चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
३४८ चरकसंहिता [ अ० २७
मुखप्रियः सुखमदः सुगन्धिर्बस्तिरोगनुत् ।
जरणीयः परिणतो हृद्यो वर्ण्यश्च शार्करः ॥ १८१ ॥
रोचनो दीपनो हृद्यः शोषशोफार्शसां हितः ।
स्नेह-श्लेष्म-विकारघ्नो वर्ण्यः पक्वरसो मतः ॥ १८२ ॥
जरणीयो विबन्धघ्नः स्वरवर्णविशोधनः ।
कर्शनः शीतरसिको हितः शोफोदरार्शसाम् ॥ १८३ ॥
सृष्टभिन्नशकृद्वातो गौडस्तर्पणदीपनः ।
पाण्डुरोगव्रणहितो दीपनी चाक्षिकी मता ॥ १८४ ॥
सुरासवस्तीव्रमदो वातघ्नो वदनप्रियः ।
छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मैरेयो मधुरो गुरुः ॥ १८५ ॥
धातक्याभिषुतो हृद्यो रूक्षो रोचनदीपनः ।
माध्वीकवन्न चात्युष्णो मृद्वीकेक्षुरसासवः ॥ १८६ ॥
रोचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पित्ताविरोधि च ।
विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लघ्वल्पमारुतम् ॥ १८७ ॥
सुरा समण्डा रूक्षोष्णा यवानां वातपित्तला ।
गुर्वी जीर्यति विष्टभ्य श्लेष्मला तु मधूलिका ॥१८८॥
दीपनं जरणीयं च त्पाण्डुकृमिरोगनुत् ।
ग्रहण्यार्शोहितं भेदि सौवीरकतुषोदकम् ॥ १८९ ॥
दाहज्वरापहं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् ।
विबन्धश्रमविध्वंसि दीपनं चाम्लकाञ्जिकम् ॥ १९० ॥
प्रायशोऽभिनवं मद्यं गुरु दोषसमीरणम् ।
स्रोतसां शोधनं जीर्णं दीपनं लघु रोचनम् ॥ १९१ ॥
हर्षणं प्रीणनं बल्यं भय-शोक श्रमापहम् ।
प्रागल्भ्य-वीर्य-प्रतिभा-तुष्टि-पुष्टि-बल-प्रदम् ॥ १९२ ॥
सात्त्विकैर्विधिवद्युक्त्या पीतं स्यादमृतं यथा ।
वर्गोऽयं सप्तमो मद्यमधिकृत्य प्रकीर्तितः ॥ १९३ ॥
मद्यवर्ग—स्वभाव से मद्य लघु, उष्ण है, वह रस में अम्ल नहीं, विपाक
में अम्ल है । पीने पर दांत खट्टे होजाते हैं, मुख से स्राव होता है इसलिये
अम्ल¹ है । यह बात सब मद्यों में समान है, विशेष रूप से आगे कहते हैं—
• सुरा ( अनुद्धतमण्ड ) कृश पुरुषों के लिये, मूत्र रुक जाने पर, ग्रहणी, अर्श-
१. मद्य-सर्वेषां मद्यमम्लानामुपर्य्युपरि वर्त्तते ॥सु०॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६
रोग में हितकारी, वायुनाशक तथा स्तन्य (दूध) और रक्तक्षय में उपकारी
है। मदिरा (सुरामण्ड) हिचकी, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलाबरोध, अरुचि,
वमन, अफारा, विबन्ध में हितकारी एवं वायुनाशक है। जगल (अन्न से बनी
सुरा) शूल, प्रवाहिका, अफारा, कफ-वायु और अर्शरोग में हितकारी संग्राही,
रूक्ष, उष्ण, शोफनाशक और अन्न को पचाने वाली है। अरिष्ट (औषध क्वाथ
से सम्पादित) शोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, ज्वर एवं कफजन्य रोगों को
नष्ट करता है, रोचक और अग्निवर्धक है। शर्कर (शर्करा का प्राकृतिक
आसव) खाने में प्रिय, सुखपूर्वक नशा करने वाला, सुगन्धित, बस्तिरोगनाशक
जीर्ण होकर पचने वाला. हृदय को प्रिय, वर्ण, कान्तिकारक है। पक्व रस (गन्ने
के रस को पका कर बनाने पर) रोचक, अग्निदीपक, हृद्य, शोष, शोफ, अर्श
रोग में हितकारी, स्नेह-श्लेष्मा के रोगों का नाशक और कान्तिकारक है। शीत
रस (गन्ने के अपक्व रस से बनाया) लाघवकारक, विबन्धनाशक, स्वर वर्ण
को साफ करने वाला, लेखन, शोफ, उदर, अर्श रोग में हितकारी है। गौड
(गुड़ से बना) मद्य रेचक, वायु का अनुलोमक, तृप्तिकारक और अग्निवर्धक
है। बहेड़े का मद्य पाण्डुरोग, व्रण में हितकारी और दीपक है। सुरासव
(सुरा को ही पानी के स्थान पर जहाँ व्यवहार करें) तीव्र मदकारी, वायु-
नाशक, मुख और शरीर के लिये प्रिय है। महुवे के फूलों से बना आसव छेदक
और तीक्ष्ण है, मैरेय १ मधुर और गुरु है। धाय के फूलों से बना आसव हृद्य,
रूक्ष, रोचक और दीपक है। मृद्वीका रस और गन्ने के रस को मिलाकर तैयार
किया हुआ आसव माध्वीक से बने आसव के समान गरम नहीं, रोचक, दीपक,
हृद्य, बलकर और पित्त के लिये अविरोधी है। मधु प्रधान आसव विबन्धना-
शक, कफनाशक, लघु और थोड़ी वायुकारक है। मण्ड के साथ सुरा (यव-
तण्डुलों से बनी) रूक्ष, उष्ण, वात-पित्तकारक है। मधूलक (गेहूँ से बनी मद्य)
गुरु, पेट में अफारा करके जीर्ण होती है, कफकारक है। धान्य-तुष से बनी
कांजी दीपक, लघु, हृदय पांडु, कृमि, रोगनाशक, ग्रहणी, अर्शरोग में हितकारी
और रेचक है। खट्टी कांजी के पीने से दाह, ज्वर नष्ट होता है, वात-कफ-
नाशक, विबन्धनाशक, अविदांही, दीपक है। नवीन मद्य प्रायः गुरु और दोष
प्रकोपक होता है। पुराना २ मद्य स्रोतों का शोधक, दीपक, लघु, रुचिकर, हर्षों-
१. मैरेय—'आसवस्य सुरायाश्च द्वयोरेकत्र भाजने ।
सन्धानं तद् विजानीयान् मैरेयमुभयाश्रयम् ॥'
२. एक वर्ष के पीछे शराब पुरानी मानी जाती है ।
इति मद्यवर्गः।
३५० चरकसंहिता [ अ० २७
त्पादक, पुष्टिदायक, बलकारक, भय, शोक, श्रम को मिटाने वाला है। सात्त्विक
विधिपूर्वक सेवन किया हुआ मद्य अमृत के समान होता है, यह मद्य अत्यन्त
वीर्यप्रद, प्रतिभा, प्रसन्नता, पुष्टिबल को देता है। यह सातवां मद्यवर्ग समाप्त
हुआ ॥ १७६-१६३ ॥
इति मद्यवर्गः।
अथ जलवर्गः ।
जलमेकविधं सर्वं पतत्यैन्द्रं नभस्तलात् ।
तत्पतत्पतितं चैव देशकालावपेक्षते ॥ १६४ ॥
खात्पतत्सोमवाय्वर्कैः स्पृष्टं कालानुवर्तिभिः ।
शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु षड्गुणम् ।
प्रकृत्या दिव्यमुदकं, भ्रष्टं पात्रमपेक्षते । १६६ ॥
श्वेते कषायं भवति पाण्डुरे चैव तिक्तकम् ।
कपिले क्षारसंमृष्टमूषरे लवणान्वितम् ।
कटु पर्वतविस्तारे मधुरं कृष्णमृत्तिके ॥ १६७ ॥
एतत्षाड्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि ।
तथाऽव्यक्तरसं विद्यादैन्द्रं कारं हिमं च यत् ॥ १६८ ॥
यदन्तरीक्षात्पततीन्द्रसृष्टं चोक्तैश्च पात्रैः परिगृह्यतेऽम्भः
तदैन्द्रमित्येव वदन्ति धीरा नरेन्द्रपेयं सलिलं प्रधानम् ॥ १६६ ॥
