से सिद्ध की हुई यवागू मल को बाहर निकालती है ।
( १८ ) जम्बु-अस्थि ( जामुन की गुठली ) आम्रास्थि ( आम की गुठली
की गिरी ) दधित्थाम्ल ( कैथ कच्चा, खट्टी अवस्था में ), बिल्व ( बेलगिरी
कच्चे हरे ), इनसे सिद्ध की हुई यवागू 'स्तम्भक' है ॥ २८ ॥
क्षार-चित्रक-हिङ्ग्वम्ल-वेतसैर्भेदिनी मता ।
अभया-पिप्पलीमूल-विश्वैर्वातानुलोमनी ॥ २६ ॥
( १६ ) क्षार ( जवाखार २ ), चित्रक ( चीतामूल ), हींग, अम्लवेतस
(अमलवेत), इन से सिद्ध की हुई यवागू मल को भेदन करके बाहर निकालती है ।
( २० ) अभया ( जंगी हरड़ ), पीपल मूल और विश्व ( सोंठ ) इन से
१ 'यमक' एक भाग घी और एक भाग तैल परस्पर समान और एक
भाग मदिरा लेनी चाहिये । अथवा मूंग की दाल और सांठी के चावल परस्पर
समान भाग मिलाकर मदिरा में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । ( जल्प कल्प-तरु )
२. जवाखार बनाने के लिये हरे जवों को आग में स्वच्छ स्थान में जला
लेना चाहिये । फिर इस को पानी में घोलकर वस्त्र में से छान लेना चाहिये ।
छाने हुए पदार्थ को आग पर गरम करके शुष्क कर लेना चाहिये ।