मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय । ३६६
नवां अध्याय । ३६६
होता है । इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्र, अग्नि और
पृथ्वी के तेजोमय-प्रकाशमान आचरणों से जगत् में व्यवहार
करे ॥ ३००-३०३ ॥
वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽभिप्रवर्षति ।
तथाभिवर्षेत्स्वं राष्ट्रं कामैरिन्द्रव्रतं चरन् ॥ ३०४ ॥
अष्टौ मासान् यथादित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।
तथा हरेत्करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत् ॥ ३०५ ॥
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः ।
तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम् ॥ ३०६ ॥
यथा यमः प्रियद्वेष्यौ प्राप्ते काले नियच्छति ।
तथा राज्ञा नियन्तव्याः प्रजास्तद्धि यमव्रतम्॥३०७॥
जैसे इन्द्र वर्षा में चार मास जल वर्षा करके प्रजामनोरथ पूर्ण
करता है वैसे राजा-इन्द्र के आचरण से अपने देशकी प्रजा को
सन्तुष्ट करे । जैसे आठ मास सूर्य अपने तेजसे पृथिवीका जल खींच
लेता है, वैसे राजा सूर्य की भांति आचरण करके प्रजा को दुःख
न देकर राज्य-करलेवे । जैसे वायु प्राणरूप से सब प्राणियों में
विचरता है, राजा भी दूतों से अपने देशका समाचार लेता रहे ।
जैसे यम समयपर मित्र-शत्रु सबको शिक्षा देताहै, वैसे राजा-
यम के समान सारी प्रजाका शासन करे ॥ ३०४-३०७ ॥
वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एवाभिदृश्यते ।
तथा पापान्निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम् ॥ ३०८ ॥
परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यन्ति मानवाः ।
तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चान्द्रव्रतिको नृपः ॥ ३०६॥
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात्पापकर्मसु ।
४७
३७० मनुस्मृति ।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ ३१० ॥
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ ३११ ॥
एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
स्तेनान् राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ ३१२ ॥
जैसे वरुण अपराधियों को अपने पाशों से बाँधता है, वैसे राजा
वरुण होकर पापियों को दण्ड देवे । जैसे मनुष्य पूर्ण चन्द्रबिम्ब
को देखकर खुश होते हैं, वैसे प्रजामण्डल जिस राजा को देख
कर खुश हो वह राजा चन्द्रव्रतधारी है। पापियों पर अग्नि के
समान प्रताप रक्खे, दुष्ट मन्त्रियों को मरवा दे यह अग्निव्रत है।
जैसे पृथ्वी सर्व प्राणियों को सम-भाव से धारण करती है,
वैसे राजा भी सम-भाव से प्राणियों का पालन करे । इन सब
और दूसरे भी उपायों से बर्ताव करे और स्वराज्य या परराज्य
के चोरों को दण्ड देवे ३०८-३१२ ॥
परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ।
ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ॥ ३१३ ॥
यैः कृतः सर्वभक्ष्योऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयी चाप्यायितःसोमःको न नश्येत्प्रकोप्य तान्॥३१४॥
लोकानन्यान सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः ।
देवान्कुर्युरदेवांश्च कः क्षिएवंस्तान्समुद्ध्नुयात् ॥ ३१५॥
ब्राह्मण-माहात्म्य ।
खजाना की कमी आदि विपत्ति में पड़कर भी राजा ब्राह्मणों
को नाराज न करे क्योंकि वे लोग कुपित होकर राज्य का नाश
कर देते हैं। जिन ब्राह्मणों ने कुपित होकर अग्नि को सर्वभक्षक,