श्रुतावृताबिह ख्याताः सर्व एवाम्भसो गुणाः ।
ईषत्कषायमधुरं सुसूक्ष्मं विशदं लघु ॥ २०० ॥
अरूक्षममभिष्यन्दि सर्वं पानीयमुत्तमम् ।
गुर्वभिष्यन्दि पानीयं वार्षिकं मधुरं नवम् ॥ २०१ ॥
तनु लघ्वनभिष्यन्दि प्रायः शरदि वर्षति ।
तत्त ये सुकुमाराः स्युः स्निग्धभूयिष्ठभोजनाः ॥ २०२ ॥
तेषां भोज्ये च भक्ष्ये च लेह्ये पेये च शस्यते ।
हेमन्ते सलिलं स्निग्धं वृष्यं बलहितं गुरु ॥ २०३ ॥
किंचित्ततो लघुतरं शिशिरे कफवातजित् ।
कषायमधुरं रूक्षं विद्याद्वासन्तिकं जलम् ॥ २०४ ॥
ग्रैष्मिकं त्वनभिष्यन्दि रूपमित्येष निश्चयः ।
विभ्रान्तेषु तु कालेषु यत्प्रयच्छन्ति तोयदाः ॥ २०५ ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५१
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५१
सलिलं तच्च दोषाय युज्यते नात्र संशयः ।
राजभी राजमात्रैश्च सुकुमारैश्च मानवैः ॥ २०६ ॥
संगृहीताः शरदद्यापः प्रयोक्तव्या विशेषतः ।
नद्यः पाषाण-विच्छिन्न-विक्षुब्धाभिहतोदकाः ॥ २०७ ॥
हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः ।
नद्यः पाषाण-सिकतावाहिन्यो विमलोदकाः ॥ २०८ ॥
मलयप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् ।
पश्चिमाभिमुखा याश्च पथ्यास्ता निर्मलोदकाः ॥ २०९ ॥
प्रायो मृदुवहा गुर्व्यो याश्च पूर्वसमुद्रगाः ।
पारियात्रभवा याश्च विन्ध्यसह्यभवाश्च याः ॥ २१० ॥
शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य च ।
वसुधा-कीट-सर्पाखु-मल-संदूषितोदकाः ॥ २११ ॥
वर्षाजलबहा नद्यः सर्वदोषसमीरणाः ।
वापी-कूप-तडागोत्स-सरः-प्रस्रवणादिषु ॥ २१२ ॥
आनूपशैलधन्वानां गुणदोषैर्विभावयेत् ।
पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः ॥ २१३ ॥
विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धि न हितं जलम् ।
विस्रं त्रिदोषं लवणमम्बु यद्दूरुणालयम् ॥ २१४ ॥
इत्यम्बुवर्गः प्रोक्तोऽयमष्टमः सुनिश्चितः ।
जलवर्गः समुद्दिष्टो मानवानां सुखप्रदः ॥ २१५ ॥
सम्पूर्ण पानी एक प्रकार का है । यह पानी बरसात के रूप में आकाश से
गिरता है। यह गिरता हुआ, और गिरकर, [ गुण-दोष के लिये ] देश,
समय की अपेक्षा करता है। आकाश से गिरता हुआ पानी ऋतु के अनुसार
सूर्य, चन्द्रमा और वायु (आकाश में स्थित धूलि, तथा क्षुद्र जन्तु आदि
परमाणुओं से मिलकर) तथा भूमि के ऊपर गिर कर उस ऋतु के अनुसार
भूमि की शीतलता, उष्णिमा, स्निग्धता, रूक्षता आदि के सम्बन्ध होने पर उसी
गुण वाला हो जाता है। आकाश से गिरता हुआ पानी स्वभाव से शीतल,
पवित्र, कल्याणकारी, स्वादिष्ट, स्वच्छ, हल्का-इन छः गुणों वाला है। नीचे
भूमि पर गिरकर पात्र की अपेक्षा से गुण वाला बन जाता है। श्वेत भूमि पर
गिरने से पानी कसैला, पाण्डुर जमीन में तिक्त; कपिल भूमि अर्थात् क्षारमिश्रित
(ऊसर में) नमकीन; पहाड़ की भूमि पर कटु और काली भूमि में मधुर हो
३५२ चरकसंहिता [ अ० २७
जाता है। भूमि का जल इन छः गुणों वाला होता है। बरसात का पानी, बर्फ
का पानी और कार अर्थात् ओले के पानी में कोई रस व्यक्त नहीं होता ।
आकाश से गिरते हुए पानी को नदी आदि स्थानों के अतिरिक्त, किसी शुद्ध
पात्र में एकत्र कर लिया जाय तो इसे बरसात का पानी कहते हैं। यह पानी
राजाओं के पीने योग्य है। ऋतु-ऋतु के अनुसार बरसात के पानी में गुण
होते हैं। जो पानी थोड़ा कषाय, मधुर, पतला ( सूक्ष्म ), स्वच्छ, लघु, अरूक्ष
अनभिष्यन्दि, कफ न करे, वह पानी उत्तम समझना चाहिये। बरसात का नया
पानी गुरु, अभिष्यन्दि और मधुर रस होता है। शरद् ऋतु में बरसात का
पानी बहुत स्वच्छ, लघु, अनभिष्यन्दि कफ नहीं करने वाला होता है। यह
पानी सुकुमार, एवं विशेषतः स्निग्ध एवं बहुत भोजन खाने वाले पुरुषों के
भोजन में, भक्षण ( दांत से काट कर खाने की वस्तुओं ) में, पीने और चाटने
में भी प्रशस्त है। हेमन्त ऋतु में बरसात का पानी स्निग्ध, वीर्यवर्धक, बल-
कारक, गुरु है। शिशिर ऋतु में बरसात का और हेमन्त ऋतु के पानी से कुछ
हल्का एवं कफ-वातनाशक होता है। वसन्त ऋतु में बरसात का पानी कषाय,
मधुर रस और रूक्ष होता है। ग्रीष्म ऋतु में बरसात का पानी कफनाशक और
रूक्ष होता है, विभ्रान्त अर्थात् बरसात के दिनों में बादलों से जो पानी गिरता
है वह निश्चित रूप में दोषकारक होता है। राजाओं, श्रीमन्तों, रईसों तथा
सुकुमार पुरुषो को चाहिये कि वे शरद् ऋतु में बरसात के पानी को इकट्ठा
करलें और सारे साल इसीका उपयोग करें।
हिमालय से उत्पन्न नदियों का पानी पत्थरों की टक्कर के कारण मथे जाने
से निर्दोष, पथ्यकारी, पुण्य है। इनको देवता व ऋषि सेवन करते थे, ये अति
पुण्यकारी है। मलयाचल पर्वत से उत्पन्न नदियों का पानो पत्थर, रेतीली भूमि
में बहने से स्वच्छ हो जाता है। इन का जल भी अमृत के समान है। पश्चिम
समुद्र में गिरने वाली नदियां पथ्यकारी एवं स्वच्छ पानी वाली हैं। पूर्वीय
समुद्र में गिरने वाली नदियां धीरे धीरे चलती हैं और गुरु पानी वाली हैं।
पारियात्र पर्वत से उत्पन्न होनेवाली, विन्ध्याचल एवं सह्याद्रि के पहाड़ों से
उत्पन्न नदियां शिरोरोग, हृदयरोग, कुष्ठ और श्लीपद रोग को उत्पन्न
करती हैं।
बरसात का पानी, मिट्टी, कृमि, कीट, सर्प, चूहा आदि के मलों से दूषित
हो कर नदियों में जाकर मिलता है, इसलिये सब नदियों का पानी दूषित होता
है इसलिये इस ऋतु में नदियों का पानी दोष बढ़ाने वाला होता है। वलाको,
अ० २७ ] २३ सूत्रस्थानम् ३५३
अ० २७ ] २३ सूत्रस्थानम् ३५३
कूंवा, तड़ाग, चश्मा, सरोवर, झरना आदि का पानी अनूप, पर्वत, और
धन्वन् अर्थात् जांगल देश के गुण-दोषों के अनुसार समझना चाहिये १। जो
पानी पिच्छिल (चिकास), क्रिमियुक्त क्लिन्न, पत्ते, सरवाळ अथवा कीचड़ से
मिला, जिस पानी का रंग बदल गया हो, रस बिगड़ गया हो, सान्द्र (तरल
