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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ६७

तीसरा अध्याय। ६७
आज्ञा से, स्नान, समावर्तन करने के बाद, अपने वर्ण की शुभ-
लक्षणवाली कन्या से विवाह करे। जो माता की सपिण्ड-सात
पीढ़ी में न हो और पिता के गोत्र में न हो, ऐसी कन्या द्विजों के
लिये विवाह योग्य होती है। यदि गौ, बकरी, भेड़, धन और धान्य
से खूब धनी भी हो तौभी विवाहसम्बन्ध जातकर्मसंस्कार-रहित,
कन्यामात्र पैदा करनेवाला, वेदपाठनरहित, शरीर में बहुत बाल-
वाला, बवासीरवाला, क्षयरोगी, मन्दाग्नि, मृगी, श्वेतकुष्ठ, और
गलितकुष्ठ इन दश कुलों में न करना चाहिये ॥ १-७ ॥
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ८ ॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ ६ ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत्स्त्रियम् ॥ १० ॥
यस्यास्तु न भवेद् भ्राता न विज्ञायेत वा पिता ।
नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥ ११ ॥
विवाह-नियम ।
जिसके देह में लाल बाल हों, अधिक अङ्गवाली, रोगी, बिना
बालवाली, अधिक बालवाली, ज्यादा बोलनेवाली और पीली
आँखोंवाली कन्या से विवाह न करे। नक्षत्र, वृक्ष, नदी, म्लेच्छ,
पर्वत, पक्षी, साँप और शूद्र नामवाली और भयदायक नामवाली
के साथ विवाह न करे। सुन्दर अङ्गवाली, सुन्दर नामवाली,
हंस और हाथी के समान चालवाली, पतले रोम, बाल और दांत-
वाली, कोमल शरीरवाली कन्या के साथ विवाह करना चाहिये।
जिसका भाई न हो, जिसके पिता का पता मालूम न हो, ऐसी
कन्या के साथ 'पुत्रिकाधर्म' से डरकर विवाह न करना
चाहिये ॥ ८-११ ॥

६८ मनुस्मृति ।
सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि ।
कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः स्युः क्रमशॊ वराः ॥ १२ ॥
शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते ।
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः ॥ १३ ॥
न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।
कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ॥ १४ ॥
हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को अपने वर्ण की कन्या से विवाह
श्रेष्ठ है। पर कामवश होकर जो विवाह होता है वह अधम विवाह
है । शूद्र पुरुष शूद्र कन्या के साथ, वैश्य-वैश्य और शूद्र कन्या के
साथ, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, ब्राह्मण-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ विवाह कर सकता
है-यह अधम विवाह है । ब्राह्मण और क्षत्रिय को, आपत्तिकाल
में भी शूद्र कन्या से विवाह न करना चाहिये । जो द्विजाति मोह-
वश हीनजाति की कन्या से विवाह करता है वह अपने कुल और
परिवार कोही शूद्र करदेता है ॥ १२-१५ ॥
शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च ।
शौनकस्य सुतोत्पत्त्या तदपत्यतया भृगोः ॥ १६ ॥
शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ १७ ॥
दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु ।
नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति ॥ १८ ॥
शूद्र कन्या के साथ विवाह करनेवाला ब्राह्मण पतित होजाता
है । यह अत्रि और उतथ्य के पुत्र गौतमऋषि का मत है । शौनक