मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ५१
दूसरा अध्याय । ५१
ब्राह्मण निष्फल है-क्योंकि श्रौत-स्मार्त कर्मों के अयोग्य होता है।
किसी के चित्त को दुखाकर धर्मशिक्षा न देनी चाहिए । मधुर
और कोमल वाणी बोलनी चाहिए । जिसका वाणी और मन
शुद्ध है, दोषों से रहित है, उसको वैदिक कर्मों का पूरा फल
मिलता है ॥ १५७-१६० ॥
नारन्तुदः स्यादातोंऽपि न परद्रोहकर्मधीः ।
ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥ १६१ ॥
संमानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १६२ ॥
सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते ।
सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ॥ १६३ ॥
बहुत दुखी होने पर भी किसी को मर्मभेदी वचन न कहे ।
जिसमें दूसरे का अनभल हो ऐसी बात न विचार करे और
जिससे लोग घबड़ावें, उस अहित करनेवाली बात को न कहे ।
सन्मान से विष के तरह नित्य डरा करे और अपमान का अमृत
के तरह सदा चाह रक्खे । इस लोक में अपमान से जो दुःख नहीं
मानता वह सुख से सोता है, सुख से जागता है। सुख से विचरता
है और उसका अपमान करनेवाला नष्ट होजाता है ॥ १६१-१६३ ॥
अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः ।
गुरौ वसन् संचिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ॥ १६४ ॥
तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ १६५ ॥
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १६६ ॥
५२ मनुस्मृति।
आहैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः।
यःस्रग्व्यपिद्विजोऽधीतेस्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम्॥१६७॥
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥१६८॥
इस क्रम से गर्भाधानादि उपनयनान्त संस्कारों से पवित्र द्विज
गुरुकुल में वेद प्राप्ति योग्य तप करे। द्विज को तपों से और
नाना प्रकार के व्रतों से संपूर्ण वेद और उपनिषदों का ज्ञान
संपादन करना चाहिए। तप करने की इच्छा से वेद का सदा
अभ्यास करे। वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप कहा गया है।
जो द्विज पुष्पमाला को भी धारण करके अर्थात् ब्रह्मचारी का
नियम न रखकर भी नित्य यथाशक्ति वेदाध्ययन करता है वह
नख-शिख से परम तप करता है। जो द्विज वेद को न पढ़कर
दूसरे शास्त्रों में श्रम करता है, वह जीताहुआ ही वंश के साथ
शूद्रता को प्राप्त होता है ॥ १६४-१६८ ॥
मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने।
तृतीयं यज्ञदीक्षायां द्विजस्य श्रुतिचोदनात् ॥ १६६ ॥
तत्र यद्ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम्।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते॥१७०॥
वेदप्रदानादाचार्यं पितरं परिचक्षते।
न ह्यस्मिन् युज्यते कर्म किंचिदामौञ्जिबन्धनात्॥१७१॥
श्रुति की आज्ञा से द्विज का माता से पहला जन्म, उपनयन
से दूसरा जन्म, ज्योतिष्टोम आदि यज्ञदीक्षा लेने पर तीसरा जन्म
होता है। इन तीनों में उपनयनवाले ब्रह्मजन्म में सावित्री-गायत्री
माता और आचार्य पिता कहा जाता है। वेद के अध्यापन से
आचार्य को पिता कहते हैं। उपनयन के बिना बालक को श्रौत-
स्मार्त कर्मों का अधिकार नहीं होता ॥ १६६-१७१ ॥