न हो, गाढ़ा हो), दुर्गन्ध युक्त हो, वह जल हितकारी नहीं है। समुद्र का
पानी विस्र (आमगन्धी) तीनों दोषों को करने वाला; नमकीन होता है।
इसलिये नहीं पीना चाहिये। यह आठवां जलवर्ग समाप्त हुआ॥ २१४-२१५॥
इति जलवर्गः।
अथ दुग्धवर्गः।
स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्।
गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः॥ २१६॥
तदेवंगुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्।
प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्॥ २१७॥
महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः।
स्नेहाऽन्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत्॥ २१८॥
रूक्षोष्णं क्षीरमुष्ट्रीणामीषत्सलवणं लघु।
शस्तं वात-कफानाह-कृमि-शोफोदरार्शसाम्॥ २१९॥
बल्यं स्थैर्यकरं सर्वमुष्णं चैकशफं पयः।
साम्लं सलवणं रूक्षं शाखावातहरं लघु॥ २२०॥
छागं कषायमधुरं शीतं ग्राहि पयो लघु।
रक्तपित्तातिसारघ्नं क्षय-कास-ज्वरापहम्॥ २२१॥
हिक्काश्वासकरं तूष्णं पित्तश्लेष्मलमाविकम्।
हस्तिनीनां पयो बल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्॥ २२२॥
जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः।
नावनं रक्तपित्ते च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम्॥ २२३॥
१. सुश्रुत में भी कहा है—अनूपदेशे यद् वारि गुरु तत् श्लेष्मवर्धनम्।
विपरीतमतो मुख्यं लघु जाङ्गलमुच्यते॥
सुश्रुत में कूप, तडाग, वापि झरने आदि के पानी के गुण पृथक्-पृथक्
दिये हैं।
३५४ चरकसंहिता [अ० २७
रोचनं दीपनं वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।
पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नं मङ्गलं बृंहणं दधि ॥ २२४ ॥
पीनसे चातिसारे च शीतके विषमज्वरे ।
अरचौ मूत्रकृच्छ्रे च कार्श्ये च दधि शस्यते ॥ २२५ ॥
शरद्-ग्रीष्म-वसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् ।
रक्तपित्तकफोत्येषु विकारेष्वहितं च तत् ॥ २२६ ॥
त्रिदोषं मन्दकं, जातं वातघ्नं दधि, शुक्तकः १।
सरः, श्लेष्मानिलघ्नस्तु मण्डः स्रोतोविशोधनः ॥ २२७
शोफार्शो-ग्रहणी-दोष-मूत्र-कृच्छ्रोदरा-२रुचौ ।
स्नेहव्यापदि पाण्डुत्वे तक्रं दद्याद् गरेषु च ॥ २२८ ॥
संग्राहि दीपनं हृद्यं नवनीतं नवोद्धृतम् ।
ग्रहण्यर्शो-विकार-हन्मर्दितारुचिनाशनम् ॥ २२९ ॥
स्मृति-बुद्धयग्नि-शुक्रौजः-कफ-मेदो-विवर्धनम् ।
वात-पित्त-विषोन्माद-शोपालक्ष्मी-विषापहम् ३ ॥ २३० ॥
सर्वस्नेहोत्तमं शीतं मधुरं रसपाकयोः ।
सहस्रवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृत् ॥ २३१ ॥
मदापस्मार-मूर्च्छाय-शोषोन्माद-गर-ज्वरान् ।
योनिकर्णशिरःशूलं घृतं जीर्णमपोहति ॥ २३२ ॥
सर्पिष्याजावि-महिषी-क्षीरवत्त्वानि निर्दिशेत् ।
पीयूषो मोरटं चैव किलाटा विविधाश्च ये ॥ २३३ ॥
दीप्ताग्नीनामनिद्राणां सर्व एते सुखप्रदाः ।
गुरवस्तर्पणा वृष्या बृंहणाः पवनापहाः ॥ २३४ ॥
विशदा गुरवो रूक्षा माहिषस्तकपिण्डकाः ।
गोरसानाभयं वर्गो नवमः परिकीर्तितः ॥ २३५ ॥
क्षीरवर्ग-दूध-मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु,
मन्द, प्रसन्न इन दस गुणोंवाला गाय का दूध है। ओज के भी ये ही दस गुण हैं।
इस लिये सामान्य होने से दूध ओज को बढ़ाता है । इसलिये जीवनीय वस्तुओं
में दूध सब से अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है । वह रसायन है ।
भैंस का दूध-गाय के दूध से भारी, गाय के दूध से ठण्डा और उसमें
स्नेह अर्थात् घी भी अधिक होता है, निद्रा न आने वाले के लिये तथा अग्नि के
बहुत बढ़ने में हितकारी है, अग्नि को कम करता है ।
१. शुक्लं इति पाठः । २. मूत्रग्रहोदरा इति पाठः । ३. ज्वरापहम् इति पाठः ।
अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५
अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५
ऊंटनी का दूध रूक्ष, उष्ण, थोड़ा नमकीन, लघु, वात, कफ, आनाह
कृमि, शोफ, उदर एवं अर्श रोग में हितकारी है । एक खुर वाले घोड़ी या
गधी, खच्चर आदि जानवरों का दूध बलकारक, शरीर को स्थिर बनाने वाला,
उष्ण, अम्ल-लवण रस, रूक्ष, हाथ पांव के वातविकारों को नाश करने वाला
और लघु है । बकरी का दूध-कषाय, मधुर, शीतल, संग्राहि, लघु, रक्तपित्त-
अतीसार नाशक, क्षय, कास, ज्वर में हितकारी है । भेड़ो का दूध-हिक्का, श्वास
रोग करने वाला, गरम, पित्त कफ को उत्पन्न करता है । हथिनी का दूध बल-
कारक, गुरु, और शरीर को दृढ़ करने वाला है । स्त्रियों का दूध-जीवनीय,
बृंहणीय, शरीर के सात्म्य, स्नेहक, नस्य के लिये और रक्तपित्त में हितकारी,
आंख के दुःखने में तर्पण करने के लिये उत्तम है ।
दही के गुण—दही रुचिकारक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, स्नेहन के योग्य,
बलवर्धक, विपाक में अम्ल, उष्णवीर्य, वातनाशक, मंगलकारी, बृंहण, पौष्टिक
है । पीनस, अतिसार, शीतजन्य विषमज्वर में, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, और स्वा-
भाविक कृशता में दही उत्तम है । शरद-ग्रीष्म और वसन्त ऋतु में दही का
खाना निन्दित है । मन्दक (जब, दही पूरी तरह न जमे उसे मन्दक कहते
हैं ) दही त्रिदोषकारक है, और ठीक तरह जमा दही वातनाशक होता है ।
सरः (दही के ऊपर की मलाई) शुक्रवर्धक (शुक्र की वृद्धि करने वाली)
है । दही का मण्ड स्वच्छ द्रवभाग (मस्तु), कफ-वात नाशक और स्रोतों को
साफ़ करने वाला है ।
छाछ के गुण—शोफ, अर्श, ग्रहणी, मूत्राघात (मूत्रावरोध), उदर रोग
अरुचि, स्नेहकर्म जन्य रोगों में, पाण्डुरोग में तथा संयोग जन्य विष में छाछ
प्रशस्त है । मक्खन-संग्राही, अग्निदीपक, हृद्य, ग्रहणी, अर्शरोग-नाशक, अर्दित
तथा अरुचि को मिटाता है । ताजा मक्खन ही अधिक प्रशस्त गुणकारी है,
पुराना नहीं ।
