मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय। ३५६
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नवां अध्याय। ३५६
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शिक्षा और धन-दण्ड भी करे। गुरुपत्नी-गामी के मस्तक में
भग-चिह्न, शराबी के कलाल के झण्डे का चिह्न, चोर के कुत्ते के
पैर का चिह्न और ब्रह्मघाती के मस्तक में शिरहीन धड़ का चिह्न
करे। ऐसे मनुष्य सहभोजन, यज्ञ, वेदाध्ययन और विवाह-स-
म्बन्ध के अयोग्य होते हैं। और श्रौत-स्मार्त कर्मों से बहिष्कृत
निर्धन पृथिवी पर विचरें। इन चिह्नवाले पातकियों को स-
म्बन्धी और जातिवाले त्याग दें। उन पर दया न करें, नमस्कार
न करें, यही मनुजी की आज्ञा है। परन्तु जो महापातकी प्राय-
श्चित्त करें उन के मस्तक में चिह्न न करे, केवल उत्तम साहस
दण्ड करे। इन अपराधों में ब्राह्मण कोही 'मध्यम साहस' दण्ड
करे अथवा धन-परिवार के साथ राज्य से निकाल दे। और
दूसरे लोग इन पापों को जान कर करें तो उनका सर्वस्व छीन
लेय और जानकर करें तो देश से निकाल देय। धार्मिक राजा
महापातकी के धन को ग्रहण न करे। यदि लोभ से ग्रहण
करे तो उस पाप से लिप्त होजाता है ॥ २३६-२४३ ॥
अप्सु प्रवेश्य तं दण्डं वरुणायोपपादयेत् ।
श्रुतवृत्तोपपन्ने वा ब्राह्मणे प्रतिपादयेत् ॥ २४४ ॥
ईशो दण्डस्य वरुणो राज्ञां दण्डधरो हि सः ।
ईशः सर्वस्य जगतो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ २४५ ॥
यत्र वर्जयते राजा पापकृद्भ्यो धनागमम् ।
तत्र कालेन जायन्ते मानवा दीर्घजीविनः ॥ २४६ ॥
निष्पद्यन्ते च सस्यानि यथोक्तानि विशां पृथक् ।
बालाश्च न प्रमीयन्ते विकृतं न च जायते ॥ २४७ ॥
महापातकी के दण्ड-धन को राजा जल में डालकर वरुण के
अर्पण करदे या वेदज्ञ-सदाचारी ब्राह्मण को देदेवे। पातकी के दण्ड
का स्वामी वरुण है क्योंकि वह राजाओं को भी दण्ड देनेवाला
३६० मनुस्मृति ।
है । और वेदज्ञ ब्राह्मण सारे जगत् का प्रभु है । जिस देश में राजा
पापियों का दण्ड लेकर उस का भोग नहीं करता उस देश में
मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। और प्रजाओं के धान्य ठीक ठीक पैदा
होते हैं, बालक नहीं मरते और कोई विकार नहीं होता ॥२४४-२४७॥
ब्राह्मणान्बाधमानं तु कामादवरवर्णजम् ।
हन्याच्चित्रैर्वधोपायैरुद्वेजनकरैर्नृपः ॥ २४८ ॥
यावानवध्यस्य वधे तावान्वध्यस्य मोक्षणे ।
अधर्मो नृपतेर्दृष्टो धर्मस्तु विनियच्छतः ॥ २४९ ॥
उदितोऽयं विस्तरशो मिथो विवदमानयोः ।
अष्टादशसु मार्गेषु व्यवहारस्य निर्णयः ॥ २५० ॥
एवं धर्म्याणि कार्याणि सम्यक्कुर्वन् महीपतिः ।
देशानलब्धाँल्लिप्सेत लब्धांश्च परिपालयेत् ॥ २५१ ॥
जानकर ब्राह्मण को कष्ट देनेवाले, नीचजाति के पुरुष को राजा
अनेक उपायों से शारीरिक दण्ड देवे । अदण्ड्य को दण्ड देने से
राजा को जितना अधर्म होता है उतनाही अपराधी को छोड़ने से
होता है । न्यायकारी को धर्म प्राप्त होता है । अठारह प्रकार के
दावों में प्रत्येक के परस्पर-विवाद का निर्णय विस्तार से कहा
गया है । राजा इस प्रकार सब कार्यों का धर्मानुसार निर्णय करे ।
अप्राप्त देशों को लेना और प्राप्त देशों की रक्षा करना, राजा का
धर्म है ॥ २४८-२५१ ॥
सम्यङ्निविष्टदेशस्तु कृतदुर्गश्च शास्त्रतः ।
कण्टकोद्धरणे नित्यमातिष्ठेद्यत्नमुत्तमम् ॥ २५२ ॥
रक्षणादार्यवृत्तानां कण्टकानां च शोधनात् ।
नरेन्द्रास्त्रिदिवं यान्ति प्रजापालनतत्पराः ॥ २५३ ॥