मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पहला अध्याय । १३
पहला अध्याय । १३
मनुजी कहते हैं-प्रजापति ने सृष्टिके पूर्व इस धर्मशास्त्र को बना
कर मेरे को उपदेश दिया । फिर मैंने मरीचि आदि को बताया ।
यह समग्र शास्त्र भृगु आप लोगों को सुनावेंगे, जो कि मेरे से सं-
पूर्ण पढ़ा है । उसके बाद मनुकी आज्ञा पाकर महर्षि भृगु ने सब
ऋषियों को कहा कि सुनो ॥ ५८-६० ॥
स्वायम्भुवस्यास्य मनोः षड्वंश्या मनवोऽपरे ।
सृष्टवन्तः प्रजाःस्वाः स्वा महात्मानो महौजसः॥ ६१ ॥
स्वारोचिषश्चौत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा ।
चाक्षुषश्च महातेजा विवस्वत्सुत एव च ॥ ६२ ॥
स्वायम्भुव मनु के वंश में, छः मनु और हैं। उन्होंने अपने अपने
काल में प्रजाकी सृष्टि, पालन आदि किया है। उनका नाम-स्वारो-
चिष, औत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत है ॥ ६१-६२ ॥
स्वायम्भुवाद्याः सत्तैते मनवो भूरितेजसः ।
स्वे स्वेन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्यायुश्चराचरम् ॥ ६३ ॥
निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठात्रिंशत्तु ताः कलाः ।
त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥ ६४ ॥
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषदैविके ।
रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ॥ ६५ ॥
पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः ।
कर्मचेष्टास्वहः कृष्णः शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी ॥ ६६ ॥
अब मन्वन्तर आदि काल का मान कहते हैं-आँख की पलक
गिरने का समय निमेष कहलाता है, १८ निमेष की एक काष्ठा ना-
मक काल होता है। ३० काष्ठा की कला, ३० कलाका मुहूर्त, ३० मुहूर्त
का अहोरात्र होता है । मानुष और दैव अहोरात्र-दिन, रात
का विभाग सूर्य करता है । उसमें प्राणियों के सोने के लिए
रात और कर्म करने के लिए दिन होता है । मनुष्यों के एक मास
१४ मनुस्मृति ।
का, पितरों का एक अहोरात्र होता है । उसमें कृष्णपक्ष का दिन कर्म
करने और शुक्लपक्ष की रात्रि शयन करने के लिएहै ॥ ६३-६६ ॥
दैवे राज्यहनी वर्ष प्रविभागस्तयोः पुनः ।
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम् ॥ ६७ ॥
ब्राह्मस्य तु क्षयाहस्य यत्प्रमाणं समासतः ।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ६८ ॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम् ।
तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ ६६ ॥
इतरेषु ससंख्येषु ससंध्यांशेषुच त्रिषु ।
एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ ७० ॥
यदेतत्परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम् ।
एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगमुच्यते ॥ ७१ ॥
दैविकानां युगानान्तु सहस्रं परिसंख्यया ।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च ॥ ७२ ॥
मनुष्यों के एक वर्ष में देवताओं का अहोरात्र होता है । उस में
उत्तरायण दिन और दक्षिणायन रात है । ब्राह्म अहोरात्र और चारों
युगों का प्रमाण इस प्रकार है-मनुष्यों के ३६० वर्ष का १ देव-
वर्ष होता है । ऐसे चार हजार वर्षों को कृतयुग कहते हैं और
उसकी संध्या (युग का आरम्भकाल) और सन्ध्यांश (युग का
अन्तकाल) दोनों चारसौ ४०० वर्ष का है । यों सन्ध्या और
सन्ध्यांश मिलकर ४८०० दैववर्ष का कृतयुग होता है । अर्थात्
४८०० × ३६० = १७२८००० वर्ष उसका मान है । बाकी त्रेता,
द्वापर और कलि इन तीनों के सन्ध्या और सन्ध्यांश के साथ
जो संख्या होती है, उस में हजार में की और सैकड़े में की
एक एक संख्या घटाने से तीनों की संख्या पूरी होती है । इस
प्रकार, त्रेतायुग ३६००=१२९६००० । द्वापर = २४०० = ८६४०००