गाय के घी के गुण—स्मरण शक्ति, बुद्धि, अग्नि, शुक्र, ओज, कफ-मेद,
को बढ़ानेवाला, वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, दौर्भाग्य, अशुभ-एवं ज्वर का
नाशक है । सब स्नेहों में घी उत्तम है, शीतल, मधुर (रस एवं पाक में
मधुर) है । नाना प्रकार के कर्म करने वाले द्रव्यों से घी का संस्कार करने
पर घी सहस्रों प्रकार के, कर्म कर सकता है । मद, अपस्मार, मूर्च्छा, शोष,
उन्माद, विष, ज्वर, योनिरोग, कर्ण रोग, शिर के शूल में पुराना घी (दस साल
का पुराना--'जीर्णं तु दशवर्षातीतम्' ) प्रशस्त है । अन्य बकरी-आदि के घी
का गुण उनके दूध के समान समझना चाहिये ।
३५६ चरकसंहिता [ अ० २७
पीयूष ( ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खीस ), मोरट ( यही पीयूष
जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, इसको मोरट कहते हैं ), किलाट
( जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल लिया जाय ) तथा इस प्रकार की अन्य
वस्तुएं जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो, या जिनको अनिद्र रोग हो, उनके लिये
सुखदायक हैं, गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक हैं। छच्छ का
छाना या पनीर ( छच्छ या दही को कपड़े में लटका कर उसका द्रव भाग
निकाल देने पर बचा भाग ) स्वच्छ, गुरु, रूक्ष और संग्राही है। यह नवां
गोरस का वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१६-२३५ ॥
इति गोरसवर्गः ।
अथेक्षुवर्गः ।
वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः ।
श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदह्यते ॥ २३६ ॥
शैत्यात्प्रसादान्माधुर्यात्पौण्ड्रकाद्रांशको वरः ॥
प्रभूत-कृमि-मज्जासृङ् मेदो-मांस-करो गुडः ॥ २३७ ॥
क्षुद्रो गुडश्चतुर्भागत्रिभागार्धावशेषितः ।
रसो गुरुर्यथापूर्वं धौतः स्वल्पमलो गुडः ॥ २३८ ॥
यतो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलाः परम् ।
यथा यथैषां वैमल्यं भवेच्छैत्यं तथा तथा ॥ २३९ ॥
वृष्याः क्षीणक्षतहिताः सस्नेहा गुडशर्कराः ।
कषायमधुराः शीताः सतिक्ता याः सशर्कराः ॥ २४० ॥
रूक्षा वम्यतिसारघ्नी छेदनी मधुशर्करा ।
तृष्णासृक्पित्तदाहेषु प्रशस्ताः सर्वशर्कराः ॥ २४१ ॥
माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तकं मधुजातयः ।
माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेषाद् भ्रामरं गुरु ॥ २४२ ॥
माक्षिकं तैलवर्णं स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते ।
क्षौद्रं तु कपिलं विद्याद् घृतवर्णं तु पौत्तिकम् ॥ २४३ ॥
वातलं गुरु शीतं च रक्तपित्तकफापहम् ।
संधातृ छेदनं रूक्षं कषायमधुरं मधु ॥ २४४ ॥
हन्यान्मधूष्णमुष्णार्तमथवा सविषान्वयात् ।
गुरु-रूक्ष-कषायत्वाच्छैत्याच्चाल्पं हितं मधु ॥ २४५ ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
नातः कष्टतमं किञ्चिन्मध्वामाशाद्धि मानवम् ।
उपक्रमविरोधित्वात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४६ ॥
आमे सोष्णा क्रिया कार्या सा मध्वामे विरुध्यते ।
मध्वामं दारुणं यस्मात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४७ ॥
नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ।
इतीक्षुविकृतिप्रायो वर्गोऽयं दशमो मतः ॥ २४८ ॥ •
इक्षुविकारवर्ग—गन्ने का दांतों से चूसकर खाया हुआ रस वीर्य-वर्द्धक,
शीतल, रेचक, स्निग्ध, पौष्टिक, मधुर एवं कफकारक होता है । यान्त्रिक (कोल्हू)
में पेल कर निकाला हुआ रस विदाहयुक्त हो जाता है । छिलके और गांठ के
योग से उसमें विदाह उत्पन्न होता है और बाहर धूप में वायु के योग से भी
विदाह उत्पन्न होता है । पौंण्डा (नरम छिलके का) गन्ना अधिक शीतल,
अधिक निर्मल (प्रसन्नता देने वाला) और अधिक मीठा होता है, बांस गन्ना
इससे उतर कर होता है ।
गुड़—अतिशय कृमि, मज्जा, रक्त, मेद, और मांस को बढ़ाता है । क्षुद्र
गुड़ ( काले रंग का गुड़ ), चार भाग तीन भाग और आधा भाग बचा-
कर गन्ने के रस से बनाये गुड़ की अपेक्षा पूर्वापर क्रम से गुरु हैं। अर्थात्
क्षुद्र गुड़ चार भाग से बने गुड़ से और चार भाग का गुड़ तीन भाग के
गुड़ से अधिक गुरु हैं। साफ़ करके बनाया हुआ अर्थात् थोड़े मल वाला गुड़
कम नुकसान करता । इसके पीछे मत्स्यण्डिका (राब) खांड, शक्कर, उत्तरो-
त्तर निर्मल-स्वच्छ होते जाते हैं और जिस प्रकार इनमें स्वच्छता बढ़ती है
उसी प्रकार शीतलता भी बढ़ती जाती है । अर्थात् राब से खाण्ड और खाण्ड
से शक्कर शीतल है ।
गुड़ से बनी शक्कर वीर्यवर्धक, क्षीण, उरःक्षत के रोगी के लिये हितकारी
स्नेहयुक्त होती है । धमासे के क्वाथ से बनाई शर्करा कषाय, मधुर रस, शीतल
और कुछ तिक्त होती है । मधु की शर्करा, रूक्ष, वमन, अतिसार नाशक,
छेदक (कफ आदि को तोड़ने वाली) होती है । तृष्णा रक्तपित्त और दाह रोग
में सब शर्करायें प्रशस्त हैं ।
मधु के गुण—मधु की चार जातियां हैं । यथा १. माक्षिक (बड़ी मक्खियों
या पिंगल रंग की मक्खियों से बना), २. भ्रामर (भ्रमरोंद्वारा बनाया) ३. क्षौद्र
(छोटी मक्खियों द्वारा बना) ४. पौत्तिक (पीली मक्खियों से बना श्वेत रंग का)।
इन चारों प्रकार के शहद में 'माक्षिक' शहद श्रेष्ठ है । भ्रमरों से बनाया मधु
विशेषतः गुरु होता है । माक्षिक शहद का रंग तेल के समान (पीला) और
३५८ चरकसंहिता [ अ० २७
पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीला होता है । क्षौद्र शहद
श्वेत होता है' ।
मधु—वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने
वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है ।
मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है,
इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से
मारक होता है ।* मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा
