मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
बारहवां अध्याय। ४४६
बारहवां अध्याय। ४४६
वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, शौच, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म-
कर्म और आत्मचिन्तन ये सब सत्त्वगुण के काम हैं। आरम्भ
में रुचि होना, फिर अधैर्य, बुरे कामों में फँसना और विषय-
भोग ये रजोगुण के काम हैं। लोभ, नींद, अधीरता, क्रूरता,
नास्तिकता, अनाचार, मांगने की आदत और प्रमाद ये तमो-
गुण के काम हैं। इन तीनों गुणों का संक्षेप से लक्षण यों हैः-
जिस कर्म को करके करते हुए या आगे करने में लज्जा आती
है वह तमोगुण का लक्षण है। जिस कर्म से लोक में प्रसिद्धि
चाहे, पर फल न होने पर शोक न पैदा हो, वह रजोगुण का
लक्षण है। जिससे ज्ञान प्राप्त करना चाहे, जिसको करने में
लज्जा न आवे और जिस कर्म से मन प्रसन्न सन्तुष्ट रहे, उसको
सत्त्वगुण का लक्षण जानना चाहिए। तम का काम, रज का
अर्थ और सत्त्व का धर्म ये मुख्य लक्षण हैं। इनमें क्रम से अगला
अगला श्रेष्ठ माना जाता है॥ ३१-३८॥
येन यस्तु गुणेनैषां संसारान् प्रतिपद्यते ।
तान् समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम् ॥३६॥
देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः ।
तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषां त्रिविधा गतिः ॥ ४० ॥
त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः ।
अधमा मध्यमाग्र्या च कर्मविद्याविशेषतः ॥ ४१ ॥
स्थावराः क्रमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः ।
पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ ४२ ॥
हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः ।
सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥४३॥
चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः ।
५७
४५० मनुस्मृति ।
रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥
झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः ।
द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५ ॥
राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः ।
वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥
इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता
है, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं-सात्त्विक गुणवाले देव-
भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते हैं-
यह तीन प्रकार की गति है। सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों
से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार, उत्तम-मध्यम-अ-
धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क-
छुवा, पशु और मृग, ये तमोगुणी अधम गति है। हाथी, घोड़ा,
शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शूकर ये तमोगुणी मध्यमगति
है। चारण-भाँट, गरुड़ादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि-
शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए। झल्ल, मल्ल,
नट, शस्त्र से जीनेवाले, जुआ-मद्यपान में आसक्त पुरुष ये रजो-
गुण की अधमगति हैं । राजा, क्षत्रिय, राजपुरोहित, विवाद
करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥
गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये ।
तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥
तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः ।
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥ ४८ ॥
यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः ।
पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