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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पाँचवाँ अध्याय । १८१

पाँचवाँ अध्याय । १८१
प्रोक्षणात्तृणकाष्ठं च पलालं चैव शुध्यति ।
मार्जनोपाञ्जनैर्वेश्म पुनः पाकेन मृन्मयम् ॥१२२॥
यज्ञकर्म में यज्ञ के पात्र हाथ से धोडालने से पवित्र होजाते हैं ।
चमस और ग्रहपात्र वगैरह गरम जल से धोने से पवित्र होते हैं।
चरु, स्रुच्, स्रुवा, स्फ्य, सूप, शकट, मूसल और उलूखल गरम
जल से शुद्ध होते हैं । अन्न और वस्त्र का बहुत ढेर हो तो जल
छिड़कने से पवित्र होता है और थोड़ा हो तो जल से धोने पर
पवित्र होता है। चमड़ा, चटाई आदि बांसे के पदार्थ, वस्त्रों के
समान और शाक-मूल-फलों को अन्न के समान पवित्र करना चा-
हिये । रेशमी, ऊनी वस्त्र-रेह से, कम्बल-रीठ से, सन के वस्त्र-बेल
की गूदी से, अलसी आदि के वस्त्र-सफेद सरसों से, पवित्र होते
हैं । शंख, सींग, हड्डी और हाथीदांत के पदार्थ, सफेद सरसों,
गोमूत्र और जल से पवित्र होते हैं । लकड़ी, घास वगैरह जल
छिड़कने से, घर लीप-पोत से और मिट्टी के बर्तन आग में रखने
से शुद्ध होते हैं ॥ ११६-१२२॥
मद्यैर्मूत्रैः पुरीषैर्वा ष्ठीवनैः पूयशोणितैः ।
संस्पृष्टं नैव शुद्ध्येत पुनः पाकेन मृन्मयम् ॥१२३॥
संमार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च ।
गवां च परिवासेन भूमिः शुध्यति पञ्चभिः ॥ १२४ ॥
पक्षिजग्धं गवाघ्रातमवधूतमवक्षुतम् ।
दूषितं केशकीटैश्च मृत्प्रक्षेपेण शुध्यति ॥ १२५ ॥
यावन्नापैत्य मेध्याद्गन्धो लेपश्च तत्कृतः ।
तावन्मृद्वारि वादेयं सर्वासु द्रव्यशुद्धिषु ॥ १२६ ॥
त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।

१८२ मनुस्मृति ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ १२७ ॥
आपः शुद्धा भूमिगता वैतृष्णं यासु गोर्भवेत् ।
अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ १२८ ॥
नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्ये यच्च प्रसारितम् ।
ब्रह्मचारिगतं भैक्षं नित्यं मेध्यमिति स्थितिः ॥ १२६ ।
नित्यमास्यं शुचिः स्त्रीणां शकुनिः फलपातने ।
प्रस्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ १३० ॥
श्वभिर्हतस्य यन्मांसं शुचि तन्मनुरब्रवीत् ।
क्रव्याद्भिश्च हतस्यान्यैश्चाण्डालाद्यैश्च दस्युभिः॥१३१॥
जिस मृत्पात्र में मद्य-मल-चरबी आदि का संपर्क होजाता है
उसका पुनः अग्निसंस्कार करने पर भी वह शुद्ध नहीं होता।
झाडू देना, लीपना, जल छिड़कना, खोदना और गौ का निवास
इन पांच प्रकारों से भूमि पवित्र होती है। पक्षी का खाया, गौ का
सूंघा, पैर से दवा और जिसके ऊपर छींक दिया हो, जहां बाल या
कीड़ा पड़ा हो ऐसा स्थान मिट्टी डालने से पवित्र होता है । जब
तक पदार्थों से अपवित्र वस्तु का गंध या लेप दूर न हो तबतक
उन पदार्थों को मिट्टी और जल से शुद्ध करे। देवताओं ने ब्राह्मणों
के तीन पदार्थ पवित्र कहे हैं—एक अदृष्ट, दूसरा जो पानी से धो
लिया हो, तीसरा जिसको ब्राह्मणों ने वाणी से पवित्र कहा हो।
जिस जल में गौ की प्यास दूर होजाय, पवित्र हो, गन्ध, रस
और वर्ण से ठीक हो, ऐसा पानी भूमि में शुद्ध होता है । कारी-
गर का हाथ, जो पदार्थ बाज़ार में बेंचने को रक्खे हों और ब्रह्मचारी
की भिक्षा ये सदा पवित्र होते हैं। रतिसमय में स्त्रियों का मुख,
फल गिराने में पक्षीका चोंच, दूध निकालते समय बछड़ा का मुख
और शिकार में कुत्ता का मुख पवित्र माना गया है । कुत्ता के
मारे हुए का मांस पवित्र होता है । और मांसाहारी पशु, चाण्डाल