सेवन करना उत्तम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा
कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये
विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम-विकार में उष्ण
क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल
क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण
रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना
प्रकार की रस-वीर्य वाली ओषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में
नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु
योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस
द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह
दसवां इक्षुविकार-वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६-२४८ ॥
इतीक्षुवर्गः ।
अथ कृतान्नवर्गः ।
क्षुत्तृष्णा-ग्लानि-दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ ।
स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोऽनुलोमनी ॥ २४९ ॥
तर्पणी ग्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका ।
१. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं—
'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।
आर्घ्यमौद्दालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥'
- शिलाजतु, तैल आदि भी योगवाही हैं। योगवाही होने पर भी स्नेहन
कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में रूक्ष,
कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं ।
२. रोगज्वरापहा इति पाठः ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
मण्डः संदीपनत्यग्निं वातं चाप्यनुलोमयेत् ॥ २५० ॥
मृदूकरोति स्रोतांसि स्वेदं संजनयत्यपि ।
लङ्घितानां विरिक्तानां जीर्णे स्नेहे च तृष्यताम् ॥ २५१ ॥
दीपनत्वाल्लघुत्वाच्च मण्डः स्यात्प्राणधारणः ।
लाजपेया श्रमघ्नी तु क्षामकण्ठस्य देहिनः ॥ २५२ ॥
तृष्णातीसारशमनो धातुसाम्यकरः शिवः ।
लाजमण्डोऽग्निजननो दाहमूर्च्छानिवारणः ॥ २५३ ॥
मन्दाग्निविषमाग्नीनां बाल-स्थविर-योषिताम् ।
देयश्च सुकुमाराणां लाजमण्डः सुसंस्कृतः ॥ २५४ ॥
क्षुत्पिपासापहः पथ्यः शुद्धानां तु मलापहः ।
शृतः पिप्पलीशुण्ठीभ्यां युक्तो लाजाम्लदाडिमैः ॥ २५५ ॥
पेया ( ग्यारह गुने पानी में थोड़ी स्विन्न होने पर बनी हुई कांजी ) भूख,
प्यास, ग्लानि, दुर्बलता, उदर रोग को नष्ट करती है, स्वेदकारक, अग्नि को
बढ़ाती और वायु, मल का अनुलोमन करती है । विलेपी ( चार गुने पानी में
बनाई ) तृप्तिकारक, संग्राही लघु, हृदय के अनुकूल होती है । मण्ड ( चौदह
गुने पानी में तैयार किया ) अग्नि का दीपन और वायु का अनुलोमन करता है,
स्रोतों को कोमल करता तथा पसीना लाता है । उपवास किये, विरेचन किये,
स्नेहपान के जीर्ण होने पर, प्यास लगने पर; अग्निदीपक और लघु होने से मण्ड
का सेवन करना उत्तम है ( मण्ड, लघु और दीपक गुण वाला है ) । लाजपेया
( लाज अर्थात् खीलों से बनाई पेया ) श्रमनाशक, गले के खुश्क होजाने पर
हितकारी है । लाजमण्ड, अग्निवर्धक, दाह-मूर्च्छानाशक है । मन्दाग्नि और
विषमाग्नि वाले पुरुषों के लिये, बालक, वृद्ध, स्त्रियों को तथा कोमल-नाजुक
प्रकृति वालों को लाजमण्ड पका करके देना चाहिये * । जो भूख और प्यास
को सहन न कर सकते हों, पथ्य सेवन करते हों, वमन विरेचन से जो
शुद्ध देह वाले हों, परन्तु थोड़ा मल वमन विरेचन के पीछे रुक गया हो
इस अवस्था में पिप्पली, सोंठ, अनारदाना ( खट्टे अनार के रस ) से बनाया
लाजमण्ड अग्नि को बढ़ावा और वायु का अनुलोमन करता है ॥ २४९-२५५ ॥
सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नः संतप्तश्चौदनो लघुः ।
अधौतोऽप्रस्रुतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥ २५६ ॥
भृष्टतण्डुलमिच्छन्ति गरश्लेष्मामयेष्वपि ।
मांस-शाक-वसा-तैल-घृत-मज्ज-फलौदनाः ॥ २५७ ॥
- धनिया, पिप्पली, सोंठ, मरिच के साथ पकाना चाहिये ।
बल्याः संतर्पणा हृद्या गुरवो बृंहयन्ति च ।
तद्वन्माषतिलं क्षीर-मुद्ग-संयोग-साधिता ॥ २५८ ॥
कुल्माषा गुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः ।
स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य-गोधूम-यावकाः ॥ २५६ ॥
भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् ।
अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥
सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम-चावल (भात )
लघु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और
कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना
मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फल इनको मिलाकर
तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते हैं ।
इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार
गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका-
रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो
उड़द, मूंग, गेहुं, जौ आदि से पिठ्ठी करके बनाये जांय, वे जिस वस्तु से
बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघुगुण वाले होते हैं ।
अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत-
यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत-मांस-स्नेहादि
से संस्कृत ] मांस रस; अम्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर
भारी हैं X अर्थात् अकृत यूष से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक
मांस रस भारी है । अम्ल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६–२६० ॥
सक्तवो वातला रूक्षा बहुवर्चोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते ।
मधुरा लघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥
ग्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा-च्छर्दि-ज्वरापहाः ।
सत्तू वायुकारक, रूक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुलो-
मक, पीने पर जल्दी ही तृप्ति करने वाले, एवं शीघ्र बलकारक हैं ॐ शालि
X अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना ।
विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥
ॐ सुश्रुत ने—"पवनापहा" वायुनाशक लिखा है ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
( हेमन्त धान्य ) धान्य से बनाये सक्तू, मधुर, लघु, शीतल होते हैं। वे
संग्राही, रक्तपित्त, तृष्णा, वमन, और ज्वर के नाशक हैं ॥ २६१-२६२ ॥
हन्यात् व्यधीन् यवापूपो यावको वाट्य एव च ॥ २६३ ॥
उदावर्त-प्रतिश्याय-कास-मेह-गलग्रहान् ।
धानासंज्ञास्तु ये भक्ष्याः प्रायस्ते लेखनात्मकाः ॥ २६४ ॥
शुष्कत्वात्तर्षणाश्चैव विष्टम्भित्वाच्च दुर्जराः ।
विरूढधानाः शष्कुल्यो मधुक्रीडाः सपिण्डकाः ॥ २६५ ॥
पूपाः पूपलिकाद्याश्च गुरवः पैष्टिकाः परम् ।
जौ के पूड़े, जौ की बड़ियां, वाट्य, [ भूने जौ के चावल ], ये उदावर्त्त,
प्रतिश्याय, कास, प्रमेह और गले के रोगों को मिटाती हैं। धाना (भूने जौ),
प्रायः करके लेखन, कफ आदि के उखाड़ने वाले हैं। एवं शुष्क होने से प्यास
लगाने वाले हैं। विष्टम्भी होने से देर में पचते हैं। विरूढ धाना (अंकुरित
धान्य), शष्कुली (चावलों को पीसकर तिल मिलाकर तेल में पकाने से),
मधुक्रीडा (पकाकर, घन बनाकर बीच में शहद रखने से), सपिण्डका (मधु
क्रीड़ा, पूरन पोली), पूप (पूड़े), पूपलिका (मालपूआ; पापड़ा), ये अत्यन्त
गुरु और पौष्टिक होते हैं ॥ २६३-२६५ ॥
फल-मांस-वसा-शाक-पलल क्षौद्र-संस्कृताः ॥ २६६ ॥
भक्ष्या वृष्याश्च बल्याश्च गुरवो बृंहणात्मकाः ।
वेशवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ॥ २६७ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्याः क्षीरेक्षुरसपूपकाः ।
सगुडाः सतिलाश्चैव सक्षीरक्षौद्रशर्कराः ॥ २६८ ॥
वृष्या बल्याश्च भक्ष्यास्तु ते परं गुरवः स्मृताः ।
फल, मांस, वसा, शाक, पलल (तिल का चूर्ण), मधु इनके साथ बनाये
खाद्य पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, गुरु और पौष्टिक हैं। वेशवार (मांस में से
हड्डी निकाल कर पत्थर पर पिसकर पिप्पली, मरिच, गुड़ और घी के साथ पका
देने पर वेशवार बनता है) गुरु, स्निग्ध, बलशक्तिवर्धक है। दूध और गन्ने
के रस से तैयार किये खाद्य पदार्थ गुरु, तृप्तिकारक और वीर्यवर्धक है। गुड़,
तिल, दूध और शर्करा से बनाये पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, और बहुत गुरु
हैं ॥ २६६-२६८ ॥
सस्नेहाः स्नेहसिद्धाश्च भक्ष्या विविधलक्षणाः ॥ २६६ ॥
गुरवस्तर्पणा वृष्या हृद्या गौधूमिका मताः ।
संस्काराल्लघवः सन्ति भक्ष्या गोधूमपैष्टिकाः ॥ २७० ॥
३६२ चरकसंहिता [ अ० २७
धाना-पर्पट-पूपांस्तान्बुद्ध्वा निर्दिशेत्तथा ।
गेहूं के आटे को घी आदि स्नेह में मथकर या घी आदि स्नेह में पका कर
नाना प्रकार के जो खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं वे सब गुरु, तृप्तिकारक,
पौष्टिक (वीर्यवर्धक) और हृदय को प्रिय होते हैं । इसी प्रकार गेहूं आदि के
जो पदार्थ अधिक अग्निसंयोग से तैयार किये जाते हैं, जो कि स्वभाव से गुरु
हैं, वे भी संस्कार द्वारा लघु बन जाते हैं । इसी प्रकार गेहूं की पीठी, धान्य
पर्पट, पूप आदि वस्तुएं भारी होने पर संस्कार के कारण लघु बन जाती हैं ।
इसलिये वैद्य को संस्कार का विचार करके गुणों का निश्चय करना
चाहिये ॥ २६६-२७० ॥
पृथुका गुरवो भृष्टानर्भक्षयेदल्पशस्तु तान् ॥ २७१ ॥
यावा विष्टभ्य जीर्यन्ति सरसा भिन्नवर्चसः ।
सूप्यान्नविकृता भक्ष्या वातला रूक्षशीतलाः ॥ २७२ ॥
सकटुस्नेहलवणानल्पशो भक्षयेत्तु तान् ।
मृदुपाकाश्च ये भक्ष्याः स्थूलाश्च कठिनाश्च ये ॥ २७३ ॥
गुरवस्ते व्यतिक्रान्तपाकाः पुष्टिवलप्रदाः ।
पृथुक (चिवड़ा) भारी होता है। भुने हुए चिवड़े को थोड़ा खाना
चाहिये । याव (जौ का बना चिवड़ा) पेट में अवरोध करके जीर्ण होते हैं ।
सरस (न भुने हुए जौ) रेचक हैं। सूप्य अन्न (मूं ग, उड़द आदि से बनी
वस्तुएं) वायुकारक, रूक्ष, शीतल होते हैं। इनको कटु रस, स्नेह (घी या
तैल), नमक के साथ थोड़ी मात्रा में खाना चाहिये । जो खाद्य पदार्थ मीठी
आँच पर बनते हैं और जो स्थूल और कठोर होते हैं, वे गुरु, एवं देर में पचते
हैं तथा पुष्टि और बल देते हैं ॥ २७१-२७३ ॥
द्रव्यसंयोगसंस्कारं द्रव्यमानं पृथक्तथा ॥ २७४ ॥
भक्ष्याणामादिशेद् बुद्ध्वा यथास्वं गुरुलाघवम् ।
नानाद्रव्यैः समायुक्तः पक्वामक्लिन्नभर्जितैः ❁ ॥ २७५ ॥
विमर्दको गुरुहृद्यो वृष्यो बलवतां हितः ।
रसाला बृंहणी वृष्या स्निग्धा बल्या रुचिप्रदा ॥ २७६ ॥
स्नेहनं तर्पणं हृद्यं वातघ्नं सगुडं दधि ।
किसी पदार्थ के गुरु या लघु होने का निश्चय उस पदार्थ के मूल स्वभाव,
संयोग, संस्कार (पकाने की विधि)), मिलने के परिणाम (राशि), आदि
सब बातों का विचार करके करना चाहिये । जिसमें ये बातें गुरु पक्ष में जाती
❁ 'पक्वा वह्निषु भर्जितैः ॥ इति वा पाठः ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
हों वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें लघु पक्ष में हो वह वस्तु हल्की समझनी चाहिये ।
विमर्दक (मांस को नाना प्रकार से बनाने की विधि से), नाना प्रकार के
पदार्थों से मिला हुआ, पकाया, आम, क्लिन्न और भूने हुए मेद से
गुरु, हृदय के लिये, प्रिय, वीर्यवर्धक और बलवान् पुरुषों के लिये
हितकारी है। मलाई वाली दही को खूब मथकर इसमें दालचीनी, इलायची,
तेजपात, नागकेशर, अजवायन, गुड़, अदरक, सोंठ के साथ मिलाकर तैयार की
रसाला पुष्टिकारक, वृष्य, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, बलकारक, रुचिकारक है। गुड़के
साथ दही स्नेहक तृप्तिकारक,हृदय के लिये प्रिय और वातनाशक है। २७४-२७६॥
द्राक्षा-खर्जूर-कोलानां गुरु विष्टम्भि पानकम् ॥ २७७ ॥
परूषकाणां क्षौद्रस्य यच्चेक्षुविकृतिं प्रति ।
तेषां कट्वम्लसंयोगाः पानकानां पृथक् पृथक् ॥२७८॥
द्रव्यमानं च विज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् ।
कट्वम्ल-स्वादु-लवणा लघवो रागषाडवाः ॥ २७९ ॥
मुखप्रियाश्च हृद्याश्च दीपना भक्तरोचनाः ।
आम्रामलकलेहाश्च बृंहणा बलवर्धनाः ॥ २८० ॥
रोचनास्तर्पणाश्चोक्ताः स्नेहमाधुर्यगौरवात् ।
बुद्ध्वा संयोगसंस्कारं द्रव्यमानं च तच्छ्रितम् ॥ २८१ ॥
गुणकर्माणि लेहानां तेषां तेषां तथा वदेत् ।
द्राक्षा, खजूर, बेर, फालसा, शहद, गन्ने का रस इनके रस में गुड़ या
शर्कर डालकर बनाया हुआ शरबत, गुरु, मल-मूत्र का रोधक होता है। इन
शरबतों में कटु या अम्ल वस्तुओं का योग तथा द्रव्य परिमाण जानकर रोग
एवं रुचि के अनुसार पृथक् पृथक् रूप में देना चाहिये, इनके गुण कर्म पृथक्
२ होजाते हैं । गुड़ के साथ आम रस को पका तेल, सोंठ आदि मिलाकर बनाया
रस, वा अनार, दाल, फालसा, जामुन रसादि से बना मधुर पाक 'रागषाडव'
कहाता है । वह कटु, अम्ल, स्वादु नमकीन, लघु, स्वादिष्ट, हृदय को प्रिय,
अग्निदीपक और खाने में रुचिकर होता है। आम या आंवले के रस से बनाये
चाटन, पुष्टिकार्क, बलवर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक, होते हैं, क्योंकि इनमें
स्नेह मधुरता और भारीपन होता है। द्रव्यों के संयोग संस्कार (पाक-विधि) और
द्रव्यों की मात्रा को चाटने योग्य (लेहों)में देखकर विचार कर गुण कर्म का निश्चय
करना चाहिये ॥ २७७-२८१ ॥
विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥
३६४ चरकसंहिता [ अ० २७
रक्तपित्तकफोक्लेदि शुक्तं वातानुलोमनम् ॥ २८२ ॥
कन्दमूलफलाद्यं च तद्वद्विद्यात्सवासुतम् ।
शिण्डाकी* चाऽऽसुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ।
विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥
शुक्त (चुक्र)—शुद्ध पात्र में गुड़, शहद, कांजी सहित मस्तु डालकर
धान के ढेर में तीन शत रखने से शुक्त या चुक्र तैयार होता है । वह रक्त-
पित्तनाशक, कफ को पतला करने वाला, वायु का अनुलोमक होता है । शुक्त में
कन्द, मूल फल आदि डाले गये हों तो इसको 'आसुत' कहते हैं । शिण्डाकी
(सिरके में काला जीरा आदि डालने से ), आसुत, कालाम्ल (देर तक रखने
से जो अम्ल बन गया हो, अम्ल डालने से नहीं) वह रोचक और लघु होता
है । इस ग्यारहवें कृतान्नवर्ग का वैद्य अवश्य ज्ञान करे ॥ २८२-२८३ ॥
इति कृतान्नवर्गः ।
अथाऽऽहारयोगिवर्गः ।
कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च ।
पित्तलं बद्धविण्मूत्रं न च श्लेष्माभिवर्धनम् ॥ २८४ ॥
वातघ्नेषूत्तमं बल्यं त्वच्यं मेधाग्निवर्धनम् ।
तैलं संयोगसंस्कारात्सर्वरोगापहं मतम् ॥ २८५ ॥
तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जिताश्रमाः ।
आसन्नतिबलाः संख्ये दैत्याधिपतयः पुरा ॥ २८६ ॥
ऐरण्डतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् ।
वातासृग्गुल्म-हृद्रोग-जीर्ण-ज्वर-हरं परम् ।
कटूष्णं सार्षपं तैलं रक्तपित्तप्रदूषणम् ।
कफशुकानिलहरं कण्डूकोठविनाशनम् ॥ २८८ ॥
पियालतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् ।
हितमिच्छन्ति नात्यौष्ण्यात्संयोगे वातपित्तयोः ॥ २८९ ॥
सातस्यं मधुराम्लं तु विपाके कटुकं तथा ।
उष्णवीर्यं हितं वाते रक्तपित्तप्रकोपणम् ॥ २९० ॥
कुसुम्भतैलमुष्णं च विपाके कटुकं गुरु ।
विदाहि च विशेषेण सर्वरोगप्रकोपणम् ॥ २९१ ॥
- षाण्डाकी इति च पाठः ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
फलानां यानि चान्यानि तेषामन्याहारसंविधौ ।
युज्यन्ते गुणकर्मभ्यां तानि ब्रूयाद्यथाफलम् ॥ २८२ ॥
मधुरो बृंहणो वृष्यो बल्यो मज्जा तथा वसा ।
यथासत्त्वं तु शैत्योष्णे वसामज्झोर्विनिर्दिशेत् ॥ २८३ ॥
तिल का तैल कषाय अनुरस, स्वादु, सूक्ष्म ( स्रोतों में घुसनेवाला ) उष्ण,
व्यवायी, छिद्रों में पहुंचने वाला ( शरीर में फैलनेवाला ), पित्तकारक, मल
मूत्र को रोकने वाला है, परन्तु कफ को बढ़ानेवाला नहीं है । वातनाशक ओष-
धियों में श्रेष्ठ, बलकारक, त्वचा के लिये हितकारी, बुद्धि, और अग्नि को बढ़ाने
वाला है, संयोग एवं संस्कार करने से सब रोगों को नाश करने वाला है।
प्राचीन काल में इस तेल के प्रयोग से दैत्याधिपति, बुढ़ापे से रहित, विकार-
शून्य, परिश्रम सहन करनेवाले, न थकने वाले, लड़ाई में बहुत बलवान् हुए थे।
( १ ) ऐरण्ड का तेल-मधुर, गुरु, कफ को बढ़ानेवाला, वातरक्त, गुल्म,
हृदय रोग, अजीर्ण और ज्वरका नाशक है । सरसो का तेल कटु, उष्ण, रक्त-
पित्त को दूषित करने वाला, कफ, शुक्र और वायु को नष्ट करने वाला, कण्डू
और कोठ का नाशक है। (सरसो के तेल को खाने से रक्त पित्त दूषित होते हैं,
मलने से नहीं ) ( ३ ) पियाल फल ( चिरौंजी ) का तैल मधुर, गुरु, कफ को
बढ़ाने वाला और बहुत गरम न होने से वात-पित्त के संम्मिलित विकारों में
उत्तम है ( ४ ) अलसी का तेल-मधुर, अम्ल, विपाक में कटु, उष्णवीर्य वात-
रोग में हितकारी, रक्त और पित्त को कुपित करने वाला है । ( ५ ) सनिये का
तेल-गरम, विपाक में कटु, गुरु, विदाही और सब रोगों को ( दोषों को ) कुपित
करने वाला है । जिन फलों से अन्य तैल तैयार किये जाते हैं, उन तैलों के
गुण उन्हीं फलों के अनुसार समझने चाहिये ।
चिरायता तिक्तक, अतिमुक्तक, बिभीतक ( बहेड़ा ) ना रियल, बेर, अख-
रोट, जीवन्ती, पियाल ( चिरौंजी ) कुसुंदार, सूर्यवल्ली, त्रपुस, ऐरावारू, ककरि
कूष्माण्ड आदि के तेल मधुर, मधुरवीर्य, मधुर विपाक वाले, वात पित्त को शान्त
