मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
बारहवां अध्याय। ४५५
बारहवां अध्याय। ४५५
तामिस्रादिषु चोग्रेषु नरकेषु विवर्तनम् ।
असिपत्रवनादीनि बन्धनच्छेदनानि च ॥ ७५ ॥
विविधाश्चैव संपीड़ाः काकोलूकैश्च भक्षणम् ।
करम्भवालुकातापान् कुम्भीपाकांश्च दारुणान् ॥७६॥
संभवांश्च वियोनीषु दुःखप्रायासु नित्यशः ।
शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ॥ ७७ ॥
असकृद्गर्भवासेषु वासं जन्म च दारुणम् ।
बन्धनानि च कष्टानि परप्रेष्यत्वमेव च ॥ ७८ ॥
अपने धर्म से भ्रष्ट ब्राह्मण उल्कामुख प्रेत होकर वमन खाता
है। क्षत्रिय, कटपूत प्रेत होकर विष्ठा और मुरदा खाता है।
अपने धर्म से भ्रष्ट वैश्य मैत्राक्षज्योतिक प्रेत होकर, पीब खाता
है और शूद्र चैलाशक प्रेत होकर, कपड़े की जूँ खाता है । वि-
षयासक्त पुरुष जैसे जैसे विषयों का सेवन करते हैं, वैसे वैसे
उनमें उनकी कुशलता हो जाती है। वे निर्बुद्धि उन पाप कर्मों
के बार बार करने से यहां अनेक योनियों में जन्म लेकर दुःख
पाते हैं। तामिस्र आदि भयानक नरकों में बार बार जन्म होता
है। असिपत्र आदि वनों में चलना पड़ता है। यमलोक के बन्धन
और छेदन के दुःख भोगने पड़ते हैं । अनेक पीड़ायें होती हैं,
कौआ, उल्लू नोच नोच कर खाते हैं, जलती रेती का ताप और
कुम्भीपाक आदि दारुण नरक भोगने पड़ते हैं। दुःख से पूर्ण
पशु आदि की योनि में वारंवार जन्म होते हैं। सर्दी-गर्मी की
पीड़ा और भांति भांति के भय होते हैं। फिर फिर गर्भ में वास
होता है। दुःखद जन्म होता है। विविध बंधन शृङ्खला वगैरह
का और दासपना प्राप्त होता है ॥ ७१-७८ ॥
बन्धुप्रियवियोगांश्च संत्रासं चैव दुर्जनैः ।
द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ॥ ७६॥
४५६ मनुस्मृति।
जरां चैवाप्रतीकारां व्याधिभिश्चोपपीडनम् ।
क्लेशांश्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ॥ ८० ॥
यादृशेन तु भावेन यद्यत्कर्म निषेवते ।
तादृशेन शरीरेण तत्तत्फलमुपाश्नुते ॥ ८१ ॥
एष सर्वः समुद्दिष्टः कर्मणां वः फलोदयः ।
नैःश्रेयसकरं कर्म विप्रस्येदं निबोधत ॥ ८२ ॥
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च नैःश्रेयसकरं परम् ॥ ८३ ॥
सर्वेषामेव चैतेषां शुभानामिहकर्मणाम् ।
किञ्चिच्छ्रेयस्करतरं कर्मोक्तं पुरुषं प्रति ॥ ८४ ॥
सर्वेषामपि चैतेषामात्मज्ञानं परं स्मृतम् ।
तद्ध्यग्र्यं सर्वविद्यानां प्राप्यते ह्यमृतं ततः ॥ ८५ ॥
षण्णामेषां तु सर्वेषां कर्मणां प्रेत्य चेह च ।
श्रेयस्करतरं ज्ञेयं सर्वदा कर्म वैदिकम् ॥ ८६ ॥
बान्धवों का वियोग, दुर्जनों का सहवास, दुःख से धन पाना,
धन का नाश, कठिनता से मित्र पाना और शत्रुओं से वैर भाव
होता है । जिसका उपाय न हो सके ऐसा बुढ़ापा आता है,
व्याधियों से कष्ट, नानाप्रकार के दुःख और दुर्जय मरण होता
है । मनुष्य जिस भाव से जो कर्म करता है, उसीके अनुकूल
शरीर धारण करके फलों को भोगता है। यह सब कर्म फलों का
वृत्त कहा गया है । अब ब्राह्मणों का कल्याण करनेवाला कर्म
सुनो:—
नैःश्रेयस-कर्म ।
वेदाभ्यास, तप, आत्मज्ञान, इन्द्रियसंयम, अहिंसा, गुरुसेवा,