मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ५३
दूसरा अध्याय । ५३
नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म स्वधानिनयनादृते ।
शूद्रेण हि समास्तावद्यावद्वेदे न जायते ॥ १७२॥
कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते ।
ब्रह्मणो ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ॥ १७३ ॥
यद्यस्य विहितं चर्म यत्सूत्रं या च मेखला ।
यो दण्डो यच्च वसनं तत्तदस्य व्रतेष्वपि ॥ १७४ ॥
सेवेतेमांस्तु नियमान् ब्रह्मचारी गुरौ वसन् ।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं तपोवृद्ध्यर्थमात्मनः ॥ १७५ ॥
जिसका यज्ञोपवीत न भया हो उसके समीप, श्राद्धकर्म के
मन्त्रों के सिवाय दूसरे वेदमन्त्रों का उच्चारण न करे। क्योंकि
उपनयन के पूर्व शूद्र के समान वह माना जाता है। उपनयन के
बाद बालक को व्रत धारण और विधि से वेद का अध्ययन करावे।
उपनयन में जिसके लिए जो चर्म, सूत्र, मेखला, दण्ड और वस्त्र
धारण करने को कहा है वही व्रत में धारण करना चाहिए। गुरु-
कुल में ब्रह्मचारी को इन्द्रियों का संयम करके अपने तप के वृद्धि
के लिए इन नियमों का पालन करना चाहिए ॥ १७२-१७५ ॥
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् ।
देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च ॥ १७६ ॥
वर्जयेन्मधु मांसं च गन्धं माल्यं रसान्स्त्रियः ।
शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम् ॥ १७७॥
अभ्यङ्गमञ्जनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम् ।
कामं क्रोधं च लोभं च नर्त्तनं गीतवादनम् ॥ १७८ ॥
द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथानृतम् ।
स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च ॥ १७९ ॥
५४ मनुस्मृति ।
ब्रह्मचारी के धर्म ।
नित्य स्नान से पवित्र होकर द्विज, देवता, ऋषि और पितरों
का तर्पण, देवपूजन और होम करना चाहिए । मधु-शराब, मांस,
सुगन्ध का पदार्थ, पुष्प, रस, स्त्री जो सड़ी चीज़-सिरका वगैरह
और प्राणियों की हिंसा इनको छोड़ देना चाहिए । तैल लगाना,
आँखों में अंजन, जूता, छतरी, काम, क्रोध, लोभ, नाच, गान,
बाजा, जुआ, बकवाद करना, परनिन्दा, झूठ बोलना, स्त्रियों
को देखना और छूना, दूसरे का अनहित, ये सब छोड़ देना
चाहिए ॥ १७६-१७८ ॥
एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित् ।
कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥१८०॥
स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः ।
स्नात्वार्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥१८१॥
उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् ।
आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ॥ १८२ ॥
वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु ।
ब्रह्मचार्य्याहरेद्भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ॥ १८३ ॥
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ।
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत् ॥ १८४ ॥
हमेशा अकेला सोवे और वीर्य को न गिरावे । जो इच्छा से वीर्य-
पात करता है वह अपने ब्रह्मचर्यव्रत का नाश करता है । अपनी
इच्छा के बिना स्वप्न में वीर्यपात होजाय तो स्नान, सूर्यपूजन कर
के 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस ऋचा का तीन बार जप करे । जल
का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश ये चीज़ें ज़रूरत भर लावे
और प्रतिदिन भिक्षा माँगे । वेद और यज्ञ से जो रहित नहीं हैं,