करने वाले, शीतवीर्य, मार्गशोधक, मलमूत्रकारक, अग्निवर्धक होते हैं ( सुश्रुत )
मज्जा और वसा, मधुर रस, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, बलकारक होता है। इनकी
शीतता और उष्णता प्राणियों के अनुसार समझनी चाहिये। जिस प्राणी का मांस
उष्ण है उसकी मज्जा भी उष्ण, जिसका मांस शीत उस प्राणी की मज्जा भी
शीत समझनी चाहिये ॥ २८४-२६३ ॥
अस्नेहं दीपनं वृष्यमुष्णं वातकफापहम् ॥ २६४ ॥
विपाकेमधुरं हृद्यं रोचनं विश्वभेषजम् ॥
श्लेष्मला मधुरा चार्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ।
सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २९५ ॥
नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् ।
छेदित्वाच्छोषणत्वाच्च दीपनं कफवातजित् ॥ २९६ ॥
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कटूष्णं दीपनं लघु ।
हिङ्गु शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २९७ ॥
रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च ।
त्रिदोषघ्नं समधुरं सैन्धवं लवणोत्तमम् ॥ २९८ ॥
सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ।
सौवर्चलं विबन्धघ्नं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २९९ ॥
तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् ।
ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं बिडम् ॥ ३०० ॥
सतिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम् ।
न काललवणे गन्धः सोवर्चलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥
सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् ।
रोचनं लवणं सर्वं पाकि संस्र्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥
हृत्पाण्डु-ग्रहणी-दोष-प्लीहानाह-गलग्रहान् ।
कासं कफजमर्शांसि यावशूको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥
तीक्ष्णोष्णो लघुरूक्षश्च क्लेदी पक्ता विदारणः ।
दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंन्निभः ॥ ३०४ ॥
कारव्यः कुञ्चिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बरु ।
रोचनं दीपनं वात-कफ-दौर्गन्ध्य-नाशनम् ॥ ३०५ ॥
आहारयोगिनां भक्तिनिश्चयो न तु विद्यते ।
समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥
सोंठ—थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक,
विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है। हरी पिप्पली-कफ-
कारक, मधुर, गुरु और स्निग्ध होती है। सूखी पिप्पली कफ वातनाशक कटु,
उष्ण, वीर्यवर्धक है। काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, वीर्य को न बढ़ाने
वाली, लघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली
और शोषक होने से अग्निदीपक एवं कफ-वातनाशक है। और हरी अवस्था में
स्वादु गुरु, कफवर्धक होती है। हींग वायु-कफ विबन्धनाशक, कटु, उष्ण,
अग्निदीपक, लघु, शूलनाशक, पाचक और रुचिकर है। सेन्धा नमक—रुचि-
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७
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कारक, अग्निवर्धक, हृद्य, आँखों के लिये हितकारी, अविदाही, त्रिदोषनाशक,
कुछ मधुर और सब नमकों में श्रेष्ठ है।
सौवर्चल नमक (संचल नमक)—सूक्ष्म, उष्ण, कटु होने से तथा सुगन्धि
होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हृद्य, उद्गार (डकार) को शोधन करने
वाला है। विड (काला नमक)—तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी (शरीर में फैलने
वाला होने से) अग्निदीपक, शूलनाशक, एवं वायु को ऊपर या नीचे, अधोमार्ग
दोनों से अनुलोमन करने वाला है। उद्भिद् नमक-तिक्त, कटु, क्षारयुक्त,
तीक्ष्ण उत्क्लेदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है। काले लवण के गुण
संचल नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती।
समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है। पांशुज (सज्जी) जिससे धोबी
कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है। सब
प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या व्रण को पकाने वाले; संस्री और वात-
नाशक हैं।
जौ-क्षार—हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा, आनाह, गलरोग, कफजन्य
कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं। सब प्रकार के क्षार (टंकण, सज्जी,
पापड़ खार आदि) तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्लेदि, अन्न और व्रण को पकाने
वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का
छेदन करने वाले अग्नि के समान गुण वाले (उष्ण) होते हैं। कारवी (काला
जीरा,) कुंचीका (मोटा जीरा) ये रुचिकर अग्नि-दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध
को नाश करने वाले हैं। खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या
होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता,
क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि भिन्न भिन्न है। यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों
का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २४४-३०६ ॥
इत्याहारयोगिवर्गः ।
शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते ।
पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥
यद्यदागच्छति क्षिप्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् ।
निस्तुषं युक्तिसृष्टं तु सुप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥
शूकधान्य (चावल, गेहूँ आदि), शमीधान्य (मूंग, मसूर, उड़द
आदि) ये एक साल पुराने प्रशस्त हैं। प्रायः करके पुराने धान्य रूक्ष होते हैं।