मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ६१
दूसरा अध्याय । ६१
आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः ।
शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधि ॥ २२२ ॥
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किंचित्समाचरेत् ।
तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वास्य रमेन्मनः ॥ २२३ ॥
यदि ब्रह्मचारी, इच्छा से सोता रहे और सूर्योदय होजाय या
नगर में ही बिना जाने सूर्यास्त होजाय, तो एक दिन उपवास
और गायत्रीजप करे । यदि सोते हुए को सूर्योदय और सूर्यास्त
होजाय और उसका प्रायश्चित्त न करे तो उसको महापातक
लगता है । रोज़ दोनों सन्ध्या में एकाग्रमन होकर पवित्र स्थान
में गायत्रीजप करे । यदि किसी धर्म का स्त्री या शूद्र आचरण
करता हो और उसमें मन लगे तो उसीका पालन करे । या जिस
में अपना चित्त प्रसन्न हो वही करे ॥ २२०-२२३ ॥
धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थौ धर्म एव च ।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ॥ २२४ ॥
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ॥ २२५॥
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।
नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः॥ २२६ ॥
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥ २२७ ॥
कोई अर्थ और धर्म को, कोई काम, अर्थ को, कोई अर्थ को,
कोई धर्म को ही अच्छा मानते हैं। पर धर्म, अर्थ और काम इन
तीनों का आचरण करने से भला होता है-यह धर्मशास्त्र की आज्ञा
है। आचार्य ब्रह्मा की मूर्ति, पिता प्रजापति की मूर्ति, माता पृ-
थिवी की मूर्ति और बड़ा भाई अपनी ही मूर्ति है। इनसे दुःखी
होने पर भी इनका अपमान न करे और ब्राह्मण को तो कभी भ
६२ मनुस्मृति ।
करना चाहिए । मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन आदि में; माता,
पिता जो दुःख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से भी
नहीं हो सकता ॥ २२४—२२७ ॥
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा ।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ २२८ ॥
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते ।
न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ २२६ ॥
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः ।
त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ॥ २३० ॥
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ २३१ ॥
त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीँल्लोकान् विजयेद्गृही ।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ॥ २३२ ॥
इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रूषया त्वेव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ २३३ ॥
सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥२३४ ॥
यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् ।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ॥ २३५ ॥
इसलिए सदा माता, पिता और आचार्य का प्रिय कार्य करे ।
इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं। इन तीनों
की सेवा परम तप कहा जाता है। इनकी आज्ञा लेकर दूसरे धर्मों
का आचरण करना चाहिए । ये ही तीनों लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष,
स्वर्ग हैं। तीनों आश्रम, तीनों वेद और तीनों अग्नि हैं। पिता
गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि का