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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 639 में से

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पृष्ठ 384

श्लेष्मला मधुरा चार्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ।
सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २९५ ॥
नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् ।
छेदित्वाच्छोषणत्वाच्च दीपनं कफवातजित् ॥ २९६ ॥
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कटूष्णं दीपनं लघु ।
हिङ्गु शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २९७ ॥
रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च ।
त्रिदोषघ्नं समधुरं सैन्धवं लवणोत्तमम् ॥ २९८ ॥
सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ।
सौवर्चलं विबन्धघ्नं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २९९ ॥
तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् ।
ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं बिडम् ॥ ३०० ॥
सतिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम् ।
न काललवणे गन्धः सोवर्चलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥
सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् ।
रोचनं लवणं सर्वं पाकि संस्र्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥
हृत्पाण्डु-ग्रहणी-दोष-प्लीहानाह-गलग्रहान् ।
कासं कफजमर्शांसि यावशूको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥
तीक्ष्णोष्णो लघुरूक्षश्च क्लेदी पक्ता विदारणः ।
दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंन्निभः ॥ ३०४ ॥
कारव्यः कुञ्चिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बरु ।
रोचनं दीपनं वात-कफ-दौर्गन्ध्य-नाशनम् ॥ ३०५ ॥
आहारयोगिनां भक्तिनिश्चयो न तु विद्यते ।
समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥
सोंठ—थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक,
विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है। हरी पिप्पली-कफ-
कारक, मधुर, गुरु और स्निग्ध होती है। सूखी पिप्पली कफ वातनाशक कटु,
उष्ण, वीर्यवर्धक है। काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, वीर्य को न बढ़ाने
वाली, लघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली
और शोषक होने से अग्निदीपक एवं कफ-वातनाशक है। और हरी अवस्था में
स्वादु गुरु, कफवर्धक होती है। हींग वायु-कफ विबन्धनाशक, कटु, उष्ण,
अग्निदीपक, लघु, शूलनाशक, पाचक और रुचिकर है। सेन्धा नमक—रुचि-