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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।

३७६ मनुस्मृति ।
कहलाते हैं और चौथा शूद्र एकजाति कहलाता है। पाँचवां वर्ण
कोई नहीं है ॥ १-४ ॥
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥ ५ ॥
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥ ६ ॥
अनन्तरासु जातानां विधिरेष सनातनः ।
द्वयेकान्तरासु जातानां धर्म्यं विद्यादिमं विधिम् ॥७॥
ब्राह्मणादि वर्गों की अक्षतयोनि स्त्रियों में क्रम से जो पुत्र पैदा
हों, उनको उसी जाति का जानना चाहिए। ब्राह्मणादि के अपने
से एक श्रेणी नीचे जाति की स्त्री में पैदा हुए पुत्र पिता के समान
जाति के गिने जाते हैं—क्योंकि वे माता के दोष से निन्दित हैं।
अपने से एक एक श्रेणी नीचे की जाति में उत्पन्न पुत्रों की यह
सनातन विधि है और अपने से दो दो जाति नीचे की स्त्रियों में
पैदा पुत्रों की विधि इसप्रकार है:—॥ ५-७॥
ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामम्बष्ठो नाम जायते ।
निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ ८ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां क्रूराचारविहारवान् ।
क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुग्रो नाम प्रजायते ॥ ६ ॥
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेर्वर्णयोर्द्वयोः ।
वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन् षडेतेऽपसदाः स्मृताः॥ १० ॥
क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ।
वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ ॥ ११ ॥