चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 69, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअदरक ), अम्लवेतस, मरिच ( काली मिरच ), अजमोदा ( अजवायन ),
भल्लातकास्थि ( भिलावे के बीज ), हिंगु-निर्यास ( हींग ), ये दस ‘दीपनीय’
अर्थात् भूख लगाने वाले अग्नि संदीपक हैं ॥ यह छः का बना हुआ
कषायवर्ग है ।
ऐन्द्रयृषभ्यतिरसर्ष्यप्रोक्ता-पयस्याश्वगन्धा-स्थिरा-रोहिणी-बलाति-
बला इति दशेमानि बल्यानि भवन्ति ॥ (७)॥
ऐन्द्री, ऋषभी ( कौंच ), अतिरसा ( शतावरी ), ऋष्यप्रोक्ता ( माषपर्णी ),
पयस्या ( विदारी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), स्थिरा ( शालपर्णी ), रोहिणी
(कटुकी), बला ( खरैंटी ), अतिबला ( पीतबला ), ये दस 'बल्य' अर्थात् बल
कारक हैं ॥
चन्दन-तुङ्ग-पद्मकोशीर-मधुक-मञ्जिष्ठा-सारिवा-पयस्या-सिता-
लता इति दशेमानि वर्ण्यानि भवन्ति ॥ (८) ॥
चन्दन ( लाल चन्दन ), तुंग ( लाल नाग केशर ), पद्मक ( पद्माख ),
उशीर ( खस ), मधुक ( मुलहठी ), मञ्जिष्ठा ( मजीठ ), सारिवा (अनन्तमूल),
पयस्या (विदारी कन्द), सिता (सफेद दूब), और लता १ (लाल दूब या प्रियंगु),
ये दस ‘वर्ण्य’ अर्थात् वर्णकारक, वर्ण बढ़ाने वाले हैं ॥
सारिवेक्षुमूल-मधुक-पिप्पली-द्राक्षा-विदारी-कैडर्य-हंसपदी-बृहती-
कण्टकारिका इति दशेमानि कण्ठ्यानि भवन्ति ॥ ( ९ ) ॥
सारिवा ( अनन्तमूल ), इक्षुमूल ( ईख की जड़ ), मधुक ( मुलहठी ),
पिप्पली, द्राक्षा ( किशमश ), विदारी कन्द, कैडर्य ( नीम ), हंसपदी ( मण्डू-
कर्णी या ब्राह्मी ), बृहती ( बड़ी कटेरी ), कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ), ये
दस औषधियां 'कण्ठ्य' स्वर के लिये हितकारी हैं ॥
आम्राम्रातक-निकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल-बदर-दाडिम-
मातुलुङ्गानीति दशेमानि हृद्यानि भवन्ति ॥ (१०) ॥
इति चतुष्कः कषायवर्गः ॥ [२] ॥
आम्र ( आम ), आम्रातक ( अम्बाड़ा ), निकुच ( बडु बड़इल ), करमर्द
( करञ्ज ), वृक्षाम्ल ( इमली ); अम्लवेतस, कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( झाड़ी
का बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), ये दस ‘हृद्य’ अर्थात्
हृदय के लिये हितकारी हैं ॥ यह चार से बना हुआ कषायवर्ग है ।
१. जल्पकल्पतरु में 'लता' का अर्थ मंजीठ किया है, परन्तु मंजीठ का
कथन भी इसमें है, अतः दूब अर्थ ही उचित है ।