चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 378, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंबल्याः संतर्पणा हृद्या गुरवो बृंहयन्ति च ।
तद्वन्माषतिलं क्षीर-मुद्ग-संयोग-साधिता ॥ २५८ ॥
कुल्माषा गुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः ।
स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य-गोधूम-यावकाः ॥ २५६ ॥
भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् ।
अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥
सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् ।
भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम-चावल (भात )
लघु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और
कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना
मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फल इनको मिलाकर
तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते हैं ।
इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार
गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका-
रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो
उड़द, मूंग, गेहुं, जौ आदि से पिठ्ठी करके बनाये जांय, वे जिस वस्तु से
बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघुगुण वाले होते हैं ।
अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत-
यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत-मांस-स्नेहादि
से संस्कृत ] मांस रस; अम्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर
भारी हैं X अर्थात् अकृत यूष से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक
मांस रस भारी है । अम्ल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६–२६० ॥
सक्तवो वातला रूक्षा बहुवर्चोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते ।
मधुरा लघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥
ग्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा-च्छर्दि-ज्वरापहाः ।
सत्तू वायुकारक, रूक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुलो-
मक, पीने पर जल्दी ही तृप्ति करने वाले, एवं शीघ्र बलकारक हैं ॐ शालि
X अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना ।
विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥
ॐ सुश्रुत ने—"पवनापहा" वायुनाशक लिखा है ।