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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 639 में से

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पृष्ठ 376

३५८ चरकसंहिता [ अ० २७
पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीला होता है । क्षौद्र शहद
श्वेत होता है' ।
मधु—वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने
वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है ।
मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है,
इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से
मारक होता है ।* मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा
सेवन करना उत्तम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा
कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये
विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम-विकार में उष्ण
क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल
क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण
रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना
प्रकार की रस-वीर्य वाली ओषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में
नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु
योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस
द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह
दसवां इक्षुविकार-वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६-२४८ ॥
इतीक्षुवर्गः ।
अथ कृतान्नवर्गः ।
क्षुत्तृष्णा-ग्लानि-दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ ।
स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोऽनुलोमनी ॥ २४९ ॥
तर्पणी ग्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका ।
१. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं—
'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।
आर्घ्यमौद्दालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥'

  • शिलाजतु, तैल आदि भी योगवाही हैं। योगवाही होने पर भी स्नेहन
    कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में रूक्ष,
    कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं ।
    २. रोगज्वरापहा इति पाठः ।